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Friday, August 30, 2019

विश्व विख्यात,झुन्झुनू की गौरव दादी राणी सती

राजस्थान के झुन्झुनू जिले  के उत्तर में स्थित विश्व विख्यात ,गौरवशाली, जन जन पर कृपा बसराने  वाली दादी राणी सती का मंदिर  है जो लगभग 400 वर्ष पुराना बताया जाता है जिसे शायद ही कोई होगा जो नही जानता हो, देश ही नही विदेशों में भी इस मंदिर की पहचान है ये मंदिर दादी राणी सती  दादी का है। जिनका नाम नारायणी बाई था  भाद्रपद की अमावस्या के दिन यह बहुत ही विशाल मेला भरता है जिसमे देश के हर कोने से दादी के दरबार मे श्रद्धालु अपना शीश नवाने आते है और मन मांगी मुरादे पाते है दादी उनकी हर इच्छा पूरी करती है।  पहले तो पूरे झुंझुंनू शहर में माता दादी राणी सती की सवारी शोभा यात्रा निकाली जाती थी पर बाद में भारत सरकार के नियम सती प्रथा  पूजा निषेध अधिनियम के चलते झांकी, यात्रा बंद कर दी गई अब मण्ड में ही चुनरी चढ़ा कर पूजा अर्चना की जाती गई
इस मंदिर का एक बहुत ही बड़ा कलाकृतियों से निर्मित मुख्य द्वार है जो अपनी कला के लिए प्रसीद्ध है और अंदर  13 मंदिर (मण्ड) बने हुए हैं जो अलग अलग सतियों के है जिनमे 12 छोटे  मंदिर अन्य सती दादियों के हैं ओर एक मुख्य (मण्ड) मंदिर जी बहुत ही बड़ा मंदिर है जो दादी राणी सती झुन्झुनू की सेठानी मा दुर्गा अवतार दादी नारायणी का मंदिर है मुख्य 1 मंण्ड सती दादी का है व अन्य    इन 12 सतियों के छोटे छोटे सुंदर कलात्मक मंढ शवेत संगमरमर के एक पंक्ति में बने हुए थे। जिनकी मान्यता व् पूजा बराबर होती आ रही है । श्री जालानदास जी के पुत्र कि पुत्रवधू  माँ नारायणी सन् 1352 में सती हुई। इसी कुल कि 12 सतियाँ झुंझनू में और हुई। (1) माँ नारायणी (2) जीवणी सती (3) पूर्णा सती (4)पिरागी सती (5) जमना सती (6) टीली सती (7) बानी सती (8) मैनावती सती (9) मनोहरी सती (10) महादेई सती (11) उर्मिला सती (12) गुजरी सती (13) सीता सती




   इस प्रकार कुल 13 मन्दिर इस परिसर में बने हुए है।  ओर आगे बड़ा बगीचा है जिसमे शिव मंदिर सहित देवी माँ दुर्गा के सातों रूपो की मूर्तियां छोटे छोटे मन्डो के रुप मे बनी हुई है और बगीचे में कलरफुल लाइट से सुसज्जित फ़वारे लगे हुए है जो बहुत ही मनमोहक लगते है मन्दिर प्रागण में बालाजी का भी एक मन्दिर है। बड़ी बड़ी धर्मशालाएं भवन बने हुए है। जिनमें मेले के दौरान यात्री ठहरते है।
जन्म सवंत 1638 वि. कार्तिक शुक्ला नवमीं दिन मंगलवार रात 12 बजे के पश्चात  महम नगर के डोकवा गाँव में हुआ था  जो हरियाणा में पड़ता था|  इनका नाम नारायणी बाई रखा गया ।इनके पिता का नाम सेठ श्री गुरसामल जी था | नारायणी बाई बच्चपन से ही होशियार ओर बहादुर थी इन्हें युद्ध कला ओर घुड़सवारी का भी ज्ञान था बचपन से ही इनमे बचपन से चमत्कारी शक्तियाँ नज़र आती थी, जो देख कर गांव के लोग अचंभा करते थे।
इनका का विवाह हिसार राज्य के सेठ श्री ज़ालीमराम जी के पुत्रा तनधन राम जी के साथ मंगसिर शुक्ला नवमीं सन 1352 मंगलवार को हुआ था | इनके विवाह में ख़ूब धन दौलत और घोड़े ऊंट वस्तुएं दी गई और कहा जाता है कि एक घोड़ी जो बहुत ही समझदार ओर सुंदर थी जिसका नाम श्यामकर्ण घोड़ी था जो इनके विवाह में तनधन राम जी को दी गई थी
इनके ससुर जलिमराम जी हिसार के नबाब के दीवान थे  वहाँ के नवाब के बेटे और तनधन दास जी में मित्रता थी  दास जी की घोड़ी शहज़ादे को भा गयी | घोड़ी पाने की ज़िद से दोनो में दुश्मनी ठन गयी | घोड़ी छीनने के प्रयत्न में शहज़ादा मारा गया | जिससे घबरा कर दीवान जी रातो रात परिवार सहित हिसार से झुन्झुनू की ओर चल दिए उन्हें पता था कि हिसार ओर झुन्झुनू के नबाबो में शत्रुता है अतः यह उसे हिसार नबाब से कोई खतरा नही है ये सोच कर वो सपरिवार झुन्झुनू में बस गये | कुछ दिन बीते  नारायणी बाई के पिता ने मुकलावे (गोना) का निमंत्रण तनधन राम जी के घर झुन्झुनू  दिवान जी पास भेजा ।निमंत्रण स्वीकार होने पर तनधन दास जी राणा के साथ कुछ सैनिको सहित मुकलावे के लिए महम नगर डोकवा गाँव पहुँचे | माघ शीर्ष कृष्णा नवमीं सन्न 1352 मंगलवार प्रातः शुभ बेला में नारायणी बाई विदा हुई |
परंतु होनी को कुछ और ही मंजूर था | इधर हिसार नवाब घात लगाकर बैठा था | मुकलावे की बात सुनकर सारी पहाड़ी को घेर लिया | “देवसर” की पहाड़ी के पास पहुँचते ही सैनिको ने हमला कर दिया | तनधन दास जी ने वीरता से डटकर नबाब की फ़ौज का सामना किया | अंत मे पीछे से एक सैनिक ने धोके से वार कर दिया, तनधन जी वीरगति को प्राप्त हुए |
नई नवेली दुल्हन ने डोली से जब यह सब देखा तो वह वीरांगना नारायाणी चंडी का रूप धारण कर सारे दुश्मनो पर टूट पड़ी और उन्हें  काटने लगी  । कहा जाता ह कुछ ही समय मे सारी भूमि खून से लाल हो गयी | बची हुई फौज भाग खड़ी हुई | इसे देख राणा जी ने अर्ध बेहोसी हालत में, आकर माँ नाराराणी से प्रार्थना की, तब माता ने शांत होकर शस्त्रों छोड़े।
तथा राणा जी से कहा कि मैं यही पर सती होउंगी तुम जल्दी से चीता तैयार करो,चीता तैयार की गई और दादी अपने पति का शव लेकर चीता पर बैठ गई | चुड़े से अग्नि प्रकट हुई और सती पति लोक चली गयी |
कुछ देर बाद में चिता से देवी रूप में सती प्रकट हुई और मधुर वाणी में राणा जी से बोली, तीन दिन बाद जब मेरी भस्म ठंडी हो जाये तब मेरी चीता की भस्म को घोड़ी पर रख कर ले जाना, जहाँ ये घोड़ी रुक जाएगी वही मेरा स्थान होगा | मैं उसी जगह से जन-जन का कल्याण करूँगी | ऐसा सुन कर राणा बहुत रुदन करने लगा | तब माँ ने उन्हे आशीर्वाद दिया की मेरे नाम से पहले तुम्हारा नाम आएगा “रानी सती” नाम इसी कारण से प्रसिद्ध हुवा बताते है | घोड़ी झुन्झुनू के उत्तर दिशा  में आकर रुक गयी | भस्म को वही एक जाटी जे बांध कर राणा ने घर में जाकर सारा वृतांत सुनाया | ये सब सुनकर माता पिता भाई बहिन सभी शोकाकुल हो गये | ओर जहाँ घोड़ी रुकी थी वह छोटा चुतरा बनाया गया और भस्म उसमें रखकर पूजा की गई ।कहा जाता गई कुछ लोगो ने सती होने पर संदेह प्रकट किया तो उसी समय पूजा के समान ओर  भस्मी कुंड जो चबूतरे पर रखा था चिंगारियां निकलने लगी ओर भयंकर आग चिता की तरह जलने लगी ।ऐसा कहा जाता है कि ये आग 13 दिन तक जलती रही और फिर लोगो द्वारा काफी प्रार्थना करने और माफी मांगने पर अग्नि शान्त हुई और एक आवाज सुनी की यहाँ पूजा अर्चना की जाए मैं यही विराजित रहूंगी ओर इसी के साथ धरती फ़टी ओर भस्म,घोड़ी ओर जो समान साथ था वो सब का सब उसी जगह जमीन में समा गया और फिर चबूतरा वैसा का वैसा बन गया इसके बाद दादी की आज्ञनुसार भस्म की जगह पर एक सुंदर मंदिर का निर्माण कराया । जो आज राणी सती मंदिर के नाम से विख्यात है।
एक पौराणिक इतिहास दन्त कथा ये भी है की महाभारत के युद्ध में चक्रव्यूह में वीर अभीमन्यु वीर गति को प्राप्त हुए थे | उस समय उत्तरा जी को भगवान श्री कृष्णा जी ने वरदान दिया था की कलयुग में तू “नारायाणी” के नाम से श्री सती दादी के रूप में विख्यात होगी और जन जन का कल्याण करेगी, सारे दुनिया में तू पूजीत होगी | उसी वरदान के स्वरूवप श्री सती दादी जी आज से लगभग 715 वर्ष पूर्व मंगलवार माघ शीर्ष वदि नवमीं सन् 1352 ईस्वीं 06.12.1295 को सती हुई थी 
नोट  :- जितनी मुझे दादी के बारे में जानकारी मिली थी जितना मैने पढ़ा, सुना व देखा सो लिख दिया, अगर इसमें कोई गल्ती हो तो माफ करना और सुधार हेतु बताना ताकि सुधार किया जा सकें   सुधार हेतु इस नम्बर 9829277798  पर जरूर बजाये या काॅमेंट में लिखें
“जगदंबा जग तारिणी, रानी सती मेरी मात!
भूल चूक सब माफ़ कर, रखियो सिर पर हाथ !!”       

जय दादी राणी सती की 
आपके पढ़ने लायक यहां भी है।  

शादी की सालगिरह आज हुए 10 साल

आये नवराते माता के,नव रात्री स्पेशल

 सरकार ने तो पहले ही कर दिया,इस साल श्रृष्टि ने भी किया किसानों को निराश,मालीगांव

आपा डोलर में हिडांगां आपा चकरी मैं बैठांगा मेला बगड़,लक्ष्य के इंजॉय के कुछ

राजस्थान का मेवा फल सांगरी स्वाद बे मिशाल

राजस्थान का गौरव कल्प वृक्ष कहा जाने वाला वृक्ष खेजड़ी (जांटी) है खतरे में ??

लक्ष्य


Saturday, August 24, 2019

कानजी एकर फेर पाछा आज्यो,सब कुछ बदलग्यो

सभी देशवासियों को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं
एक राजस्थानी  कविता पढ़ने को मिली भाव बहुत ही मार्मिक ओर समय परक है थे भी पढज्यो

आठ तो पटराण्यां थारे
राधा रुकमणं राणीं।
अठै एक इक्कीस बरोबर
दिनभर खेंचाताणीं।

आप तो माखण मिसरी खांता
म्हैं खावां हां मेगी।
थारा मन री पूरी होगी अर
म्हारे मन में रेगी।

मात जसोदा मिक्सी लेली
नहीं माखण नहीं मटका।
आप तो लूट लूट कर खांता
म्हांनें आवे भटका।

नहीं रिया अब ऊंखल मूसल
नहीं रिया अब छींका।
दरसण दुरलभ होग्या असली
दूध दही अर घी का।

गोपियां मोडर्न होयगी
नहीं सुणे बे बंशी।
राजनिती में घुसबा लाग्या
थारा यादव वंशी।

आज थारी गायां रा बछडा
बूचडखानां जावे।
ब्रह्माजी नें केजो आंनें
ब्रह्मलोक ले जावे।

नहीं मांगे बो चांद खिलोणों
नहीं माखणं अर रोटी।
आज कन्हैयो नहीं केवे है
कबहुं बढेगी चोटी।

न तनसुख है न मनसुख है
सब धनसुख नें है चावे।
नवलख धेनु बेच नंदजी
डेरी अबै चलावे।

कुंजन वन मैदान होयग्या
नहीं कदम री छायां।
प्लास्टिक री थेल्यां चाबे
नंदगांव री गायां।

कृष्ण कानजी भारत मे थे एकर पाछा आज्यो।
मुरली मधुर बजाकर कान्हां
गीता रो ग्यान सुणाज्यो।

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