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Tuesday, January 13, 2015

कपकपी वाली ठण्ड, सरसों की फसल व लक्ष्य की स्कूल

  सर्दी का मौसम है  इन दिनों ठण्ड पड़ रही हैं यूं कहे की कपकपी  वाली ठण्ड पड़ रही हैं  गर्म कपड़ों से बहार निकला मानो खतरें को दावत देने के बराबर है। और उपर से ये घना कोहरा सुबह 11 बजे तक जाने का नाम ही नहीं लेता और शहरों की बजाय हमारे गाँव में इसका प्रकोप ज्यादा रहता है क्योंकि यहाँ पानी का फिराव ज्यादा रहता है


  शहरों की बजाय हमारे गाँव में इसका प्रकोप ज्यादा रहता है क्योंकि यहाँ पानी का फिराव ज्यादा रहता है

क्योंकि गांवों में ज्यादतर कुओ से सिचाई होती है और सिंचाई में फुवारा वगैरह से पानी का बिखराव ज्यादा रहता है इसलिए गाँवों में धुंध कोहरा घना व ज्यादा देर तक रहता हैं  सुबह सुबह बिस्तर से बहार निकलने का मन हीं नहीं करता है। पर क्या करें निकलना तो पड़ता है?


 सबसे ज्यादा दिक्क्त इस सर्दी में बच्चों की है उन्हें एक तो स्कूल में जाना उसके लिए सुबह सुबह नहा धोकर तैयार होना/करना बेचारों के लिए एक आफत है यहीं हाल मेरे बेटे लक्ष्य का है बेचारा सुबह सबुह सर्दी को देखकर स्कलू जाने से मुह चुराने लगता है कहता है पापा आज की छुट्टी कर दो ना! पर छुट्टी भी कब तक करें स्कलू तो जाना ही पड़ता है

बेचारा मन मार कर रो धो कर हो जाता है तैयार... इसलिए कभी उसकी फोटो खिंचकर तो कभी किसी और किसी चिज का लालच देकर उसे रोज भेजना पड़ता है वैसे हमारे घर में देखें तो बसे पहले नहा धेकर अगर कोई तैयार होता है तो वह है लक्ष्य क्योकि उसकी स्कूल बस 9 बजे आ जाती है  इसलिए उसे सुबह 8.15 बजे नहाना पड़ता है वो नन्ही सी जान और ये सर्दी और उपर से ये कोहरा वो  स्कूल जाने का भूत...  पर भई पढ़ना भी तो उसे ही है ....

मैं तो  जब तक बिस्तर से ही नहीं निकल पाता हूं

आपके पढ़ने लायक यहां भी है।



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ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 

लक्ष्य

Thursday, February 13, 2014

मेरे खेत का पांच फिट लम्बा पालक, मालीगांव

 आपने गेहूँ सरसों  आदि के पौधे की लम्बाई 5-6 फिट की देखी व सुनी होगी लेकिन अब आप देखिए पालक का पाँच फिट लम्बा पौधा जो मेरे घर पर एक क्यारी में लगा (उगा) हुआ है। आपको भी यह सुनकर व देखकर आश्चर्य होगा की पालक भी 5 फिट लम्बा हो सकता है।  जी हां मैने घर पर सब्जी वगैरह में मैंने एक क्यारी में पालक भी लगा रखा है।
 उसी क्यारी में से पांच- सात पौधे काफी लम्बें बढ़ रहें है जिनकी लम्बाई 5 फिट से उपर हैं जो मेरे लिए ही नहीं गांव के लोगों के लिए भी कोतुहल का विषय बना हुआ है। एक पालक के पौधे की  इतनी लम्बाई हमने इससे पहले कभी न ही देखी और न ही सुनी है। और इन पौधों का तना भी 2 से 2.5 इंची तक का मौटा है।

 लोग इस इन पौधों को देख कर आश्चर्य चकित हो रहें है।  अगर पालक को पौधा बीज भी देता है तो उसकी अमूमन् लम्बाई 2 से 2.5 फिट तक ही बढ़ सकती हैं इससे ज्यादा नहीं लेकिन इन पौधों ने तो हद ही पार कर दी।
और एक पौधे के उपर 15 बिस साट निकली हुई हैं उनकी लम्बाई भी इनके बराबर ही है। और तने पर बीज और पत्ते आये हुये है।
इसके पत्ते भी काफी चौड़े व लम्बें है।
   इस क्यारी में सिर्फ देशी गोबर की खाद ही डाली गई है।इसके अलावा अन्य कोई खाद नहीं डाली गई है, यानि ये  फूल आरगेनिक (देशी) खेती है। और इसके पत्तों की सब्जी भी बहुत स्वादिष्ट बनती है।
 ये तो हुई पालक के पौधों की बात और अब बात रही इस मौसम की अन्य फसलों की तो इस बार बारिश मावठ न होने की वजह से बाकी फसलें इतने रंग ढ़ग पर नहीं हैं चने की फसल तो बिलकुल खत्म हैं लोगों का बान बिज भी वापिस नहीं आने वाला है।  फिर भी कुल मिलाकर कुओं की फसल ठीक ठाक है। 
 सरसों की बड़ी (अगेती) फसल को सर्दी की कुछ चपेट आई और  छोटे वाली ( पछेती) सरसों की फसल ठीक ठाक है। सरसों के फूल झड़ने लगें हैं फलियां पकने लगी है।

गैहूं की फसल जौ  व मेथी की फसल इस समय परवान पर हैं और अच्छी खड़ी हुई है।
जौ की फसल पर  इस समय बाले आई हुई दाने आ रहें है।
यह है मालीगांव की खेती का हाल चाल फिर मिलते है नई खोज खबर के साथ तब तक के लिए इजाज़त...










आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

त्रिमूर्ति कल्ब नारनोद द्वारा फुटबाल प्रतियोगिता का आयोजन

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ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 

लक्ष्य

Tuesday, July 16, 2013

ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 मेरे बेटे लक्ष्य ने इस बार 15 अप्रेल को अपने तीन साल पुरे कर लिये है। इसलिए इस वर्ष उसे स्कूल में भेजना जरूरी हो गया है। गावं में कोई अच्छी स्कूल है नहीं और  सरकारी स्कूलों में आपको पता है कैसी पढ़ाई होती है। वहां तो बस टाईम पास होता है। तो अब उसके लिए अच्छी स्कूल ढ़ूढ़नी थी गांव की स्कूल का विकल्प तो बंद हो गया था अब दूसरा विकल्प था बगड़ नगर की स्कूलों का वो भी अंग्रजी माध्यम की क्योकि जमान अब अंग्रजी माध्यम का है।  इसलिए जमाने को देखते हुए लक्ष्य को भी  अंग्रेजी माध्यम की स्कूल में ही डालना था
इसलिए मैने बगड़ की  स्कूलों में जा जा कर जांच पड़ताल शुरू कर दी किसी स्कूल में व्यवस्था अच्छी नहीं मिली कहीं स्टाफ अच्छा नहीं मिला कहीं स्कूल बस की व्यवस्था नहीं मिली अन्त में बगड़ में पिछले 4-5 वर्षो से नई खुली स्कूल ज्योति विद्यापीठ बाई पास, बगड़ में जाना पड़ा वहां पर कुल मिलाकर रंग ढ़ग अच्छा लगा तो लक्ष्य का भी एडमीशन वहीं करवाना पड़ा
 एक तो उस स्कूल की बस हमारे निवास स्थान तक पहले की सालों से ही आ रही थी इसलिए मुझे वहीं उपयुक्त लगा क्योकि छोटे बच्चे के लिए सबसे पहली जरूरत साधन यानि उसे घर से लाना और स्कूल से घर तक छोड़े की समस्या सबसे ज्यादा रहती है। इसलिए उस स्कूल का साधन यानी बस पहले से ही जा रही थी अतः मैने अन्ततः  लक्ष्य का एडमीशन 6 जुलाई को बगड़ नगर की ज्योति विद्यापीठ स्कूल जो बाई पास रोड़ के पास स्थित है में करवा दिया ।



एक दो दिन तो लक्ष्य ने रोना धोना ही नहीं छोड़ा ‘‘ कहा पापा आप भी मेरे साथ स्कूल चलों आप यही बैठे रहो मैं यहां नहीं रहुगां बगेर बगेर बहाने  बच्चा था करता भी क्या घर को छोड़ने को मन भी किसका करता हैं उसको रोता देख मुझे मेरा बचपन याद आ गया मैं भी तो ऐसे ही रोते राते स्कूल जाया करता था  वो जमाना अलग था हाथ में पट्टी और जेब में सिर्फ बरता होता था

 आजकल तो सबसे पहले बस्ता लाद दिया जाता है बच्चे की पीठ पर और उसमें वो 8-10 कोर्स की किताबे फिर लक्ष्य को समझाया और टोफी बिस्किट बगैरह का लालच दिया और दो चार दिन उसे अकेली ही स्कूल में पुरे टाईम रहने दिया स्कूल से पता चला वो पुरे दिन रोता रहता है और पापा के पास जाने की जिद्द करता रहता हैं  फिर एक दो दिन में सब सामान्य होता नजर आया मुझे खुशी हुई आखिर लक्ष्य का मन स्कूल में लगने लग गया मैने सोचा चलो पप्पू पास हो गया

और अब उसका स्कूल जाना बिलकुल सामान्य हो गया और वो आये दिन नई नई चिजो की फरमाइश करने लगा वो भी स्कूल से संबंधी चिजो की जैसे मुझे पेंसिल ला दो मुझे रबर ला दो मुझे कापी ला दो किताब दिला दो  बस्ता ला दो मैने उसकी जरूरत के मुताबिक उसे सब साधन लाकर दे दिया आज वो अपना बैग पिछे लटका कर जब चला जब पुरा विद्यार्थी लग रहा था मुझसे रहा नहीं गया और मैने उसे अपने कैमरे में कैद कर लिया


 वह अपने पिछे स्कूल बैग लटकाए बहुत ही अच्छा लग रहा है। और मुझे मेरा बचपन याद दिला रहा है। और अब तो उसे स्कूल की तरफ से होम वर्क (गृह कार्य) भी दिया जाने लगा हैं साम को मेरे घर जाते ही वह कहता है पापा मैने आंक मडावो अतार्थ मेरा गृह कार्य करवाइये और मैं उसका हाथ पकड़कर उसका कार्य पुरा करवाता हू।  अभी वो कुछ ज्यादा तो लिखना नहीं सिखा है पर अभी उसे स्कूल जाते हुए दिन भी तो 7 ही हुए है। धीरे धीरे सिख जायेगा।


 घर आकर जब वो अपनी नोट बुक, कच्ची पेंसिल, सोपनर, रबर लेकर स्कूल का कार्य करने बैठता तो बहुत ही अच्छा लगता हैं  एसा लगता है कि अपना पुरा ध्यान गृह कार्य करने में लगा देता है अभी स्कूल की तरफ से उसे ए सिखाया जा रहा है। और हा एक बात उसमें जरूर देखने को मिली जब भी उससे कोई गल्ती हो जाती है तब  अपने कान पकड़कर कहता है सोरी पा  यानि  अक्षर ज्ञान के साथ साथ मैनर्स भी सिख रहा है। 


हां मैं आपको ये तो बताना भुल ही गया इस वर्ष नर्सरी कक्षा में उसका एडमीशन हुआ है उसके लिए उसकी फिस और बस किराया तथा अन्य चुट पुट मिलाकर खर्चा लगभग 18 20 हजार पहुच जायेगा। एक हमारा जमाना था
और एक आज का जमाना... बच्चे को स्कूल में बैठना सिखाने के लिए 20 हजार रूपये खर्च करने पड़ रहें हैं पर करे भी तो क्या जमाना आधुनिकता का है।
हमारे जमाने में सरकारी स्कूलों में मात्र 51 रूपये फिस में पुरी 8 वीं तक की पढ़ाई पुरी कर ली थी और आज ....


 हाम वर्क के बाद जब वो सोता है तब कहता है मुझे सुबह जगान मै। स्कूल में लेट हो जाउगां गाडी आ जायेगी और सुबह एक आवाज लगाने से झट से उठ खड़ा होता है और नहा धोकर चल पड़ता है अपनी स्कूल बस की तरफ...
 और दोपहर स्कूल छुटने के बाद घर जाना और आपना हाम वर्क करना ये ही उसकी दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया है। 
 मुझे उसकी ये  दिनचर्या बहुत ही अच्छी लगी इसलिए मैने उसको अपने कैमरे में कैद कर यादास्त के लिए और आपके साथ शैयर करने के लिए रख लिया
उसकी इस दिनचार्या को देखकर मुझे 8.10 साल पहले  राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत एक बार गावं में नुक्कड़ नाटक में बगड़ के प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार भागीरथ सिंह भाग्य  द्वारा गाये गये गीत की वो दो पंक्तिया धुधली सी याद आ गई
‘‘ लेल्यो पट्टी बरतो कि पढ़णों जरूर है !
बिन पढ़या सब बिन पुछ्या का लंगूर है।!!
लेल्यो पट्टी बरतो कि पढ़णों जरूर है...."




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ये कैसा मेरे देश का दुर्भाग्य ?? 18 या 16 ??

सभी देसवासियों को वेलेन्टाईन डे की बधाईयां

किसानों की उम्मीद, फसलें लहलाई,मालीगांव,

  विदेशी सैलानियो के संग मकर संक्रांति की मस्ती,बगड़

लक्ष्य

Monday, January 14, 2013

पतंग उड़ा रे छौरा पतंग उड़ा , लक्ष्य,मालीगांव

 आज मकर संक्रांति का दिन है आज सवेरा मौसम काफी कोहरे भरा था सुबस सुबह 10 बजे तक काफी धुंध (कोहरे)भरा मौसम रहा, हाथ को हाथ दिखाई नहीं दे पा रहा था ऐसा लग रहा था कि आज तो पंतग बाजी का मजा ही किरकिरा होने वाला है।
 पर सूर्य भगवान ने आखिर पंतंग प्रेमियों की सुन ही ली और 11 बजे जोरदार धूप निकल आई सब लोग चढ़ गये अपने- अपने पंतग और मांझा लेकर अपनी -अपनी छतो पर और आकाश में उडने लगी रंग बिरंगी पंतगें कोई इधर तो कोई उधर
 और इस शुभ कार्य में मेरा बेटा लक्ष्य कहां पिछे रहने वाला था, मुझे कहने लगा " पापा मंनै भी पतग ला दे" तो मै उसके लिए स्पेशल पंतग लाया वो थे गैस से भरे गुब्बारे क्योकि पंतग तो वो अभी उडा नहीं सकता क्योकि अभी वो 2-3 साल का बच्चा ही तो है तो उसके लिए गैस के गुब्बारे ही पंतग बने
 
 तो वो उसे ही पंतग की तरह उडाने लगा और मैने उसे कैद कर लिया अपने कैमरे में ,और वो अपने तरीके से आनन्द लेने लगा । और बेक-ग्राउण्ड म्यूजिक चलने लगा और वो भी एक सुपरहिट  राजस्थानी गाना " पंतग उडा रे छोरा पतंग उडा"
 और वो झुमने लगा  ये थी मेरे बैटे की मकर सक्रंति और और फिरे मै चल पड़ा बगड़ नगर की तरफ क्योकि मुझै तो वहा पर जाकर पंतग बाजी का लुफ्त उठाना था
वहां पर मैने काफी दोस्तों के संग पंतग बाजी की जिसका सचित्र वर्णन मैं आपके सामने अपनी अगली पोस्ट में करूगां जहा मैने और मेरे दोस्तों  सहित कई विदेशी सैलानियो ने भी जमकर पंतग बाजी का लुफ्त उठाया।  तो अगली पोस्ट का करें इंतजार...
 तब तक के लिए इजाज़त ....


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ये लो फिर एक नया वर्ष हो मुबारक

इस शताब्दी(सदी) के 12 12 12 को सलाम

दीपावली के कुछ खूबसूरत जगमगाते नजारे,बगड़

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

  कटरा से मां वैष्णो देवी के दरबार तक

वाघा (बाघा) बार्डर परेड,अमृतसर

लक्ष्य

Thursday, July 5, 2012

रोज सुबह की मस्ती खरगोश के बच्चों के साथ, लक्ष्य

 रोजाना सुबह उठते ही मेरा 2 साल का बेटा लक्ष्य अपनी पूरी जिम्मेदारी के साथ चल पड़ता हैं अपने चहेते खरगोश के बच्चो के साथ आंख मिचोली खेलने तथा उनकी देखभाल करने जब उसकी दादी मां यानि मेरी मा कहती है लक्ष्य पहले दुध पीले बाद में खेल लेना तो कहता है दुध बाद में पहले बच्चों के साथ खेलुगां यही आलम हर रोज सोते समय भी रहता हैं।

मैने अपने घर मालीगांव Maligaon  में खरगोश का जोड़ा पाल रखा है।  हुआ यूं कि कुछ रोज पहले मेरे एक सबसे अच्छे  दोस्त आरीफ ने मुझे कहा कि उसके पास खरगोश को जोड़ा है (वैसे  मुझे पालतू जानवर पालने का बड़ा (शोख)लगाव  है।) तो मैने उसे कहा यार एक बच्चा मुझै भी दे दे तो उसके कहा अगर आप चाहो तो पुरा जोड़ा ही ले जा सकते हो तो फिर क्या था? मैं पहुच गया उसके घर और ले आया उससे खरगोश का जोंड़ा और उसके साथ एक छोटा खरगोश का बच्चा । उस दिन जब शाम को घर आया तो खरगोश को देखकर मेरे बेटे का तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा  बस खाना पीना छोड कर बैठ गया उनके साथ खेलने और भाग दोड़ करने उस दिन तो उसे बड़ी मुश्किल से सुलाया पर सुबह उठते ही फिर कहने लगा बच्चे कहां हैं? जब तक उसके सामने बच्चे नहीं लाये गये तब तक बैचेन रहा और फिर खरगोश को देखते ही दोड़ने लगा उनके पिछे उस दिन से लेकर आज तक उसका यही रूटेन रहता है और अब तो ऐसा लगता है कि हमारे से ज्यादा खरगोशों की देखभाल का जिम्मा उसने अपने सर ले लिया है कभी उन्हे हरी दुब घास जो कि खरगोश को प्रिय भोजन होता है लाकर डालता है कभी उनको पानी पिलाता हैं ।कभी उन्हे अपने बिस्कुट खिलाता है। और वो खरगोश और उनका वो छोटा बच्चा भी हमारी बजाय उसके साथ ही ज्यादा लगाव रखता है उसके हाथो से ही पानी पिता है और बिसकिट भी छिनकर खा लेता है और लक्ष्य उन खरगोशों को अपने हिस्से के बिस्किट खिला देता है और फिर हमें कहता है कि मुझे और बिस्कुट दोऔर फिर दुबारा उन्हे ही डाल आता है।  



 यह है मादा खरगोश जब भाग दोड़ से थक जाती है तो छिडके गये पानी में अपने पैर पसार कर लेट जाती है। जैस उसे तो बहुत ज्यादा गर्मी लगती हो
 कभी अपनी मांद खोदने लगती हैं और वो अब नये ब्च्चे जन्म देने वाली है।
 ऐसा अटूट बंधन बन गया है लक्ष्य और उन भोले जानवरों में वो भी उसकी गोद में आकर बैठ जाते हैं और वो उन्हे बड़ा लाड प्यार करता हैं छोटे वाले बच्चे को ता लक्ष्य अमूमन अपनी गोद में ही लिये रखता है। पर वो भी बहुत चालाक है फर से उसकी गोद से निकल कर भाग जाता हैं और उससे दौड़ लगवाता हैं इस प्रकार लक्ष्य उनके साथ आंख मिचोली और मस्ती करता रहता हैं यहां तक की अपना खाना पिना भुल कर उनकी देखभाल करता रहता है।  



अपनी गोद में बैठाकर लाड प्यार करता लक्षय
खरगोश को उसकी मांद से बाहर निकालता लक्ष्य
दुबक कर बैठा खरगोश

 वैसे  तो  उन्हे लोहे के पिजरे में रखते है क्योकि हमारा घर खेत में है वहा बिल्ली और कुत्ते बहुत है इसलिये उन्हे खुला छोड़ना खतरे से खाली नहीं है फिर भी  उन्हे हमारी देख रेख में खुले छोड़ते है तो वो अपनी मांद खोदने में लग जाते है और बडै ही अदब ढ़ग से मिट्टी को पिछे ढकेलते रहते हैं उनकी माद खोदने का तरीका बहुत सराहनीय है।


अपनी मांद खोदती मादा खरगोश

मादा खरगोश की मांद खुदाई में मदद करता नर खरगोश और उसका बच्चा

अपनी मस्मी में उछल कुद करते खरगोश व उसका बच्चा






बस इतना ही फिर मिलते है इस  मादा खरगोश  के बच्चे जन्म की जानकारी के साथ ....


















आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

चलायें अपनी मर्जी से अपने कम्प्यूटर की विन्डोज

 बालाजी के आशीर्वाद के साथ लक्ष्य का दुसरा जन्म दिन

बेचारा जमींदार झेल रहा सर्दी और सरकार की मार

  सोनू की जिद और नाहरगढ़ दर्शन,जयपुर

मेरे बाप पहले आप( लक्ष्य का बाल हट )

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