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Sunday, August 2, 2015

राजस्थानी (मारवाड़ी) लोक (गीत) गायन तेजा

सावन माह की हार्दिक शुभकामनाएं
सभी देश वासियों, दोस्तों,ब्लॉग जगत के सभी पाठकों , ब्लॉग मालिको को मित्रता दिवस की हार्दिक बधाईयां


‘‘ ऐ प्रभु आप मुझको इतना तो दो ।,
मेरे हर दोस्त का घर खुशियों से भर दो।।’’
 
इन्ही शब्दो के साथ पढिये ये सावन का  लेाक गीत  तेजा
तेजा लोक गीत
गाज्यौ-गाज्यौ जेठ'र आषाढ़ कँवर तेजा रॅ
लगत ही गाज्यौ है सावण-भादवो
सूतो-सूतो सुख भर नींद कँवर तेजा रॅ
थारोड़ा साहिना बीजॅं बाजरो। उठ्यो-उठ्यो पौर के तड़कॅ कुँवर तेजा रॅ
माथॅ तो बांध्यो हो धौळो पोतियो
हाथ लियो हळियो पिराणी कँवर तेजा रॅ
बॅल्यां तो समदायर घर सूं नीसर्यो
काँकड़ धरती जाय निवारी कुँवर तेजा रॅ
स्यावड़ नॅ मनावॅ बेटो जाटको।
भरी-भरी बीस हळायां कुँवर तेजा रॅ
धोळी रॅ दुपहरी हळियो ढाबियो
धोरां-धोरां जाय निवार्यो कुँवर तेजा रॅ
बारह रॅ कोसां री बा'ई आवड़ी।।
बैल्या भूखा रात का बिना कलेवे तेज।
भावज थासूं विनती कठै लगाई जेज।।
मण को रान्दियो खाटो खीचड़ो।
लीलण खातर दल्यो दाणों कँवर तेजा रॅ
साथै तो ल्याई भातो निरणी।
दौड़ी लारॅ की लारॅ आई कँवर तेजा रॅ
म्हारा गीगा न छोड़ आई झूलै रोवतो।
ऐहड़ा कांई भूख भूखा कँवर तेजा रॅ
थारी तो परण्योड़ी बैठी बाप कॅ
ऐ सम्हाळो थारी रास पुराणी भाभी म्हारा ओ
अब म्हे तो प्रभात जास्यां सासरॅ
हरिया-हरिया थे घास चरल्यो बैलां म्हारा ओ
पाणिड़ो पीवो नॅ थे गण तळाव रो।
थारो मामोसा परणाया पीळा-पोतड़ा।
गड पनेर पड़ॅ ससुराल कँवर तेजा रॅ
रायमल जी री पेमल थारी गौरजां
पहली थारी बैनड़ नॅ ल्यावो थे कंवर तेजा रॅ।
पाछै तो सिधारो थारॅ सासरॅ।।
डांई-डांई आँख फरुखे नणदल बाई ये
डांवों तो बोल्यो है कंवलो कागलो
कॅ तो जामण जायो बीरो आसी बाई वो
कॅ तो बाबो सा आणॅ आवसी
बाईसा नॅ पिहरिये भेजो नी सास बाईरा
मायड़ तो म्हानॅ लेबानॅ भेज्यो
चार दिना की मिजमानी घणा दिनासूं आया
राखी री पूनम नॅ पाछा भेजस्यां
सीख जल्दी घणी देवो सगी म्हारा वो
म्हानॅ तो तीज्यां पर जाणों सासरॅ
तेजल आयो गांव में ले बैनड नॅ साथ
हरक बधायं बँट रही बड़े प्रेम के साथ
मूहूर्त पतड़ां मैं कोनी कुंवर तेजा रॅ
धोळी तो दिखॅ तेजा देवली
सावण भादवा थारॅ भार कंवर तेजा रॅ
पाछॅ तो जाज्यो सासरॅ
गाड़ा भरद्यूं धान सूं रोकड़ रूपया भेंट
तीजां पहल्यां पूगणों नगर पनेरा ठेठ
सिंह नहीं मोहरत समझॅ जब चाहे जठै जाय
तेजल नॅ बठै रुकणुं जद शहर पनेर आय
माता बोली हिवड़ॅ पर हाथ रख
आशीष देवूं कुलदीपक म्हारारै
बेगा तो ल्याज्यो पेमल गोरड़ी
खिड़की बागां री बेगी खोलो बनमाली रे
बारै भीगे बेटो जाट को
कोनी कुंची खिड़का री म्हारा कंवरांओ
कुंची तो लेगी पेमल गोरजां
बाग में बेगी जावो भोजाई म्हारी ओ
साथै तो ले जावो झूलो झूलरो
हाथां मेहंदी लगी है सायब म्हारा वो
दागां तो लागेला धोळी धोतियाँ
छत्रिय धर्म की लाज राखो कँवर तेजा रै,
म्हारी गायां तो लेगा रै मीणा चोरडा.
म्हारी गायां जल्दी ल्यावो थे तो जीजा वो,
भूखा तो अरड़ावे छोटा कैरड़ा .
क्षत्रिय थारो धर्म कँवर तेजा रै,
गौरां मैं अरड़ावे बाळक बाछड़ा.
दोय घड़ी ढब ज्यावो परन्या सायबा,
झगडा री बैल्या मैं घोड़ी थामस्युं.
डूंगर पर डांडी नहीं, मेहां अँधेरी रात
पग-पग कालो नाग, मति सिधारो नाथ
शूरा मत कर माथा फोड़ी, पाछी फेरल्यो थारी घोड़ी
घर मैं बाट देख रही गौरी, आ जिंदगानी है थोड़ी
ओ थारो केरड़ो संभालो लाछा गूजरी
तेजल ने जाणों है आगे आसरै
आई ज्योंही पाछी मुड़ज्या लीलण म्हारी ए
बचना रो बांध्योड़ो बदलो चुकस्याँ
सासु सुसरा न दीजै राम जुवारी
पेमल न दीजै मेमद मोलियो
अठै देखी ज्यों कह दीजै पेमल न
घडी रै पलक रो तेजो पावनों
लीलन घोडी की आँखों से आंसू टपकते देख तेजाजी ने कहा -
"लीलन तू धन्य है. आज तक तूने सुख-दुःख में मेरा साथ निभाया. मैं आज हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारा साथ छोड़ रहा हूँ. तू खरनाल जाकर मेरे परिवार जनों को आँखों से समझा देना."
माँ न प्रणाम कर सांचोडा समाचार बतला दीजै
काका, बाबा न प्रणाम कीजै हाथ जोड़
भाई न भौजायाँ कीजै निमणूं
बाई राजल न धीरज दे हाथ फेरणां
नागराज ने कहा - तेजा नागराज कुंवारी जगह बिना नहीं डसे. तुम्हारे रोम-रोम से खून टपक रहा है. मैं कहाँ डसूं?
तेजाजी ने कहा नागराज मुझे वचन चूक मत करो. अपने वचन को पूरा करो. मेरे हाथ की हथेली व जीभ कुंवारी हैं, मुझे डसलो.
बालू नाग नतमस्तक हो गया और बोला -
'धन्य है तेजा तुम्हारे माता-पिता, धन्य है तुम्हारी शूरवीरता और प्राण. आज कालिया हार गया और धौलिया जीत गया.
बालू नाग ने कहा की तेजा देवता के रूप में पूजे जावेंगे तथा पीडितों के दुखों का संहार करेंगे. किसान खेत में हल जोतने से पहले तेजाजी की पूजा करेंगे.
पेमल सुरसुरा में सती हो जाती है
तेजाजी के बलिदान का समाचार सुनकर पेमल के आँखों के आगे अँधेरा छा गया. उसने मां से सत का नारियल माँगा, सौलह श्रृंगार किये, परिवार जनों से विदाई ली और सुरसुरा जाकर तेजाजी के साथ सती हो गई. पेमल जब चिता पर बैठी है तो लीलण घोडी को सन्देश देती है कि सत्य समाचार खरनाल जाकर सबको बतला देना.
सुसराजी न पावां धोक कह दीजै
सासुजी न कीजै पगां लागणा
बाई राजल न दीजै रिमझिम बोलणी
मन मैं रहगी सासुजी की पोल देखती
परण्यो जातो निजरां देखती
कहते हैं कि अग्नि स्वतः ही प्रज्वलित हो गई और पेमल सती हो गई. लोगों ने पूछा कि सती माता तुम्हारी पूजा कब करें तो पेमल ने बताया कि - "भादवा सुदी नवमी की रात्रि को तेजाजी धाम पर जागरण करना और दसमी को तेजाजी के धाम पर उनकी देवली को धौक लगाना, कच्चे दूध का भोग लगाना. इससे मनपसंद कार्य पूर्ण होंगे. यही मेरा अमर आशीष है "
भाया रै उतरता भादुडा री नवमी की रात जगायज्यो
दसम न धोकज्यो धौल्या री देवली
काच्चा दूध को भोग लगाज्यो
थारा मन पसंद कारज सिद्ध होसी
आ ही म्हारी अमर आशीष है
लीलन घोड़ी सतीमाता के हवाले अपने मालिक को छोड़ अंतिम दर्शन पाकर सीधी खरनाल की तरफ रवाना हुई परबतसर के खारिया तालाब पर कुछ देर रुकी और वहां से खरनाल पहुंची. खरनाल गाँव में खाली पीठ पहुंची तो तेजाजी की भाभी को अनहोनी की शंका हुई. लीलन की शक्ल देख पता लग गया की तेजाजी संसार छोड़ चुके हैं.
कैयां आई बिरंगो लीलण म्हारी ए
कठोड़ै छोड्यो है देवर लाडलो
कहते हैं कि लीलण घोडी खरनाल आकर तेजा की भाभी को बोली कि तुम्हारा देवर शहीद हो गया है और पेमल उनके साथ सती हो गई है.
देवर थारो वीर गति पाई है
सती तो होगी है पेमल जाटणी कलयुग के इतिहास में घोड़ी का मुंह बोलना पहला उदाहरन है जय वीर तेजा जी

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