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Thursday, November 4, 2021

दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

 सभी देशवासियो,पाठकों को दीपावली 2021 की हार्दिक शुभकामनाएं

 दीपावली पर बगड़ में सुसज्जित बाजार और इस साल की दीपावली पर दुकानदारों का रिव्यू

सुख समृद्धि तथा एश्वर्य का प्रतीक पावन "दीपोत्सव" आपके लिए सपरिवार मंगलमय हो!
इस पर्व के शुभ अवसर पर आपको ढेर सारी शुभकामनाएं एवं उज्ज्वल भविष्य का कामना। 
आप व आपके परिवार के लिए यह पर्व हर्ष,उल्लास, खुशी ,उमंग के 
साथ  आए तथा प्रसन्नता अविराम आपके जीवन में 
सौदर्य मण्डित करती रहे। 
आने वाले वर्ष में आपकी और आपके अपनों की कीर्ति चहुं ओर फैले! 
आप जीवन में ऊँचाईयों को प्राप्त करें।
आपका जीवन सदैव उन्नति की और अग्रसर रहे
 इन्ही मंगल कामनाओं के साथ










" दीपावली मुबारक"
" दीपावली की हार्दिक बधाईयां "
" HAPPY DEEPAWALI "














क्रिकेट व आधुनिकरण ने ली आंचलिक (ग्रामीण ) खेलों की जान

पीपल के पेड़ से पद्मश्री पुरस्कार तक प्रकृति प्रेमी हिमताराम जी भाम्बू, हमारे भाम्बू परिवार व देश के गर्व

 

 6 फ़ीट ऊंचा पालक का पौधा मालीगांव



फाल्गुन मास,होली और धमाल,मोज़ मस्ती कहाँ गए वो दिन?सब कुछ बदल गया

 

भाम्बू गौत्र का इतिहास


मेरे बारे में ..



Tuesday, October 12, 2021

क्रिकेट व आधुनिकरण ने ली आंचलिक (ग्रामीण ) खेलों की जान

    सोच कर बहुत दुःखी होना पड़ता है कि हमारे देखते ही देखते हमारे आंचलिक (ग्रामीण) खेल जिनका विवरण नीचे किया जा रहा है लगभग लुप्त हो गये हैं। आजकल आप अपने बच्चों को स्कूली समय के बाद (छुट्टी )के समय में देखते है तो वह या तो कमरे के कोने में बैठा टी.वी पर क्रिकेट का भूल भुलैया गेम देख रहा होगा या कोई  बेतुकी नई फिल्म देख रहा होगा या कान से चलभाष संयत्र (मोबाइल) लगाकर बात कर रहा होगा। तथा कभी कभार देखेंगे की वह अपने दोस्तों के साथ तीन डण्डे लेकर और एक बैट लेकर मोहल्ले,गली या रोड़ के पास आज का प्रसिद्घ भूल भुलैया मैच क्रिकेट खेल रहा होगा। अगर उन बच्चों से हमारे ग्रामीण खेलों के नाम जैसे सतन तलाई,रसड़ी सितोलिया(पिट्टू), हड़दड़ा,राउण्डर बैट,गिल्ली डण्डा,(मोई डंका)रस्सा कस्सी,चौसर,चर -भर, आर तिला,आदि के बारे पूछा जाये तो उन्हें अचम्बा होगा की ये किस चिज के नाम है। क्योंकि उन्हें इनके बारे में मालूम ही नहीं है। और ये ऐसा हुआ ज्यादा समय नहीं बिता हमारे देखते ही देखते ये खेल लुप्त हो गये इसका जिम्मेदार कौन है ?  टी.वी, आधुनीकरण,या हम स्वयं ?
ये आप बुद्धि जीवी लोग ही बता सकते है। मुझे ये अपनी संस्कृति को ह्रास होता दिखाई दे रहा है
      ज्यादा से ज्यादा 20 वर्ष पहले ये खेल गांवों, की शान हुआ करते थे और गांव के लोगो के मनोरंजन के साधन हुआ करते थे। मुझे ज्यादा तो याद नहीं लेकिन जिन खेलों को मैने गांव के दोस्तों के साथ खेला है और उन्हें खेलते हुए देखा है उनके बारे में मैं आपको उनके नाम सहित जितना मैं जानता हूं बताउगा। और इस ब्लॉग पर लिखना चाहूंगा ताकि आगे आनेवाली पिढ़ीयों के लिए ये नाम मात्र ही जीवित रह सके नहीं तो लोग खेलों के साथ उनके नाम भी भूल जायेंगे।
    ब मैं स्कूल में पढ़ता था जब स्कूल की छुट्टी के बाद सभी लड़के गांव के चौक में या गांव के बाहर बड़े चौक में इक्कठे हो जाते थे और इन खेलों को खेलते थे बहुत आनन्द आता था। शायद आपने भी ये खेल खेले होंगे।अगर खेले है तो आपको इनके आनन्द के बारे में ज्यादा बताने की जरूरत ही नहीं है। दीपावली की छुट्टियों में गायें भैसे व अन्य पशु (रोही) खेतों में चराने जाते थे और  इन खेलों के साथ दिन भर मौज मस्ती किया करते थे। समय कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता था। ऐसे ही होली से 1 माह पूर्व ही ‘‘अर तिला’’ ‘‘छुपम छपाई’’ खेल जिसको  दो टोलिया बनाकर रात को हम बहुत ही शोख के साथ खेलते थे खेलते खेलते कब सुबह के 3-4 बज जाते थे पता ही नहीं चलता था कभी कभी तो अपने गांव की सीमा से कई दूर दूसरे गांव की सीमा में भी छुपने चले जाया करते थे कितना आनन्द आता था ? यह तो जिसने खेला हो वो ही जानता है।
दोस्तों आज जब वो बाते याद आती है तो एक बार तो रोने को दिल करता है अपने यहां की हालात और बेबसी देखकर  मन बहुत ही दुःखी हो जाता है। और फिर वही सवाल उठ खड़ा हो जाता है इन सब का जिम्मेदार कौन है?
      लि खने को तो मैं ऐसे बहुत सी बाते लिख कर चाहे एक किताब पुरी कर सकता हूं  वे कितने सुनहरे पल थे  उनके बारे में एक किताब लिखू तो भी कम है।
होलियों के दिनों में लड़कियां रात भर गीत गाती थी और लड़के खेलते रहते थे।
      काश  मैं उस समय खेले जाने वाले खेलों के फोटो आपको दिखाता लेकिन क्या करू मेरे पास उस समय कैमरा नहीं था और किसे पता थ कि ये खेल आगे चलकर लुप्त ही हो जायेगें अगर किसी भी गांव या कही भी मुझे ये खेल अब भी खेलते हुए मिले तो मैं आपको उनके फोटो  फिर कभी जरूर दिखाउगां। अब मैं कुछ खेल जो प्रायः सभी गांवों में खेले जाते थे उनका नाम लिख रहा हूं अगर उन खेलों का नाम आपकी नजरों में कोई दुसरा हो या आपके पास भी कोई ऐसे खेलों  के नाम हों तो टिप्पणी में जरूर लिखियेगा।
1.    सतन तलाई    
2.    रसड़ी      ‘‘रस रसड़ी का खेल बड़ा सळिया लागें जूते बगावे दलिया’’   

3.    सितोलिया (पिट्ठू)   
4.    हडदड़ा (टोरा गिण्डी)
5.    मार धड़ी       
6.    राउण्डर बैट       
7.    गुल्ली डण्डा/ गिल्ली डंडा  /मोई डंका 
8.    कुराक डंका       
9.    गुथा गिण्डी
10.    रस्सा कस्सी
11.    टिग्गा,टीटा, गिटा,गिट्टा 
12.    घुण घुण मिंगणा
13.    अगदड़ बगदड़
14    चौसर (
चौपड़)
15.    चर भर
16.    आर तिला (छुपम छुपाई)
17.    कबड्डी
18.    घोड़ा कबड्डी
19    चंगा,चावर
20   टिप टॉप
21   डाकन डब्बा , तत्ती
22   लँगड़ी टाँग
23   सांप सीढ़ी
24   अगड्ड भगदड़ (आज का लूडो)
25    कंचा,गोली,अंटा
26   चोर सिपाई
27   चिड़िया उड़
28    मोसम्बा भई मोसम्बा
29    चर -भर
30    आँख मिचोली
  
अपडेट 2021
कुछ खेलो के फोटो मिले हैं जो आपके सामने पेश हैं


डाकन डब्बा , तत्ती

टिप टॉप




 टिग्गा,टीटा, गिट्टा 

गुल्ली डण्डा/ गिल्ली डंडा  /मोई डंका 

चोर सिपाई

आँख मिचोली

कंचा,गोली,अंटा

सांप सीढ़ी

 सितोलिया (पिट्ठू)

चिड़िया उड़

मोसम्बा भई मोसम्बा




न खेलों के नाम मैने मेरे भांजे साहिल मान व पारस मान को साथ बिठाकर उन्हें बताते हुए लिखें है। ताकि वो तो याद रख सके।
 मुझे तो ये ही नाम याद है अगर आपके पास हो तो जरूर लिखना और हो सके तो इन खेलों को दुबारा जिवन्त करने की कोशिश करना ताकि हमारी संस्कृति या हमारा आंचलिक अस्तित्व बना रह सके। और हमारें बच्चे भी गर्व से इन खेलों के बारे में अपने बच्चों या अगली पिढ़ी को बता सके कि ये हमारें ग्रामीण खेल है।
नहीं तो आने वाले समय में बच्चे कमरे के कोने में ही सिमट कर रह जायेंगे। या फिर क्रिकेट जैसा भूल भूलैया खेल इनके दिमाग .....

ये है पहला डिजिटल गेम वीडियो गेम



इसके बाद लुप्त होते गए आंचलिक खेल




पीपल के पेड़ से पद्मश्री पुरस्कार तक प्रकृति प्रेमी हिमताराम जी भाम्बू, हमारे भाम्बू परिवार व देश के गर्व

 

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Thursday, October 7, 2021

नवरात्रि स्पेशल सभी को माता के नवरात्रों की शुभकामनाएं

देवी वन्दना
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

 "सदा भवानी दाहिनी सन्नमुख रहत गणेश, पांच देव रक्षा करें बह्मा, विष्णु, महेश"
श्राद्ध पक्ष खत्म होने के बाद आज से ही मां दुर्गा के नौ रूपों की पुजा अर्चना का सौभाग्य हमें नवरात्रों के रूप में मिलता है।  नौ दिन तक हर किसी के मुख मण्डल से माता के जयकारे ही गुंजते सुनाई देते है। इन नौ दिनों में माता के नौ रूपों की पुजा की जाती है। और उनसे शक्ति,सुख और समृद्धी जैसे अनेक मन वांच्छित वर (मन्नत)मांगे जाते है। वेदानुकूल तरीके  विधि से पूजा करने वाले भक्तों पर माता भगवती अपनी असीम कृपा कर उनके दुःख, भय, रोग, शोकादि दूर कर शक्ति और समृद्धि प्रदान मन वांच्छित वर प्रदान करती है।तथा अन्न धन के भण्डार भरती है।सभी देवी देवताओं की प्रार्थना और तीनों  महादेवों के अंश से प्रतिपादित  दुष्ट संहारक माता के  नौ रूपों को नव दुर्गा कहा गया जिनकी पुजा नवरात्र में की जाती है।
आजकल कोविड नियमों की अनुपालना के कारण बगड़ में जगह जगह  माता पंडाल नही सजते घरों में ही होती ह पूजा या बगड़ दुर्गा मंदिर में होती ह माँ की पूजा अर्चना।
अब मैं माता के नो रूपो के बारे आपको बताता हूं
जिनके अलग -अलग नौ नाम है।
मेरे साथ आप भी करिये जगत पालक ,संहारक मां के नो रूपों के दर्शन
1 शैलपुत्री - जो हिमालय की तपस्या और प्रार्थना से प्रसन्न हो कृपापूर्वक उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुई, 




 


2 ब्रह्मचारिणी  - सच्चिदानन्दमय ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे ब्रह्मचारिणी कहलाई.





 



         3 चंद्रघंटा  - आल्हाद्कारी चन्द्रमा जिनकी घंटा में स्थित हो, उन देवी का नाम चंद्रघंटा है.



 
 



4  कूष्मांडा त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदार में स्थित हैं, वे भगवती कूष्मांडा कहलाई.




 




5 स्कंदमाता - भगवती शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, उनकी माता होने से वे स्कंदमाता कहलाई.


 
 




6 कात्यायनी  -देवताओं के कार्यसिद्धि हेतु महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई, जिससे उनके द्वारा अपने पुत्री मानने से कात्यायनी नाम से प्रसिद्द हुई.


 



7 कालरात्रि - काल की भी रात्रि (विनाशिका) दुष्ट संहारक होने से उनका नाम कालरात्रि पड़ा ।




 



8 महागौरी - तपस्या के द्वारा महँ गौरवर्ण प्राप्त करने से महागौरी कहलाई।





 




9 सिद्धिदात्री - सिद्धि अर्थात सर्व सिद्ध कारिणी मोक्षदायिनी होने से सिद्धिदात्री कहलाती है।

अनेक प्रकार के  आभूषणों और रत्नों तथा अस्त्र शस्त्रों  से सुशोभित ये देवियाँ क्रोध से भरी हुई और और मन मोहक दिखाई देती हैं. ये शक्ति, त्रिशूल हल, मुसल, खेटक, तोमर,शंख, चक्र, गदा, परशु, पाश, कुंत, एवं उत्तम शांर्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण किए रहती हैं, जिसका उद्देश्य दुष्टों का नाश कर अपने भक्तों को अभयदान देते हुए उनकी रक्षा कर संसार  में शांति व्याप्त करना और मन वांच्छित वर, मुराद पुरी करना और अन्न धन के भण्डार भरती है। 



 माता आप सभी पर भी अपनी असीम कृपा बनाये रखे इन्हीं शुभकामनाओं के साथ इजाजत चाहुंगा




पीपल के पेड़ से पद्मश्री पुरस्कार तक प्रकृति प्रेमी हिमताराम जी भाम्बू, हमारे भाम्बू परिवार व देश के गर्व

 

 6 फ़ीट ऊंचा पालक का पौधा मालीगांव



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Friday, October 1, 2021

बहुमुखी प्रतिभा के धनी, काव्यश्री,साहित्य रत्न देवाराम भाॅमू समाज के गौरव

 आज का परिचय बहुमुखी प्रतिभा के धनी छोटी सी उम्र में अपनी लेखनी  के बल पर जादू कर काव्यश्री एवं  साहित्य रत्न जैसे सम्मान प्रप्त करने वाले हमारे समाज के गौरव,गर्व  छोटे भाई  देवाराम भाम्बू का है जिन्होंने अपनी लेखनी से  गद्य और पद्य दोनो विद्याओं में अपनी छाप छोड़ी है जो अपने अपने देश के लिए गर्व के साथ - साथ अपने परिवार भाम्बू गोत्र के लिए बहुत बड़ा गौरव है। अपने समाज के उस गौरव का गुण्गान करते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है और आपको ...कमेंट करके जरूर बताईएगा ?

परिचय :-

नाम :    देवाराम भाॅमू 

देवाराम भाॅमू 

जन्म :          30 मार्च 1982

ग्राम पोस्ट :  जाखली 

                    तहसील मकराना 

                    जिला नागौर राजस्थान 

पिता :          श्री कल्ला राम जी भाॅमू 

माता  :         श्रीमती गणपती देवी 

पत्नी  :          श्रीमती कमला 

पुत्र :              हिमेश भाॅमू 

                      गगन भाॅमू 

शिक्षा :          एम. ए., बी. एड. 

सम्प्रति :        शिक्षक एवं स्वतंत्र लेखक 

प्रकाशन विवरण  :   

आनंद-सारा(उपन्यास)प्रकाशित कृति  









एवं विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं एवं सांझा काव्य संग्रहों में कविताओं एवं गीतों का प्रकाशन।

अन्य रचनाएं

(ये रचनाएं अलग से पोस्ट में डाली जाएंगी)
कई और है जो अभी प्रकाशित नहीं हुई है।

साहित्य लेखन विद्या  :   गद्य-पद्य दोनों 

अन्य रूचि  :  चित्रकारी 

सम्मान एवं पुरस्कार : 

इन्हे इनकी स्वर्णिम रचनाओं के लिए कई तरह के पुरस्कारों  नवाजा गया है  जो निम्न है:

1-  ब्रजवानी जन सेवा समिति नगर, भरतपुर एवं काव्य गोष्ठी मंच जयपुर द्वारा साहित्य रत्न सम्मान 

साहित्य रत्न सम्मान













2-  विश्व हिन्दी रचनाकार मंच द्वारा राजस्थान काव्य श्री सम्मान 2021

काव्य श्री सम्मान 2021











3-  KB Writers द्वारा सम्मान पत्र 









4-  काव्य मंजरी मासिक पत्रिका द्वारा सम्मान। 





छात्र जीवन की उपलब्धियां  :   

विद्यार्थी जीवन से ही इनकी रूचि लेखन के प्रति रही इसका उदाहरण आप छात्र जीवन में रही इनकी उपलब्धयां देखकर लगा सकते हैं।

1-  राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान उदयपुर द्वारा आयोजित राज्य प्रतिभा विकास परीक्षा में चयन 1999

2-  ग्रामीण प्रतिभा खोज परीक्षा में अव्वल स्थान 

3-  राज्य के प्रतिभाशाली छात्रों के लिए आयोजित राज्य प्रतिभा विकास प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने का गौरव प्राप्त हुआ। 

4-  एकाभिनय प्रतियोगिता में जिला स्तर पर प्रथम  रहे। 

 सम्पर्क  :  

देवाराम भाॅमू 

जाखली, तहसील-मकराना, जिला नागौर, राजस्थान 

Mobile no-   09571524500

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आनंद- सारा 


बहुचर्चित आनंद- सारा पुस्तक मे दो लघु उपन्यास है। एक उपन्यास इसी शीर्षक 'आनंद-सारा 'से है तथा दूसरा 'एक भूल और जीवन 'है। 

पहला उपन्यास ग्रामीण पृष्ठभूमि के पात्रों को लेकर विभिन्न नाटकीय घटनाक्रमो से गुजरता है। जो स्वतंत्रता पूर्व के काल पर आधारित है। 

   यह उपन्यास कसी हुई भाषा शैली के सहारे चलता है। जो पाठकों को निरन्तर साथ बनाये रखने में सक्षम हैं। 

इसके घटनाक्रम प्रकृति के बेहद करीब है। संघर्ष, मेहनत, परिवार एवं देशभक्ति इसमें मूल विषय है। 


दूसरा उपन्यास 'एक भूल और जीवन 'है। जिसमें  हमारे परिवेश के एक खानाबदोश जाति के चित्र को उकेरा गया है। नोरता इसका मुख्य पात्र हैं। 

उसका एक गलत निर्णय, उसके परिवार को तबाह कर देता है। 


यह उपन्यास भाॅमू परिवार के लिए गौरव की बात है तथा परिवार की नाक है।

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इनके उपन्यास आनन्द सारा के बारे में प्रो. प्रबोध कुमार गोविल, जयपुर द्वारा जो समिक्षात्म शब्द लिखे गये वे इस प्रकार हैं :

कम शब्दों में ज्यादा कहने का कौशल


कुछ कथाएँ लोककथा जैसा आनंद देती हैं। पाठक को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि ये कहानी किसने लिखी है, कब लिखी है, वह तो केवल रचना में रमकर ख़ुद को खो देता है। आधुनिक तकनीक के इस अति-वैज्ञानिकता भरे समय में तो हम पत्र पत्रिकाओं, - पुस्तकों व सोशल मीडिया मंच पर ऐसी अनेक रचनाओं से रोज दो-चार होते ही रहते हैं जिन्हें एक-दूसरे के लिए अँगुलियों की हल्की सी जुंबिश से प्रसारित किया जाता रहता है और एक विराट समूह इस रचनात्मकता का रसास्वादन करता रहता है। फिर भी पुस्तकों की महत्ता कम नहीं होती।

'आनंद-सारा' पुस्तक में दो लघु उपन्यास हैं जिन्हें हम उपन्यासिका भी कह सकते हैं, यद्यपि अब विभिन्न विधाओं में आकार को लेकर कोई विशेष आग्रह न होने के चलते 'उपन्यासिका' कहने का रिवाज़ छूट सा गया है। एक उपन्यास इसी शीर्षक 'आनंद-सारा' से है तथा दूसरे का शीर्षक 'एक भूल और जीवन' है।

पहला उपन्यास ग्रामीण पृष्ठभूमि के पात्रों को लेकर उत्पन्न विभिन्न नाटकीय घटनाक्रमों से गुजरता है जिसमें बीते गुज़रे समय के नैतिक मूल्यों और सोच की गंध - निरंतर आती है।


इस कथानक में ऐतिहासिक उपन्यासों जैसा ट्रीटमेंट रोचकता को बनाए रखता है। बेहद कसी हुई भाषाशैली में छोटे-छोटे संवादों और वाक्यों के सहारे जो कहानी चलती है वो पाठक को लगातार अपने साथ बनाए रखने में सक्षम है।

आधुनिक काल से पहले के चंद दशकों तक देशभर में सामंतशाही का बोलबाला रहा। रजवाड़े, रियासतें और जागीरें एक ख़ास किस्म की संस्कृति का पालन करते रहे

जिसकी निर्मिति समय के साथ-साथ परंपराओं और रूढ़ियों में आबद्ध रही। इसके अवशेष अब तक भी दिखाई देते हैं। बल्कि कहीं-कहीं तो यह संस्कृति सामंतशाही की राख से किसी फीनिक्स की तरह उठकर फ़िर जीवंत है। और जाहिर है कि अगर किसी राख में चिंगारियाँ मौजूद हों तो उसे मात्र विगत अथवा अतीत की संज्ञा दे देने के भी अपने जोखिम हैं। वह किसी पीढ़ी का 'वर्तमान' और किसी पीढ़ी का ''भविष्य' भी है।

यही कारण है कि 'आनंद-सारा' जैसे कथानकों की प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होती।

इस किताब में संकलित दूसरा उपन्यास 'एक भूल और जीवन' भी एक रोचक कहानी है जिसके माध्यम से युवा रचनाकार ने समाज के उस तबके के सरोकार संजोए हैं जो अपने जीवन में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, नैतिक स्थायित्व नहीं पाता और एक अस्थिर, खानाबदोश ज़िन्दगी के निर्वाह में खर्च हो जाता है। यह तबका विपन्न ज़रूर है किंतु जीवन के प्रवाहों से महरूम नहीं है। यहाँ आकांक्षा भी है, जिजीविषा भी है, तृष्णा भी है, छलना भी है तो विडंबना भी है।

आप देखेंगे कि लेखक में पर्याप्त संभावना भी है। भाषा की स्फटिक-सी कीमती लकीरें आकर्षित करती हैं। कम शब्द देकर ज्यादा कह जाने का कौशल रचनाकार को आता है। मैं देवाराम भॉमू के भविष्य के प्रति आशान्वित हूँ और उन्हें शुभकामनाएँ देता हूँ।

प्रो. प्रबोध कुमार गोविल बी 301, मंगलम जाग्रति रेजीडेंसी 447, कृपलानी मार्ग, आदर्श नगर जयपुर-302004 ( राजस्थान)

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    मैं  अपने भाई देवाराम भॉमू के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं  उन्हें शुभकामनाएँ देता हूँ।तथा आशा करता हूं कि आप आगे भी एसे ही अपनी लेखनी द्वारा समाज, गोत्र, देश का गर्व बढ़ाते रहेंगे।  बहुत बहुत बधाई 

  जितनी जानकारी मुझे  देवाराम भॉमू के बारे में उपलब्ध हुई मैने आपके सामने शेयर कर दी है हांलाकि मैंने लिखने में पूर्ण सावधानी रखी है फिर भी कोई त्रुटि रह गई हो तो क्षमा प्रार्थी हूं और सुधार के लिए आपके सुझाव हमेशा आंमत्रित  रहेंगे। 

 

धन्यवाद।

आगे की पोस्ट में इनकी हर एक रचना कविता को 

अलग अलग पोस्ट द्वारा डाला जायेगा।

आप सभी को  यह बता देना चाहता हूँ की अपने गोत्र भाम्बू  अपनी अपनी क्षेत्रिया भाषा  ओर बोली के कारण  कई प्रकार से  और बोलते है जैसे BHAMBOO ,BHAMU, BHAMBU, BHAMU, BAMU, BANBHU ,  और हिन्दी में भाम्बू,बाम्भू,बामू,बामूं,बांभू,भामु आदि कई नामों से बोलते और लिखते है। ये सब अपने अपने क्षेत्र की बोली का प्रभाव है  और कुछ नहीं अर्थ एक ही  गोत्र एक ही  है।  

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आपका अपना :-

गांव /पो - मालीगांव
तह. चिड़ावा
जिला झुन्झुनूं (राज.)
मो. 9829277798
मेरे  ब्लॉग जिन पर मैं वर्तमान में लिखता हूं।


                        धन्यवाद 
राम राम, जय हिन्द ,जय किसान



पीपल के पेड़ से पद्मश्री पुरस्कार तक प्रकृति प्रेमी हिमताराम जी भाम्बू, हमारे भाम्बू परिवार व देश के गर्व

 

 6 फ़ीट ऊंचा पालक का पौधा मालीगांव



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