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Thursday, January 5, 2017

गुली डंडा का खेल में ( एक आंचलिक कविता)

ब्लॉग जगत के  सभी पाठको,देशवासियों,  ब्लॉगर मालिको व सभी दोस्तों के परिवार जनों को मेरी तरफ से नव वर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाए
बस बैठे यू ही बचपन की पुरानी बात यात आ जाती है कुछ बाते ऐसी होती है जो कभी भुलाई नही जाती स्वत: ही याद आ जाती है। वो बचपन का खेल.. कूद.... वो पुरे दिन की मोज- मस्ती...  जब यादआते है तो ऐसा लगता है मानों अब हम कहा फंस गये वो दिन बहुत ही अच्छे थे। 
मोबाईल उमें गेम के अलावा कुछ जानती ही नहीं और वो जानना भी नहीं चाहती कारण क्या है ??  ये तो मुझे मालूम नहीं पर ऐसा देखा गया है। हा हमारे समय के बचपन के खेल  और मस्ती के तरीको को किसी ने एक कविता में पिरोया जो मुझे तो बहुत अच्छी लगी सोचा आपके साथ शेयर करू
गुली डंडा का खेल में
लाला और कड़ा मांगता
चौमासा की बरसात म
खावण खातर गड़ा मांगता
डबक बिलाय म
आगला की कमर तोड़ देता
कुवा पर पानी की लड़ाई म
आगला को घड़ो फोड़ देता
और लड़ता भी तो क्यां खातर
मोरया की पांख खातर
बोरया की ढांक खातर
नीम्बू रास की फांक खातर
काकडी और मतीरा खातर
धोलो रंग क घुचर्या खातर
होल्या को धमाल
आथुणा बास म

  चंग कोस र ल्याबा
की चर्चा अगुणा बास म
छाती चौड़ी हु ज्याति
फागण आत्त्त जात्त्त सियाला म
जद कोई धोती आलो
उतरतो कबड्डी पाला म
समझ कम अकड़ घणी
हर एक यार म
सर झुकतो तो खाली
दूल्हा बाबा की सुंवार म
कुड़तो कोनी दाबता पेंट म
कठै लागेड़ी कारी दिख ज्याति
म चुप जद थारी दिख ज्याति
तू चुप जद म्हारी दिख ज्याति
छींक साट्ट पुग ज्याव
उडीकनाला कण उडीकदार
बे डाकिया न रहया अब
बे कागद हुया बेकार
दो ही आदमी होता काम आला
क फौजी क आसाम आला
न ल्याव आगरा क पेठा
न ल्याव कश्मीरी अंखरुट
न जांण कद आव आसामी
हर कद जाव रंगरूट
मिनख बदलग्या

मिनख चारो बदल गयो
मॉडर्न बनबा क चक्कर म
गाँव सारो बदल गयो
बेशक बदलनो वक़्त क सागे
के पासी जो भाग गया वक़्त क आगे
सीख दयूं सब न
इतरी समझ कोनी बीरा
हाँ अलख जगातो जे होतो
कोई साधु संत या फकीरा
  बहुत ही सुन्दर आंचलिक कविता है दोस्तों आपको कैसी लगी?

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