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Saturday, June 10, 2017

हीरा तो चमके बाळू रेत म।

सभी दोस्तो को  मेरा नमस्कार आज आपके सामने  एक राजस्थानी कविता पेश कर रहा हूं  लेखक को तो पता नहीं चल पाया पर कविता बड़ी अच्छी  है। जिसने में भी लिखी है। उनको मेरा तह दिल से प्रणाम और धन्यवाद । जिन्होने अपनी कविता में पुरे राजस्थनन की आन बान शान को पिरो दिया है। जो हमें यह बता रही हैं कि  राजस्थान में क्या क्या है। ? कविता राजस्थानी भाष में  है और मेरे अंचल से सम्बंध रखती है। इसलिए मेरा आपसे शेयर करने को मन बन गया इस कविता का सारा श्रेय जिन्होने लिखी है उनको जाता है।  
इसमें कवि बताता  है उसने पुरे विश्व में घुम कर देख लिया पर यहां  राजस्थान की बालू रेत में जो है वो उसे कही भी नही देखने को मिला  
उत्तर देख्यो दिख्खणं देख्यो
 देश दिसावर सारा देख्या, 
पणं हीरा तो चमके है बालू रेत में।
मोतीडा भलके है म्हारा देस में।
रणबंका सिरदार अठै है।
मोटा साहूकार अठै है।
तीखोडी तलवार अठै है।
भालां री भणकार अठै है।
साफा छुणगादार अठै है।
नितरा तीज तिंवार अठै है।
बाजर मोठ जंवार अठै है।
मीठोडी मनवार अठै है।
अन धन रा भंडार अठै है।
दानी अर दातार अठै है।
कामणगारी नार अठै है।
मुंछ्यांला मोट्यार अठै है।
पो पाटी परभात अठै है।
तारां छाई रात अठै है।
अर,तेजो तो गावे है करसा खेत में।
हीरा तो चमके है------------।
झीणो जैसलमेर अठै है।
बांको बीकानेर अठै है।
जोधाणों जालोर अठे है ।
अलवर अर आमेर अठै है।
सिवाणों सांचोर अठै है।
जैपर सांगानेर अठै है।
रुडो रणथंबोर अठै है।
भरतपुर नागौर अठै है।
उदयापुर मेवाड अठै है।
मोटो गढ चित्तोड अठै है।
झुंझनूं सीकर शहर अठै है।
कोटा पाटणं फेर अठै है।
आबू अर अजमेर अठै है।
छोटा मोटा फेर अठै है।
अर,डूगरपुर सुहाणों वागड देस में।
हीरा तो चमके है--------------------।

                                                                    पाणीं री पणिहार अठै है।
                                                                     तीजां तणां तिंवार अठै है।
                                                                     रुपलडी गणगौर अठै है।
                                                                     सारस कुरजां मोर अठै है।
                                                                      पायल री झणकार अठै है।
                                                                     चुडलां री खणकार अठै है।
                                                                     अलगोजां री तान अठै है।
                                                                     घूंघट में मुसकान अठै है।
                                                                      खमां घणीं रो मान अठै है।
                                                                     मिनखां री पहचाण अठै है।
                                                                      मिनखां में भगवान अठै है।
                                                                      घर आया मेहमान अठै है।
                                                                        मीठी बोली मान अठै है।
                                                                     दया धरम अर दान अठै है।
                                                       अर मनडा तो रंगियोडा मीठा हेत में।
                                                                 हीरा तो चमके है बालू रेत में।
                                                               मोतीडा भलके है म्हारा देस में।
   गौरी पुत्र गणेश अठै है।
मीरां बाई रो देश अठै है।
मोटो पुष्कर धाम अठै है।
सालासर हनुमान अठै है।
रूणीचे रा राम अठै है।
गलता तीरथ धाम अठै है।
महावीर भगवान अठै है।
खाटू वाला श्याम अठै है।
चारभुजा श्रीनाथ अठै है।
मेंहदीपुर हनुमान अठै है।
दधिमती री गोठ अठै है।
रणचंडी तन्नोट अठै है।
करणी मां रो नांव अठै है।
डिग्गीपुरी कल्याण अठै है।
गोगाजी रा थान अठै है।
सेवा भगती ग्यान अठै है।
अर कितरो तो बखाणूं मरुधर देस नें।
हीरा तो चमके है--।
जौहर रा सैनाणं अठै है।
गढ किला मैदान अठै है।
हरिया भरिया खेत अठै है।
मुखमल जेडी रेत अठै है।
मकराणा री खान अठै है।
मेहनतकश इंशान अठै है।
पगडी री पहचाणं अठै है।
ऊंटां सज्या पिलाणं अठै है।
चिरमी घूमर गैर अठै है।
मेला च्यारूंमेर अठै है।
सीधी सादी चाल अठै है।
गीतां में भी गाल अठै है।
सीमाडे री बाड अठै है।
बेरयां रा शमशाणं अठै है।
तिवाडी रो देश अठै है।
ऐडी धरती फेर कठै है ।
साची केवूं झूठ कठै है ।
समझौ तो बैंकूठ अठै है।
अर आवो नीं पधारो म्हारा देश में।
हीरा तो चमके है बालू रेत में।
मोतीडा झलके है म्हारा देश में।

दोस्तो कुछ कलिष्ट शब्दो के हिन्दी अर्थ मैने अपनी तरफ से लिखे है ताकि आपको पढ़ने में कोई कठिनाई न हो सके । फिर भी कुछ समझ में नही आये तो पुछ सकते है।  +91 9829277798 Surendra Singh Bhamboo
दिख्खण  --  दक्षिण
मोटा साहूकार   -- ज्यादा पैसे वाला  जो ब्याज पर पैसे देता है।
तिखोड़ी  --  तेजधार वाली
नितरा --- रोजका
तिंवार -- त्योहार
पोह पाटी -- सुबह का उगता सूरज
सिवांणो -- इलाका
मोटो गढ़ -- ऊचों विशाल गढ़
खंमा घणी --  राम राम नमस्कार
थान  - मन्दिर स्थान


मिनखां --  मनुष्य
सैनाण -- निशानी
जेड़ी -- जैसी
पिलाण --  ऊंट पर रखा जाने वाला लकड़ी का ढ़ाचा जिसके उपर गाड़ी जोड़ते है। 
च्यारूमेर - हर तरफ
 

 31 दिसम्बर लाईन का खात्मा सबके जहन में घुमती रही मोदी की आत्मा

लक्ष्य

Thursday, March 30, 2017

खेजड़ी वृक्ष की महिमा जो आज खतरे में है

सभी क्षेत्रवासियों, मित्रों को को 30 मार्च राजस्थान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं  और आज  राजस्थान के लोक पर्व गणगौर  का त्यौहार है। तो आप सभी को गणगौर पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं  
मैने कुछ दिन पहले एक पोस्ट डाली थी की राजस्थान का कल्प वृक्ष  राज्य वृक्ष खेजड़ी आज खतरे में है। उसी पर आज नेट पर विचरण करते करते मेरे मित्र  जी आर ढ़ाका फतेहपुरिया की एक खेजड़ी पर रचना पढ़ने का मिली  अच्छी रचना है। रचना में दर्शाया गया है कि किस प्रकार ये वृक्ष खुद दुःख सहन करके भी दुसरो को यानि हमें सुख प्रदान करता  है।   मुझे अच्छी लगी और आपको कैसी लगती हैं  आप जाने

राज्य-वृक्ष खेजड़ी की महिमा

म्हारै मरूधर रो है सांचो,
सुख दुख रो साथी खेजड़लो।
तिसां मरै पण छायां करै है,
करड़ी छाती खेजड़लो।।
आसोजां रा तप्या तावड़ा,
काचा लोहा पिघळग्या,
पान फूल री बात करां के,
बै तो कद ही जळबळग्या,
सूरज बोल्यो छियां न छोडूं,
पण जबरो है खेजड़लो,
सरणै आय'र छियां पड़ी है,
आप बळै है खेजड़लो।।
सगळा आवै कह कर ज्यावै,
मरु रो खारो पाणी है,
पाणी क्यां रो ऐ तो आंसू,
खेजड़लै ही जाणी है,
आंसू पीकर जीणो सीख्यो,
एक जगत में खेजड़लो,
सै मिट ज्यासी अमर रवैलो,
एक बगत में खेजड़लो।।
गांव आंतरै नारा थकग्या,
और सतावै भूख घणी,
गाडी आळो खाथा हांकै,
नारां थां रो मरै धणी,
सिंझ्या पड़गी तारा निकळ्या,
पण है सा'रो खेजड़लो,
'आज्या' दे खोखां रो झालो,
बोल्यो प्यारो खेजड़लो।।
जेठ मास में धरती धोळी,
फूस पानड़ो मिलै नहीं,
भूखां मरता ऊंठ फिरै है,
ऐ तकलीफां झिलै नहीं,
इण मौकै भी उण ऊंठां नै,
डील चरावै खेजड़लो,
अंग-अंग में पीड़ भरी पण,
पेट भरावै खेजड़लो।।
म्हारै मुरधर रो है सांचो,
सुख दुख साथी खेजड़लो।
तिसां मरै पण छयां करै है,
करड़ी छाती खेजड़लो।।

 31 दिसम्बर लाईन का खात्मा सबके जहन में घुमती रही मोदी की आत्मा

लक्ष्य


Thursday, January 5, 2017

गुली डंडा का खेल में ( एक आंचलिक कविता)

ब्लॉग जगत के  सभी पाठको,देशवासियों,  ब्लॉगर मालिको व सभी दोस्तों के परिवार जनों को मेरी तरफ से नव वर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाए
बस बैठे यू ही बचपन की पुरानी बात यात आ जाती है कुछ बाते ऐसी होती है जो कभी भुलाई नही जाती स्वत: ही याद आ जाती है। वो बचपन का खेल.. कूद.... वो पुरे दिन की मोज- मस्ती...  जब यादआते है तो ऐसा लगता है मानों अब हम कहा फंस गये वो दिन बहुत ही अच्छे थे। 
मोबाईल उमें गेम के अलावा कुछ जानती ही नहीं और वो जानना भी नहीं चाहती कारण क्या है ??  ये तो मुझे मालूम नहीं पर ऐसा देखा गया है। हा हमारे समय के बचपन के खेल  और मस्ती के तरीको को किसी ने एक कविता में पिरोया जो मुझे तो बहुत अच्छी लगी सोचा आपके साथ शेयर करू
गुली डंडा का खेल में
लाला और कड़ा मांगता
चौमासा की बरसात म
खावण खातर गड़ा मांगता
डबक बिलाय म
आगला की कमर तोड़ देता
कुवा पर पानी की लड़ाई म
आगला को घड़ो फोड़ देता
और लड़ता भी तो क्यां खातर
मोरया की पांख खातर
बोरया की ढांक खातर
नीम्बू रास की फांक खातर
काकडी और मतीरा खातर
धोलो रंग क घुचर्या खातर
होल्या को धमाल
आथुणा बास म

  चंग कोस र ल्याबा
की चर्चा अगुणा बास म
छाती चौड़ी हु ज्याति
फागण आत्त्त जात्त्त सियाला म
जद कोई धोती आलो
उतरतो कबड्डी पाला म
समझ कम अकड़ घणी
हर एक यार म
सर झुकतो तो खाली
दूल्हा बाबा की सुंवार म
कुड़तो कोनी दाबता पेंट म
कठै लागेड़ी कारी दिख ज्याति
म चुप जद थारी दिख ज्याति
तू चुप जद म्हारी दिख ज्याति
छींक साट्ट पुग ज्याव
उडीकनाला कण उडीकदार
बे डाकिया न रहया अब
बे कागद हुया बेकार
दो ही आदमी होता काम आला
क फौजी क आसाम आला
न ल्याव आगरा क पेठा
न ल्याव कश्मीरी अंखरुट
न जांण कद आव आसामी
हर कद जाव रंगरूट
मिनख बदलग्या

मिनख चारो बदल गयो
मॉडर्न बनबा क चक्कर म
गाँव सारो बदल गयो
बेशक बदलनो वक़्त क सागे
के पासी जो भाग गया वक़्त क आगे
सीख दयूं सब न
इतरी समझ कोनी बीरा
हाँ अलख जगातो जे होतो
कोई साधु संत या फकीरा
  बहुत ही सुन्दर आंचलिक कविता है दोस्तों आपको कैसी लगी?

 31 दिसम्बर लाईन का खात्मा सबके जहन में घुमती रही मोदी की आत्मा

लक्ष्य

Monday, March 14, 2016

कुछ दोस्त बहुत याद आते है..

मै यादों का
किस्सा खोलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत
याद आते हैं.

मै गुजरे पल को सोचूँ
तो, कुछ दोस्त
बहुत याद आते हैं.

अब जाने कौन सी नगरी में,
आबाद हैं जाकर मुद्दत से.
मै देर रात तक जागूँ तो ,
कुछ दोस्त
बहुत याद आते हैं.

कुछ बातें थीं फूलों जैसी,
कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,
मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.

सबकी जिंदगी बदल गयी
एक नए सिरे में ढल गयी

किसी को नौकरी से फुरसत नही
किसी को दोस्तों की जरुरत नही

कोई पढने में डूबा है
किसी की दो दो महबूबा हैं

सारे यार गुम हो गये हैं
"तू" से "तुम" और "आप" हो गये है

मै गुजरे पल को सोचूँ
तो, कुछ दोस्त
बहुत याद आते हैं.

धीरे धीरे उम्र कट जाती है
जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है,
कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है
और कभी यादों के सहारे ज़िन्दगी कट जाती है ...
- किनारो पे सागर के खजाने नहीं आते, फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते ...

- जी लो इन पलों को हस के दोस्त,
फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं आते ...

Wednesday, March 2, 2016

मरवण रा बोल ....राजस्थानी कविता

म्हरा नाँजोगा भरतार
मदछकिया मरवण रा ढोला आ कांई कुबद कमाई
थारै लारै आय र रोटी कदै ही न ताती खाई
म्हारा मूंछ्यांला मोट्यार
ईयूं किकर पङैली पार
दिन भर फिरै भटकतौ छैलो
थौथी करै छैलांया जी
करेंई जावे बीकानेर करेंई जावे जयपुर
10-10 दिन ताणी घरें कोनी आवे
जद भी पूछूं आ ही केवे
अबके ओ लास्ट धरणू है
म्हारा नाजोगा भरतार
म्हारी कियां पङैली पार
मीठा बोल कदै ई ना सुणिया
बटका भरता बौलै
आई वसुंधरा सरकार
कूदण लाग्यो नौ नौ ताळ
भरस ऐक बीत गियौ, अब उपजी है आस
करम कमाई भूल गा साल दियो गुजार
म्हारी ऐक अरज सुणज्यौ वसुंधरा सरकार
म्हारा पिया जी ने दैवो नौकरी जणां पङैली पार
नीतर आँ छोटा - छोटा टाबरां की लागेली हाय

Tuesday, February 9, 2016

नेताओ के हाथ कही वतन बिक न जाये

बिक रहा है पानी,
पवन बिक न जाए ,
बिक गयी है धरती,
गगन बिक न जाए
चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं .,
डर है की सूरज की तपन बिक न जाए ,
हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति,
डर है की कहीं धर्म बिक न जाए ,
देकर दहॆज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को ,
कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए ,
हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता ,
कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए ,
सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद ,
डर है की कहीं संसद भवन बिक न जाए ,
आदमी मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं
डरता है मुर्दा , कहीं कफ़न बिक न जाए।…..

Thursday, December 24, 2015

प्यारी माँ दुनिया का सबसे अनमोल गहना


जब आंख खुली तो अम्‍मा की
गोदी का एक सहारा था
उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको
भूमण्‍डल से प्‍यारा था
उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था
उसके स्‍तन की एक बूंद से
मुझको जीवन मिलता था
हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस मां ने पुचकारा
हमको जी भर के प्‍यार किया
मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी
मैं बनूं बुढापे में उसका
बस एक सहारा कहती थी
उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज
अन्‍तर में सदा सहेजा था
मेरे सारे प्रश्‍नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी
मैं बडा हुआ तो कॉलेज से

इक रोग प्‍यार का ले आया
जिस दिल में मां की मूरत थी
वो रामकली को दे आया
शादी की पति से बाप बना
अपने रिश्‍तों में झूल गया
अब करवाचौथ मनाता हूं
मां की ममता को भूल गया
हम भूल गये उसकी ममता
मेरे जीवन की थाती थी
हम भूल गये अपना जीवन
वो अमृत वाली छाती थी
हम भूल गये वो खुद भूखी
रह करके हमें खिलाती थी
हमको सूखा बिस्‍तर देकर
खुद गीले में सो जाती थी
हम भूल गये उसने ही
होठों को भाषा सिखलायी थी
मेरी नीदों के लिए रात भर
उसने लोरी गायी थी
हम भूल गये हर गलती पर
उसने डांटा समझाया था
बच जाउं बुरी नजर से
काला टीका सदा लगाया था
हम बडे हुए तो ममता वाले
सारे बन्‍धन तोड. आए
बंगले में कुत्‍ते पाल लिए
मां को वृद्धाश्रम छोड आए
उसके सपनों का महल गिरा कर
कंकर-कंकर बीन लिए
खुदग़र्जी में उसके सुहाग के
आभूषण तक छीन लिए
हम मां को घर के बंटवारे की
अभिलाषा तक ले आए
उसको पावन मंदिर से
गाली की भाषा तक ले आए
मां की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है
गर मां अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है

घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी मां क्‍या पाती है
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है
जो मां जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं
मां जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है
मां के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है
मां के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है
मां के चरणों में जन्‍नत है
गिरिजाघर और शिवाला है
हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है
दुनियां में जितनी खुशबू है
मां के आंचल से आई है
मां कबिरा की साखी जैसी
मां तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है
मां आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है
मां वेद ऋचाओं की गरिमा
मां महाकाव्‍य की काया है
मां मानसरोवर ममता का
मां गोमुख की उंचाई है
मां परिवारों का संगम है
मां रिश्‍तों की गहराई है
मां हरी दूब है धरती की
मां केसर वाली क्‍यारी है
मां की उपमा केवल मां है
मां हर घर की फुलवारी है

सातों सुर नर्तन करते जब
कोई मां लोरी गाती है
मां जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है
मां हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है
माना मेरे घर की दीवारों में
चन्‍दा सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल मां की मूरत है
मां सरस्‍वती लक्ष्‍मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है
मां पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है
अम्‍मा तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है
हे मां तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है
सारे तीरथ के पुण्‍य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं
जिनके कोई सन्‍तान नहीं
मैं उन मांओं का बेटा हूं
हर घर में मां की पूजा हो
ऐसा संकल्‍प उठाता हूं
मैं दुनियां की हर मां के
चरणों में ये शीश झुकाता हूं...
प्यारी माँ 
 आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

 करवा चोथ वर्त विशेष

वाह रे ज़माने तेरी हद हो गई

पहले ढंग से इन्सान तो बनो,हिंदुस्तान खतरे में है

 जमाना ले बैठ्या....

 

ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 

लक्ष्य


Tuesday, November 24, 2015

राजस्थानी तड़का कद नीपजेली टीबड़ी

सूका सूका खेतडा पण नैणा मै बाढ ।
घर मँ कोनी बाजरी ऊपर सूँ दो साढ ॥
जद सूँ पाकी बाजरी काचर मोठ समेत ।
दिन भर नापै चाव सूँ पटवारी जी खेत ॥
फिर फिर आवै बादळी घिर घिर आवै मेह ।
सर सर करती पून मँ थर थर कांपै देह ॥
होगी सोळा साल री बेटी करै
बणाव ।
कद निपजैली टीबडी कद
मांडूला ब्याव ॥
टूटी फूटी झूँपडी बरसै गरजै गाज
इण चौमासै रामजी दोराँ रहसी लाज ॥
टाबर टीकर मोकळाँ करजै री भरमार ।
राम रूखाळी राखजै थाँ सरणै घरबार ॥
निरधनियाँ नै धन मिल्यो रोजणख्याँ नै राग ।
राम बता कद जागसी परदेसी रा भाग ॥
उगतो पिणघट ऊपराँ सुणतो मिठी बात ।
गळी गुवाडी घूमतो चान्दो सारी रात
ना पिणघट ना बावडी ना कोयल ना छाँव ।
तो भी चोखो सहर सूँ म्हारो आधो गांव ॥
सांझ ढळ्याँ नित जांवता देखै सारो गांव ।
पिरमा थारी लाडली पटवारी रै ठांव

पैली उठती गौरडी पाछै
उठती भोर ।
झांझर कै ही नीरती सगळा डांगर
ढोर ॥
छैल सहर सूँ बावडै खरचै धोबा धोब ।
पडै गांव मै रात दिन पटवारी सा रोब ॥
जद मन तरस्यो गांव नै जद जद हुयो अधीर ।
दूहा रै मिस
मांडदी परदेसी री पीर

प्रीत
आपरी अचपळी घणी करै
कुचमाद ।
सुपना मै सामी रवै जाग्या आवै याद ॥
पाती लिख रियो गांव नै अपरंच ओ समचार ।
दुख पावुँ परदेस मँ जीवूँ हूँ मन मार ॥
राग रंग नी आवडै कींकर उपजै तान ।
घर मै कोनी बाजरी अर
टूट्योडी छान ॥
घर दे घर रूजगार दे घर घर री दे साख ।
ना देवै तो सांवरा जीवण पाछो राख ॥
बिन हरियाळी रूंखडा घरघूल्या सा ठांव ।
’राही’ दीखै दूर सूँ थारो आधो गांव ॥
लेग्या तो हा गांव सूँ कंचन देही राज ।
पाछी ल्याया सहर सूँ
खांसी कब्जी खाज ॥
गाय चराती छोरडयाँ जोबन सूँ अणजाण ।
देख ओपरा जा लूकै कर जांटी री आण ।।
जोध जुवानी बेलड्याँ मिलसी करयाँ बणाव ।
आखडजै मत पावणा पगडंड्या रै गांव ॥
के तडपासी बादळी के कोयल
री कूक ।
पैली ही सूँ काळजो हुयो पड्यो दो टूक ॥
अजब पीर परदेस री म मर जीवै
जीव ।
घर मै तरसै गोरडी परदेसाँ मै पीव ।।
ना आंचळ ना घूंघटो ना हीवडै मै लाज ।
घिरसत पाळै गोरडी रोटी पोवै राज ॥
घाटै रो घर दे दिये दुख दीजै अणचींत ।
मतना दीजे
सांवरा परदेसी री प्रीत ॥
धान महाजन रै घराँ ढोर बिक्या बे दाम ।
करज पुराणो बाप रो कीयाँ चुकै राम ॥
बेटो तो परदेस मै घर बूढा मा बाप ।
दोनो पीढी दो जघाँ दुख भोगै चुपचाप ॥
ठाला बिन रूजगार कै ताना देता लोग ।
भरी न अब तक गांव सूँ मनस्या बळण जोग ॥
जद जासी परदेस तूँ हुसी जद बरबाद ।
दरद दिसावर ई कडया रोज करैलो याद ॥
कितरा ही दुहा लिखूँ अकथ रहीज्या भाव ।
परदेसी रो दरद तो है गूंगै रो भाव ॥ 

 आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

 करवा चोथ वर्त विशेष

वाह रे ज़माने तेरी हद हो गई

पहले ढंग से इन्सान तो बनो,हिंदुस्तान खतरे में है

 जमाना ले बैठ्या....

 

ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 

लक्ष्य


Thursday, October 29, 2015

वाह रे ज़माने तेरी हद हो गई

गहरी बात लिख दी है किसी शक्शियत नें

बेजुबान पत्थर पे लदे है करोडो के गहने मंदिरो में ।
उसी देहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथो को देखा है।

सजे थे छप्पन भोग और मेवे मूरत के आगे । बाहर एक फ़कीर को भूख से तड़प के मरते देखा है ।।

लदी हुई है रेशमी चादरों से वो हरी मजार ,पर बहार एक बूढ़ी अम्मा को ठंड से ठिठुरते देखा है।

वो दे आया एक लाख गुरद्वारे में हॉल के लिए , घर में उसको 500 रूपये के लिए काम वाली बाई बदलते देखा है।

सुना है चढ़ा था सलीब पे कोई दुनिया का दर्द मिटाने को, आज चर्च में बेटे की मार से बिलखते माँ बाप को देखा है।

जलाती रही जो अखन्ड ज्योति देसी घी की दिन रात पुजारन , आज उसे प्रसव में कुपोषण के कारण मौत से लड़ते देखा है ।

जिसने न दी माँ बाप को भर पेट रोटी कभी जीते जी , आज लगाते उसको भंडारे मरने के बाद देखा ।

दे के समाज की दुहाई ब्याह दिया था जिस बेटी को जबरन बाप ने, आज पीटते उसी शौहर के हाथो सरे राह देखा है ।

मारा गया वो पंडित बेमौत सड़क दुर्घटना में यारो ,
जिसे खुदको काल सर्प,तारे और हाथ की लकीरो का माहिर लिखते देखा है

जिस घर की एकता की देता था जमाना कभी मिसाल दोस्तों ,
आज उसी आँगन में खिंचती दीवार को देखा है।

बंद कर दिया सांपों को सपेरे ने यह कहकर,
अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आएगा।
*************
आत्महत्या कर ली गिरगिट ने सुसाइड नोट छोडकर,
अब इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता।
************
गिद्ध भी कहीं चले गए लगता है
उन्होंने देख लिया कि,इंसान हमसे अच्छा नोंचता है।
************
कुत्ते कोमा में चले गए,ये देखकर,
क्या मस्त तलवे चाटते हुए इंसान देखा है ।

इस कविता को मैने आप तक पहुंचाने मे र्सिफ उंगली का उपयोग किया है!
और

रचियता को सादर नमन 🙏 किया है. - गहरी बात लिख दी है किसी शक्शियत नें

Thursday, October 8, 2015

पहले ढंग से इन्सान तो बनो,हिंदुस्तान खतरे में है

ना मुसलमान खतरे में है,
ना हिन्दू खतरे में है
धर्म और मज़हब से बँटता
इंसान खतरे में है।।

ना राम खतरे में है,
ना रहमान खतरे में है
सियासत की भेट चढ़ता
भाईचारा खतरे में है।।

ना कुरआन खतरे में है,
ना गीता खतरे में है
नफरत की दलीलों से
इन किताबो का ज्ञान खतरे में है।।

ना मस्जिद खतरे में है,
ना मंदिर खतरे में है
सत्ता के लालची हाथो,
इन दीवारो की बुनियाद खतरे में है।।

ना ईद खतरे में है,
ना दिवाली खतरे में है
गैर मुल्कों की नज़र लगी है,
हमारा सदभाव खतरे में है।।

धर्म और मज़हब का चश्मा
उतार कर देखो दोस्तों
अब तो हमारा
हिन्दुस्तान खतरे में है |

एक बनो, नेक बनो
ना हिन्दू बनो ना मुसलमान बनो,
अरे पहले ढंग से इंसान तो बनो।।

Saturday, July 18, 2015

जमाना ले बैठ्या....

जमाना ले बैठ्या....
ढोलां रा मकाना न,आरसीसी ले बैठी;
रोहिड़ा र किवाड़ा न,शिशम ले बैठी;
धोती हारा मोट्यारां न,जिन्स पेंट ले बैठी;
चरभर हारा खेलां न,तीन-पत्ती ले बैठी;
आटा हारा गुलगुलां न,बैसन हारी कचोरी ले बैठी;
पढन हारा छोरां न,वाट्सएप हारी चैटिंग ले बैठी;
ईस हारा मांचा न,डबल बेड ले बैठी;
ऊँट गाडा री सवारी न,हीरो होंडा ले बैठी;
काचरां र साग न,मिरच्यां ले बैठी;
टाबरां री सेहत न,होर्लेक्स री बोतल ले बैठी;
पटा हारा जांघियां न,रूपा बोक्सर ले बैठी;
मुर्गा छाप पटाखां न,एक सौ बीस साउन्ड री डब्बी
ले बैठी;
प्याजिया हारी बुज्जी न,नेस्ले मैगी ले बैठी;
गांव हारा घिन्दड़ न,बिकाऊ क्रिकेट ले बैठी;
गांव हारा छोरां न,बाणीयां री छोरीयां ले बैठी;
चुरू हारी मारवाड़ी न,वाट्सएप हारी अंग्रेजी ले बैठी,
ज्यान हुं प्यारा भाया ने , लुगयां ले बैठी

Thursday, July 16, 2015

फौज में मौज है;

फौज में मौज है;
हजार रूपये रोज है;
थोड़ा सा गम है;
इसके लिए भी रम है;
ज़िंदगी थोड़ी रिस्की है;
इसके लिए तो व्हिस्की है;
खानें के बाद फ्रुट है;
मरनें के बाद सैलूट है;
पहनने के लिए ड्रैस है;
ड्रैस में जरूरी प्रेस है;
सुवह-सुबह पी.टी है;
वॉर्निग के लिए सीटी है;
चलने के लिए रूट है;
पहनने के लिए D.M.S बूट है;
खाने के लिए रिफ्रैशमेंन्ट है;
गलती करो तो पनिशमेंट है;
जीते-जी टेंशन है;
मरने के बाद पेंशन है

मरवण रा बोल..........


म्हरा नाँजोगा भरतार
मदछकिया मरवण रा ढोला आ कांई कुबद कमाई
थारै लारै आय र रोटी कदै ही न ताती खाई

म्हारा मूंछ्यांला मोट्यार
ईयूं किकर पङैली पार
दिन भर फिरै भटकतौ छैलो
थौथी करै छैलांया जी
करेंई जावे बीकानेर करेंई जावे जयपुर
10-10 दिन ताणी घरें कोनी आवे
जद भी पूछूं आ ही केवे
अबके ओ लास्ट धरणू है
म्हारा नाजोगा भरतार
म्हारी कियां पङैली पार
मीठा बोल कदै ई ना सुणिया
बटका भरता बौलै
आई वसुंधरा सरकार
कूदण लाग्यो नौ नौ ताळ
भरस ऐक बीत गियौ, अब उपजी है आस
करम कमाई भूल गा साल दियो गुजार
म्हारी ऐक अरज सुणज्यौ वसुंधरा सरकार
म्हारा पिया जी ने दैवो नौकरी जणां पङैली पार
नीतर आँ छोटा - छोटा टाबरां की लागेली हाय

अच्छे दिन कब आयेँगे...?

दीवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?
यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
*कामचोर सरकारी कर्मचारी पूछता है,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
*देश से गद्दारी करता व्यक्ति पूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
नौकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्तिपूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
राष्ट्रगान के समय बातें करते
स्कूलों के कुछलोग पूछते हैं,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं ***
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
घरों में हर सम़य सिरियल देखती महिलायें पूछती हैं,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
सड़क पर रेड सिग्नल तोड़ते लोग पूछते हैं,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछतेहैं,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?

ये विचार के  GR Dhaka Fatehpuraहै  
जिनको मैने आज सुबह फेसबुक पर विचरण करते पढ़ा मुझे तो अच्छे लगे और आपको कैसे लगे?
मैने सोचा इनके विचारों को आगे तक बढ़ाया जाया से मै आपके सामने इन्हे शेयर कर रहा हूं आपको अच्छा लगे तो बताना 

 आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

  लुप्त होती भारतीय संस्कृति- इसे बचाये पर कैसे ?

राजस्थानी होळी धमाल सुनिये एम पी थ्री में HOLI DHAMAL IN MP3

  फागण धमाल

तेज हवा ने ललचाया मन पर सर्दी ने किया निराश मकर संक्रांति


ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 

लक्ष्य

Friday, April 24, 2015

लुप्त होती भारतीय संस्कृति- इसे बचाये पर कैसे ?

हमारी आंचलिक संस्कृति कहें चाहे इसे भारतीय संस्कृति कहें इसमें बहुत से शब्द या चीजे  इस समाज से लुप्त  नष्ट होते जा रहें है,ऐसा लगता है आने वाली पिढ़ी इन चीजों के नाम सुनकर ताज्जुब करेगी की ये भी कोई वस्तुए, नाम, चीजे हुआ करती थी  ,आप सभी से अनुरोध है कि इस नष्ट होती संस्कृति को बचायें ये हमारी धरोहर है हमारी सभ्यता है।  ये जो नीचे शब्द एक कविता के माध्यम से दिये जा रहें है वो शब्द आज से 2 या 3 दशक पहले हमारें सामाजिक अंचल में ही प्रयोग में लाये जाते रहें हैं कुछ एक तो आजकल भी प्रचलन में पर अधिकांशतः लुप्त हो गये है घर के किसी बुढे बड़े से ही सुनने को मिलते हैं ,ये पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव ही तो है जो आज हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहें हैं हो सकता है ये नाम आप सबने कहीं न कहीं तो जरूर सुने होंगें लेकिन अब ये  बहुत कम देखते सुनने को मिलते है।  कृपया इस नष्ट होती संस्कृति को बचायें ये हर भारतीय का दायित्व है और इस  आंचलिक राजस्थानी कविता का आनन्द उठायें
लुगाईयां का घाघरा ,खिचड़ी का बाजरा
सिरसम का साग ,सर पे पाग
आंगण में ऊखळ, कुणे में मूसळ,
ढूंढते रह जाओगें
घरां में लस्सी, लत्ते टांगण की रस्सी,
आग चूल्हे की ,संटी दुल्हे की,
कोरड़ा होळी का ,नाळ मोळी का,
पहलवांना का लंगोट ,हनुमान जी का रोट
ढूंढते रह जाओगें
घूँघट आळी लुगाई ,गावां मै दाई,
लालटेण का चानणा ,बनछटीयां का बालणा,
बधाई की भेल्ली ,गांव में हेल्ली,
घरां मै बुढ्डे, बैठकां में मुढ्डे
ढूंढते रह जाओगें
बास्सी रोटी अर अचार गळिया में घुमते लुहार,
खांड का कसार,टींट का आचार,
कांसी की थाळी,डांगरा के पाळी,
बीजणा नौ डांडी का, दूध दही घी हाँडी का,
सरोई में दरांत, बाळका की दवात,
ढूंढते रह जाओगें
बटेऊआं की शान ,बहुआ की आन
पील गर्मियां मैं ,गूंद सर्दिया मै
ताऊ का हुक्का,ब्याह का रुक्का
बोरला  नानी का, गंडासा सान्नी का
कातक का नहाण, मूंज के बाण
ढूंढते रह जाओगें
चूळ आळी जोड़ी (किवाड़), गिनती में कोड़ी
कोथळी साम्मण की ,रौनक दाम्मण  की 
पाटड़े पै नहाणा, पातळ पै खाणां
छात्यां मै  खड़ंजे अर कडी,गुग्गा पीर की छड़ी,
लूणी घी की डळी,ग्वार की फळी
पाणी भरे डेग,बाहण बेटियां के नेग
ढूंढते रह जाओगें
मोटे सूत की धोत्ती,घी बूरा अर रोटी,
पीळे चावळा का न्यौता, सात पोतियां पै पौत्ता
धोण धड़ी के बाट,मूंज जेवड़ी की खाट
घी के मांट,भुन्दे हुए टाट
गुल्ली डण्डे का खेल ,गुड़ की सेळ
ब्याव के बनौरे ,सुहागी के छुहारे
तांगे की सवारी दुध की हारी
पेंचदार पगड़ी ,गोट्टे आळी चुन्दड़ी
सर पै भरोट्टी, कमर पै चोटी
ढूंढते रह जाओगें
कासंण मांजण का जूणा, साधूआं का बळता धूणा
गुग्गे का गुलगला ,बालक चुलबुला
बोरले आळी ताई,सूत की कताई
मुल्तानी अर गेरू,बळद अर रेहडू
कमोई अर करवे, चा पाणी के बरवै
ब्याह में खोड़िया बालकां का पोड़िया
हटड़ी अर आळा, बड़कुलां की माला
दूध पै मळाई,लौगां मै समाई
खेता मैं कोल्हू, नामां मै गोल्हू
ढूंढते रह जाओगें
गुड़ की सुहाळी,खैतां मै हाळी
हारे की सिलगती आग, ब्याह में पेठे का साग 
हाथ का बांटा बांण, सरगुन्थी आळी नाण
हाथ मै झोळा, खीर का कचोळा
डयोढ़ी की सोड बन्दड़े का मोड़ (सेहरा)
खेत में बैठ के खाणा ,डोल्या का सिरहाना
लावणी करती लुगाईया ,पाणी भरती पणिहारियां
डेला नीचे खाट,भाठा (पत्थर) के बाट
ढूंढते रह जाओगें
सीर मै भौरी ,अनपढ़ छोरी
चरमक चूं की जूती,दूध प्याण की तूंती
मावस की खीर,पहंडे का नीर
गर्मियों मैं राबड़ी,खेता मैं छाबड़ी
घरां में पाेळी, कोरड़े की होळी
चणे के साग की कढ़ी,चाबी ते चालती घड़ी
काबुआं कांसी का ,काढ़ा खांसी का 
काजळ कौचें की ,शुद्धताई चोके की 
गुलगला बरसात का ,चुरमा संकरात का 
सिठणे लुगाईयों के नखरें हलवाईयों के 
भजनी अर ढ़ोलक, माटी के गुल्लक
ढूंढते रह जाओगें 
नष्ट होती भारतीय  संस्कृति को बचायें  भारत बचायें
ये कविता बुढ़ो बड़ों से सुनी हुई है। आज इसे आपके सामने शेयर करने का मौका मिला अगर कोई आंचलिक शब्द, शब्दार्थ समझ में न आये तो मेल द्वारा या फोन द्वारा पुछ सकते है।  

 आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

राजस्थानी होळी धमाल सुनिये एम पी थ्री में HOLI DHAMAL IN MP3

  फागण धमाल

तेज हवा ने ललचाया मन पर सर्दी ने किया निराश मकर संक्रांति

राधा ने कृष्ण को रिझाया तो भोले ने भक्तों को भ्रमाया, श्री श्याम महोत्सव,बगड़


नव वर्ष मंगलमय हो, अब देखो 14 का कमाल

  लक्ष्य का अपने अंदाज में लक्ष्मी (दीपावली) पूजन,मालीगांव

ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 

लक्ष्य


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