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Sunday, February 23, 2020

फाल्गुन मास,होली और धमाल,मोज़ मस्ती कहाँ गए वो दिन?सब कुछ बदल गया

नमस्कार दोस्तो 10 फरवरी  से ही लग चुका है फाल्गुन मास ओर फाल्गुन मास में ही आता है रंगों मोज़ मस्ती, हर्ष उल्लास का त्यौहार  होली  ।और फाल्गुन मास का नाम सुने ओर मौज मस्ती और धमाल न हो तो फाल्गुन अधूरा है ।हालांकि आजकल त्योहार फीके पड़ते जा रहे हैं उतना उल्लास आजकल त्योहारों में देखने को नही मिलता। एक पहले का समय था जब फाल्गुन लगते ही रोपा जाता था होली का डांडा ओर चारो तरफ सुनाई पड़ती थी धमलो , ढपो ,चंगो  बयार।एक महीने तक चलती थी मौज मस्ती गाँवो की चौपालों में रात 8 बजे से रात 12-1बजे तक बजता था ढप ओर  गाये जाते थे होली धमाल निकाले जाते स्वांग। गाँव के बूढ़े,बड़े, बच्चे, ओर औरते सब आकर जमा हो जाते थे गांव की चौपाल में ओर लुफ्त उठाते थे। ओर एक महीने तक रोज शाम महिलाएं घर के चौक में इकट्ठी होकर होली के लोग गीत गाती थी।आजकल ये सब कलाएं लुप्त होती जा रही है कारण क्या है ये तो आप ही बताए? मेरे अंदाज़ से तो लोगो का धार्मिक रूप से धर्म से कम होता रुझान,आपसी मेलजोल का कम होना लोगो की धर्म पे प्रति कम होती रूचि,टीवी,मोबाइल,शोशल मीडिया, आदि के कारण ये खत्म होते जा रहे है




ये वो समय था जब हम बच्चे भी जाते थे अपने बड़ो के साथ गाँव की चौपाल में ओर सुनते थे धमाल ओर देखते यह उस समय का मनोरंजन का एक मात्र साधन स्वांग।स्वगों में गाव के ही लोगो की आवाज व नकल की जाती थी और जनता हो हँसाया जाता था उस समय चाहे किसी की भी नकल कर हँसाया जाए कोई नाराज़ नही होता था अब ये मुमकिन नही लो छोटी छोटी बातों पर झगड़ने लगते है।शायद ये भी एक कारण है जिससे कि ये कलाये लुप्त हो गई है । उस समय मन को लुभाने वाले सुरीले मीठे धमाल ढप के साथ सुनने को मिल जाते थे आजकल ये सिर्फ फोन और होम थिएटर पर ही सुनने को मिलते है चौपालों में नही इर सही माने तो आजकल बहुत कम लोग ही बचे है जिन्हें ढप बजाना ओर धमाल गाना आता है ।ये भी एक कला है ढप बजाना और उस पर धमाल गाना ओर चंग बांसुरी बजाना
आज ये सब खत्म प्रायः होता जा रहा है। कारण क्या है ये तो आप ही बता सकते है?
 तो उसी क्रम जो जीवित रखने के लिए मैं लेकर आया हु आपके सामने शेखावाटी के सुप्रसिद्ध चंग धमाल सुनिए ओर आनंद उठाइये
सुनिए ये धमाल

5

पैसों प्यारो ऐ दुनिया मे पैसों जादू गारो ये, शेखावाटी का बहुत ही शानदार राजस्थान होली चंग धमाल 


6

शेखावाटी का सुप्रसिद्ध चंग धमाल कटवादे_मेरा_श्याम_चंनण_बिडलो 


7

मेरी छोटी सी उमरिया जुल्म करे, बहुत लोकप्रिय होली धमाल नगीना डांसर के नए अंदाज़ के साथ





आपके पढ़ने लायक यहां भी है। 

सरसों की फ़सल परवान पर ,मालीगांव

शादी की सालगिरह आज हुए 10 साल

आये नवराते माता के,नव रात्री स्पेशल

 सरकार ने तो पहले ही कर दिया,इस साल श्रृष्टि ने भी किया किसानों को निराश,मालीगांव

आपा डोलर में हिडांगां आपा चकरी मैं बैठांगा मेला बगड़,लक्ष्य के इंजॉय के कुछ

राजस्थान का मेवा फल सांगरी स्वाद बे मिशाल

राजस्थान का गौरव कल्प वृक्ष कहा जाने वाला वृक्ष खेजड़ी (जांटी) है खतरे में ??

लक्ष्य


Sunday, August 2, 2015

राजस्थानी (मारवाड़ी) लोक (गीत) गायन तेजा

सावन माह की हार्दिक शुभकामनाएं
सभी देश वासियों, दोस्तों,ब्लॉग जगत के सभी पाठकों , ब्लॉग मालिको को मित्रता दिवस की हार्दिक बधाईयां


‘‘ ऐ प्रभु आप मुझको इतना तो दो ।,
मेरे हर दोस्त का घर खुशियों से भर दो।।’’
 
इन्ही शब्दो के साथ पढिये ये सावन का  लेाक गीत  तेजा
तेजा लोक गीत
गाज्यौ-गाज्यौ जेठ'र आषाढ़ कँवर तेजा रॅ
लगत ही गाज्यौ है सावण-भादवो
सूतो-सूतो सुख भर नींद कँवर तेजा रॅ
थारोड़ा साहिना बीजॅं बाजरो। उठ्यो-उठ्यो पौर के तड़कॅ कुँवर तेजा रॅ
माथॅ तो बांध्यो हो धौळो पोतियो
हाथ लियो हळियो पिराणी कँवर तेजा रॅ
बॅल्यां तो समदायर घर सूं नीसर्यो
काँकड़ धरती जाय निवारी कुँवर तेजा रॅ
स्यावड़ नॅ मनावॅ बेटो जाटको।
भरी-भरी बीस हळायां कुँवर तेजा रॅ
धोळी रॅ दुपहरी हळियो ढाबियो
धोरां-धोरां जाय निवार्यो कुँवर तेजा रॅ
बारह रॅ कोसां री बा'ई आवड़ी।।
बैल्या भूखा रात का बिना कलेवे तेज।
भावज थासूं विनती कठै लगाई जेज।।
मण को रान्दियो खाटो खीचड़ो।
लीलण खातर दल्यो दाणों कँवर तेजा रॅ
साथै तो ल्याई भातो निरणी।
दौड़ी लारॅ की लारॅ आई कँवर तेजा रॅ
म्हारा गीगा न छोड़ आई झूलै रोवतो।
ऐहड़ा कांई भूख भूखा कँवर तेजा रॅ
थारी तो परण्योड़ी बैठी बाप कॅ
ऐ सम्हाळो थारी रास पुराणी भाभी म्हारा ओ
अब म्हे तो प्रभात जास्यां सासरॅ
हरिया-हरिया थे घास चरल्यो बैलां म्हारा ओ
पाणिड़ो पीवो नॅ थे गण तळाव रो।
थारो मामोसा परणाया पीळा-पोतड़ा।
गड पनेर पड़ॅ ससुराल कँवर तेजा रॅ
रायमल जी री पेमल थारी गौरजां
पहली थारी बैनड़ नॅ ल्यावो थे कंवर तेजा रॅ।
पाछै तो सिधारो थारॅ सासरॅ।।
डांई-डांई आँख फरुखे नणदल बाई ये
डांवों तो बोल्यो है कंवलो कागलो
कॅ तो जामण जायो बीरो आसी बाई वो
कॅ तो बाबो सा आणॅ आवसी
बाईसा नॅ पिहरिये भेजो नी सास बाईरा
मायड़ तो म्हानॅ लेबानॅ भेज्यो
चार दिना की मिजमानी घणा दिनासूं आया
राखी री पूनम नॅ पाछा भेजस्यां
सीख जल्दी घणी देवो सगी म्हारा वो
म्हानॅ तो तीज्यां पर जाणों सासरॅ
तेजल आयो गांव में ले बैनड नॅ साथ
हरक बधायं बँट रही बड़े प्रेम के साथ
मूहूर्त पतड़ां मैं कोनी कुंवर तेजा रॅ
धोळी तो दिखॅ तेजा देवली
सावण भादवा थारॅ भार कंवर तेजा रॅ
पाछॅ तो जाज्यो सासरॅ
गाड़ा भरद्यूं धान सूं रोकड़ रूपया भेंट
तीजां पहल्यां पूगणों नगर पनेरा ठेठ
सिंह नहीं मोहरत समझॅ जब चाहे जठै जाय
तेजल नॅ बठै रुकणुं जद शहर पनेर आय
माता बोली हिवड़ॅ पर हाथ रख
आशीष देवूं कुलदीपक म्हारारै
बेगा तो ल्याज्यो पेमल गोरड़ी
खिड़की बागां री बेगी खोलो बनमाली रे
बारै भीगे बेटो जाट को
कोनी कुंची खिड़का री म्हारा कंवरांओ
कुंची तो लेगी पेमल गोरजां
बाग में बेगी जावो भोजाई म्हारी ओ
साथै तो ले जावो झूलो झूलरो
हाथां मेहंदी लगी है सायब म्हारा वो
दागां तो लागेला धोळी धोतियाँ
छत्रिय धर्म की लाज राखो कँवर तेजा रै,
म्हारी गायां तो लेगा रै मीणा चोरडा.
म्हारी गायां जल्दी ल्यावो थे तो जीजा वो,
भूखा तो अरड़ावे छोटा कैरड़ा .
क्षत्रिय थारो धर्म कँवर तेजा रै,
गौरां मैं अरड़ावे बाळक बाछड़ा.
दोय घड़ी ढब ज्यावो परन्या सायबा,
झगडा री बैल्या मैं घोड़ी थामस्युं.
डूंगर पर डांडी नहीं, मेहां अँधेरी रात
पग-पग कालो नाग, मति सिधारो नाथ
शूरा मत कर माथा फोड़ी, पाछी फेरल्यो थारी घोड़ी
घर मैं बाट देख रही गौरी, आ जिंदगानी है थोड़ी
ओ थारो केरड़ो संभालो लाछा गूजरी
तेजल ने जाणों है आगे आसरै
आई ज्योंही पाछी मुड़ज्या लीलण म्हारी ए
बचना रो बांध्योड़ो बदलो चुकस्याँ
सासु सुसरा न दीजै राम जुवारी
पेमल न दीजै मेमद मोलियो
अठै देखी ज्यों कह दीजै पेमल न
घडी रै पलक रो तेजो पावनों
लीलन घोडी की आँखों से आंसू टपकते देख तेजाजी ने कहा -
"लीलन तू धन्य है. आज तक तूने सुख-दुःख में मेरा साथ निभाया. मैं आज हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारा साथ छोड़ रहा हूँ. तू खरनाल जाकर मेरे परिवार जनों को आँखों से समझा देना."
माँ न प्रणाम कर सांचोडा समाचार बतला दीजै
काका, बाबा न प्रणाम कीजै हाथ जोड़
भाई न भौजायाँ कीजै निमणूं
बाई राजल न धीरज दे हाथ फेरणां
नागराज ने कहा - तेजा नागराज कुंवारी जगह बिना नहीं डसे. तुम्हारे रोम-रोम से खून टपक रहा है. मैं कहाँ डसूं?
तेजाजी ने कहा नागराज मुझे वचन चूक मत करो. अपने वचन को पूरा करो. मेरे हाथ की हथेली व जीभ कुंवारी हैं, मुझे डसलो.
बालू नाग नतमस्तक हो गया और बोला -
'धन्य है तेजा तुम्हारे माता-पिता, धन्य है तुम्हारी शूरवीरता और प्राण. आज कालिया हार गया और धौलिया जीत गया.
बालू नाग ने कहा की तेजा देवता के रूप में पूजे जावेंगे तथा पीडितों के दुखों का संहार करेंगे. किसान खेत में हल जोतने से पहले तेजाजी की पूजा करेंगे.
पेमल सुरसुरा में सती हो जाती है
तेजाजी के बलिदान का समाचार सुनकर पेमल के आँखों के आगे अँधेरा छा गया. उसने मां से सत का नारियल माँगा, सौलह श्रृंगार किये, परिवार जनों से विदाई ली और सुरसुरा जाकर तेजाजी के साथ सती हो गई. पेमल जब चिता पर बैठी है तो लीलण घोडी को सन्देश देती है कि सत्य समाचार खरनाल जाकर सबको बतला देना.
सुसराजी न पावां धोक कह दीजै
सासुजी न कीजै पगां लागणा
बाई राजल न दीजै रिमझिम बोलणी
मन मैं रहगी सासुजी की पोल देखती
परण्यो जातो निजरां देखती
कहते हैं कि अग्नि स्वतः ही प्रज्वलित हो गई और पेमल सती हो गई. लोगों ने पूछा कि सती माता तुम्हारी पूजा कब करें तो पेमल ने बताया कि - "भादवा सुदी नवमी की रात्रि को तेजाजी धाम पर जागरण करना और दसमी को तेजाजी के धाम पर उनकी देवली को धौक लगाना, कच्चे दूध का भोग लगाना. इससे मनपसंद कार्य पूर्ण होंगे. यही मेरा अमर आशीष है "
भाया रै उतरता भादुडा री नवमी की रात जगायज्यो
दसम न धोकज्यो धौल्या री देवली
काच्चा दूध को भोग लगाज्यो
थारा मन पसंद कारज सिद्ध होसी
आ ही म्हारी अमर आशीष है
लीलन घोड़ी सतीमाता के हवाले अपने मालिक को छोड़ अंतिम दर्शन पाकर सीधी खरनाल की तरफ रवाना हुई परबतसर के खारिया तालाब पर कुछ देर रुकी और वहां से खरनाल पहुंची. खरनाल गाँव में खाली पीठ पहुंची तो तेजाजी की भाभी को अनहोनी की शंका हुई. लीलन की शक्ल देख पता लग गया की तेजाजी संसार छोड़ चुके हैं.
कैयां आई बिरंगो लीलण म्हारी ए
कठोड़ै छोड्यो है देवर लाडलो
कहते हैं कि लीलण घोडी खरनाल आकर तेजा की भाभी को बोली कि तुम्हारा देवर शहीद हो गया है और पेमल उनके साथ सती हो गई है.
देवर थारो वीर गति पाई है
सती तो होगी है पेमल जाटणी कलयुग के इतिहास में घोड़ी का मुंह बोलना पहला उदाहरन है जय वीर तेजा जी

Friday, April 24, 2015

लुप्त होती भारतीय संस्कृति- इसे बचाये पर कैसे ?

हमारी आंचलिक संस्कृति कहें चाहे इसे भारतीय संस्कृति कहें इसमें बहुत से शब्द या चीजे  इस समाज से लुप्त  नष्ट होते जा रहें है,ऐसा लगता है आने वाली पिढ़ी इन चीजों के नाम सुनकर ताज्जुब करेगी की ये भी कोई वस्तुए, नाम, चीजे हुआ करती थी  ,आप सभी से अनुरोध है कि इस नष्ट होती संस्कृति को बचायें ये हमारी धरोहर है हमारी सभ्यता है।  ये जो नीचे शब्द एक कविता के माध्यम से दिये जा रहें है वो शब्द आज से 2 या 3 दशक पहले हमारें सामाजिक अंचल में ही प्रयोग में लाये जाते रहें हैं कुछ एक तो आजकल भी प्रचलन में पर अधिकांशतः लुप्त हो गये है घर के किसी बुढे बड़े से ही सुनने को मिलते हैं ,ये पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव ही तो है जो आज हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहें हैं हो सकता है ये नाम आप सबने कहीं न कहीं तो जरूर सुने होंगें लेकिन अब ये  बहुत कम देखते सुनने को मिलते है।  कृपया इस नष्ट होती संस्कृति को बचायें ये हर भारतीय का दायित्व है और इस  आंचलिक राजस्थानी कविता का आनन्द उठायें
लुगाईयां का घाघरा ,खिचड़ी का बाजरा
सिरसम का साग ,सर पे पाग
आंगण में ऊखळ, कुणे में मूसळ,
ढूंढते रह जाओगें
घरां में लस्सी, लत्ते टांगण की रस्सी,
आग चूल्हे की ,संटी दुल्हे की,
कोरड़ा होळी का ,नाळ मोळी का,
पहलवांना का लंगोट ,हनुमान जी का रोट
ढूंढते रह जाओगें
घूँघट आळी लुगाई ,गावां मै दाई,
लालटेण का चानणा ,बनछटीयां का बालणा,
बधाई की भेल्ली ,गांव में हेल्ली,
घरां मै बुढ्डे, बैठकां में मुढ्डे
ढूंढते रह जाओगें
बास्सी रोटी अर अचार गळिया में घुमते लुहार,
खांड का कसार,टींट का आचार,
कांसी की थाळी,डांगरा के पाळी,
बीजणा नौ डांडी का, दूध दही घी हाँडी का,
सरोई में दरांत, बाळका की दवात,
ढूंढते रह जाओगें
बटेऊआं की शान ,बहुआ की आन
पील गर्मियां मैं ,गूंद सर्दिया मै
ताऊ का हुक्का,ब्याह का रुक्का
बोरला  नानी का, गंडासा सान्नी का
कातक का नहाण, मूंज के बाण
ढूंढते रह जाओगें
चूळ आळी जोड़ी (किवाड़), गिनती में कोड़ी
कोथळी साम्मण की ,रौनक दाम्मण  की 
पाटड़े पै नहाणा, पातळ पै खाणां
छात्यां मै  खड़ंजे अर कडी,गुग्गा पीर की छड़ी,
लूणी घी की डळी,ग्वार की फळी
पाणी भरे डेग,बाहण बेटियां के नेग
ढूंढते रह जाओगें
मोटे सूत की धोत्ती,घी बूरा अर रोटी,
पीळे चावळा का न्यौता, सात पोतियां पै पौत्ता
धोण धड़ी के बाट,मूंज जेवड़ी की खाट
घी के मांट,भुन्दे हुए टाट
गुल्ली डण्डे का खेल ,गुड़ की सेळ
ब्याव के बनौरे ,सुहागी के छुहारे
तांगे की सवारी दुध की हारी
पेंचदार पगड़ी ,गोट्टे आळी चुन्दड़ी
सर पै भरोट्टी, कमर पै चोटी
ढूंढते रह जाओगें
कासंण मांजण का जूणा, साधूआं का बळता धूणा
गुग्गे का गुलगला ,बालक चुलबुला
बोरले आळी ताई,सूत की कताई
मुल्तानी अर गेरू,बळद अर रेहडू
कमोई अर करवे, चा पाणी के बरवै
ब्याह में खोड़िया बालकां का पोड़िया
हटड़ी अर आळा, बड़कुलां की माला
दूध पै मळाई,लौगां मै समाई
खेता मैं कोल्हू, नामां मै गोल्हू
ढूंढते रह जाओगें
गुड़ की सुहाळी,खैतां मै हाळी
हारे की सिलगती आग, ब्याह में पेठे का साग 
हाथ का बांटा बांण, सरगुन्थी आळी नाण
हाथ मै झोळा, खीर का कचोळा
डयोढ़ी की सोड बन्दड़े का मोड़ (सेहरा)
खेत में बैठ के खाणा ,डोल्या का सिरहाना
लावणी करती लुगाईया ,पाणी भरती पणिहारियां
डेला नीचे खाट,भाठा (पत्थर) के बाट
ढूंढते रह जाओगें
सीर मै भौरी ,अनपढ़ छोरी
चरमक चूं की जूती,दूध प्याण की तूंती
मावस की खीर,पहंडे का नीर
गर्मियों मैं राबड़ी,खेता मैं छाबड़ी
घरां में पाेळी, कोरड़े की होळी
चणे के साग की कढ़ी,चाबी ते चालती घड़ी
काबुआं कांसी का ,काढ़ा खांसी का 
काजळ कौचें की ,शुद्धताई चोके की 
गुलगला बरसात का ,चुरमा संकरात का 
सिठणे लुगाईयों के नखरें हलवाईयों के 
भजनी अर ढ़ोलक, माटी के गुल्लक
ढूंढते रह जाओगें 
नष्ट होती भारतीय  संस्कृति को बचायें  भारत बचायें
ये कविता बुढ़ो बड़ों से सुनी हुई है। आज इसे आपके सामने शेयर करने का मौका मिला अगर कोई आंचलिक शब्द, शब्दार्थ समझ में न आये तो मेल द्वारा या फोन द्वारा पुछ सकते है।  

 आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

राजस्थानी होळी धमाल सुनिये एम पी थ्री में HOLI DHAMAL IN MP3

  फागण धमाल

तेज हवा ने ललचाया मन पर सर्दी ने किया निराश मकर संक्रांति

राधा ने कृष्ण को रिझाया तो भोले ने भक्तों को भ्रमाया, श्री श्याम महोत्सव,बगड़


नव वर्ष मंगलमय हो, अब देखो 14 का कमाल

  लक्ष्य का अपने अंदाज में लक्ष्मी (दीपावली) पूजन,मालीगांव

ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 

लक्ष्य


Sunday, December 5, 2010

शेखावाटी में होने वाली शादीयों के विचित्र रिवाज

 सबसे पहले काफी दिनों बाद आप सभी पाठकों ब्लॉग मित्रों गुरूजनों को मेरा सादर प्रणाम
आपको बता दूं कि मैं पिछले काफी दिनों से शादीयों में व्यस्त था इसलिए कुछ नया लिख नहीं पाया और और पढ भी नहीं पाया शादीयों में इसलिए कि अपना धंधा ही ऐसा हैं स्टूडियों का भाई पेट पुजा के लिए बुकिंग लेकर जाना पड़ता है। हम फोटो ग्राफरों या यू कहें कि स्टूडियो वालों का काम ही ऐसा हैं कि हमसे शादी विवाह के किसी भी प्रकार के रश्म रिवाज छिपे नहीं हैं या यू कहे कि पूरी की पूरी शादी हमारी निगाहों के सामने से होकर गुजरती है।  और एक नई बात यह कि अनजान जगह होते हुए भी हमें पहचान बनाने की कोई जरूरत ही नहीं पड्रती सिर्फ हमारा टूल केमरा ही हमारी पहचान बना देता हैं और दोनों पार्टियों के साथ बहुत ही जल्दी हमें इस प्रकार से घुल मिला देता हैं कि यह तक पता नहीं चलता कि हम कोई अंजान है। या अंजान जगह आये है। 

 सबसे खस बात यह कि घर के बड़े बुढ़ो सहित बहु बेटियां सभी बेझिझक हमारे साथ घुलमिल जाते है।  यहा तक कि घुंघट की आड़ में रहने वाली बहुऐ भी हमारे सामने बेपर्दा होने से नहीं सकपकाती  क्योकि भाई फोटो खिचाने का शोख जो रहता है।भले ही शादी के दो दीन बाद हम जाये तो वे घुघट न हटाऐ पर इस समय तो सटाक से कहे अनुसार एक्शन करती है।  ये तो रही हमारे धंधे के खास हुनर की बात
अब आपको कुछ ऐसे रिवाजों के बारे में बताने जा रहा हूं जिसके बारे में खुद बुजुर्ग लोगों को भी कोई खास तथ्य नहीं पता लेकिन वे इनको निभाते जा रहें है। 









सबसे पहले मैं जिक्र करता हूं एक रिवाज चाक पूजन की
महिलाए इक्ट्ठा होकर खाली नये मटके लेकर कुम्हार (एक जाती जो मटके बनाने का कार्य करती है। ) के घर पर जाती हैं और वहा पर रखे चाक (जो मटके बनाने के काम आता है।) उसका पूजन मूंग, तेल,रोली, मोली और चावल, गुड चढ़ाकर उसका पूजन करती है।और फिर वहां एक घेरा बनाकर क्षेत्रिय गीतों पर नृत्य करती हैं हालाकि आजकल आधुनीकरण की होड में नई झलक देखने को मिल जाती है कि डी.जे के गानों पर नृत्य होने लगा है। इस रिवाज के बारे में पुछे जाने पर बुजुर्ग लोग सिर्फ यही बताते हैं कि "ये रिवाज पहले से ही चला आ रहा है। इसलिए हम भी यह निभाते है।" तथ्य क्या कुछ पता नहीं अगर आप विद्वान लोग जानते हैं तो बताने की कृपा करें। 


 वैसे तो शादी में बहुत से रिवाज होते हैं परन्तु मैं यहा उन प्रमुख रिवाजों के बारे में बताना चाहता हूं जो कि बिना किसी तथ्य के घिसते चले आ रहें है।


दूसरा  प्रमुख रिवाज देखने को मिलता है। समधी जच्चा
इसमें  दुल्हे के पिताजी को जच्चा (बच्चे की मा) बनाया जाता हैं उसका पूरा श्रृंगार किया जाता हैं और गोद मेंछोटा बच्चा रखा जाता है। तथा थाली बजाई जाती है। अर्थत वहीं सिस्टम जो बच्चे के जन्म लेने पर घर में किया जाता है। यह सब शादी में करने का क्या तात्पर्य है। और वो भी दुल्हे के पिताजी के साथ मेरे तो समझ से परे की बात हैं मैं इसको आत तक नहीं समझ पाया हूं हालांकि  शादियों में ऐसा देखता जरूर हूं। पता करने पर जबाब वो ही उपर वाला गोल मोल अब ये भी आप ही बतायें?


अगला रिवाज है।  (बर्तन) थाली खिसकाना और इक्ट्ठा करना
अर्थात गृह प्रवेश रश्म इसमें जब दुल्हा दुल्हन को लेकर घर में प्रवेश करता हैं तो लडत्रके की मां द्वारा पर अन्दर की तरफ 7 थालीयां रखती है। और दुल्हा उन थालियों को अपनी कटार से इधर उधर खिसकाता रहता है।  पिछे से दुल्हन उन थालियों को अक्ट्ठा करती रहती है। वो भी बिना टनटनाहट की आवाज के ऐसा माना जाता हैं कि अगर थाली इक्टठा करने में कोई आवाज हुई तो सास बहु की लडाई हो सकती है।  इस रश्म को निभाने से लड़ाई कितनी हद तक रूकती हैं ये तो आप सब भली भांति जानते ही है। ज्यादा बताने से क्या फायदा पुछे जाने पर इसके दो तीन उत्तर आये वो हैं कि  इससे अगर घर का मर्द यानी दुल्हा अगर घर की वस्तुए बिखेरता हैं तो औरत यानि दुल्हन को ऐसा होना चाहिए कि वो उसे समेट ले-
यह कि इससे दुल्हन के आज्ञाकारी होने का पता चलता है।
यह कि इससे सास बहु में हमेशा बनी रहती हैं झगड़ा नहीं होता  अब आप ही बताये कि ये किस हद तक सही है।



अगला रिवाज हैं सोट सोटकी यह रिवाज बहुत ही रोचक और आश्चर्यजनक रिवाज है। कुछ समय पहले यानि गृहप्रवेश में तो झगड़ा न होने की बात की जाती हैं और उसके कुछ समय के बाद ही यह रश्म अदा की जाती है। इसमें सबसे पहले दुल्हा आपसे में नीम या जाल की सोटकी से एक दुसरे को मारते हैं और फिर दुल्हे के सांग दुल्हे की भाभीयां इसी क्रम में खेलती हैं और दुल्हन के साथ उसके देवर खेलते है। और कही कही तो दुल्हन के ननदोई यानी कि दुल्हे के जीजा जी भी दुल्हन के सांग खेलते है। कही कही तो देखा जाता हैं कि यह खेल भंयकर हो ताजा है। और एक गुस्से का रूप लेकर शरीर को चोट पहुचाने लायक बन जाता है। मजाक मजाक में ये लोग एक दुसरे को चोट पहुचा देते है। और आक्रामक रूप से खेलने लगते है।  इसके पिछे क्या तथ्य हैं ये भी लोग नहीं बता पाये




अगला रिवाज हैं जुआ खेलना यह रिवाज भी विचित्र है। इसमें दुल्हा दुल्हन आपस में अपने कांगन डोरे खोलते हैं और दुल्हे की भाभी उसमें दुल्हन की मुंदड़ी (अंगूठी) मिलाकर उन दोनों को एक कोरे नये कुण्ड नुमा मिटटी के पात्र में दुध और पानी डालकर सात बार यह खेल लिखवाती है। इसमें यह देखा जाता है। हैं उस सफेद पानी में सेडाला गया डोरा और वो मुंदड़ी (अंगूठी) पहले कौन निकाल कर लाता हैं दुल्हा या दुल्हन  जो ज्यादा बार लाता हैं वह जितता है। और अंत में दुल्हा दुल्हन की मुटठी को खोलकर उसमें वो अंगूठी पहना देता है। यह भी विवाह का अटपटा लगने वाला रिवाज लगता है। जिसका कोई तथ्य परक उत्तर आज तक सामने नहीं आया और भी कई ऐसे रिवाज है। जिनका कोई तथ्य नहीं निकलता है।
और मैं आपको यह बता देता हूं कि आप सभी शादी शुदा लोग इन सभी रश्मों से होकर गुजर चुके हो परन्तु  शायद ही कोई इन रश्मों का तथ्य जानता हो बस करते आ रहे है। करते आ रहें है ...मुझे 8-10 साल हो गये स्टूडियों का कार्य करते हुए लेकिन इन रिवाजों के बारे में मैं आज तक सही नहीं जान पाया तो फिर ये रिवाज क्यों निभाये जा रहें यह सवाल मन में हर शादी में जरूर उठता है। लोगों से पुछ भी लेता हूं फिर सोचता हूं कि हमें क्या हमें तो मजदूरी करनी है। आज मेंने सोचा क्यों न ये सावाल आपके सामने भी खड़ा कर दूं आब आप ही सका कोई सटीक जबाब ढ़ूढ़ कर पेश करने की कृपा करें।

अब आपके सामने दो ऐसे दृश्य हैं जो जो अपने आप में मायने रखते हैं एक है गाय का दुध दोहती हुई मिहला जो अपने बेटे की शादी के कार्य को  बीच में छोड़कर गाय के प्रेम में एसी रमी की तीन दिन तक स्पेशल रूप से आग्रह करके अपनी फोटो खिचाने के लिए दुबारा दुध निकालने लगी कितना प्रेम करती हैं ये अपने पालतु पशुओं को कितना मातृत्व हैं इस गाय को अपने बछड़े से ये आप फोटो को देखकर अंदाज लगा सकते है।


दुसरा हैं घेड़ी डीजे पर 8 फुट उंची छलांग लगाती हुई
लेकिन यह नाच नहीं रही है। यह डीजे की आवाज और लोगों सें भड़कर बेकाबू हो गई और दूसरी घेड़ी पर उछल कुद करने लगी इससे दो महिलाओं को भी चोट आई शुक्र इतना हैं कि उस समय तक दुल्हा इसके उपर नहीं था नहीं तो और भी दुर्घटना घट सकती थी

ये थे हमारे क्षेत्र में होने वाले शादी विवाह के विचित्र रिवाज और हमारा अंदाज

आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

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