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Sunday, October 7, 2012

कटरा से मां वैष्णो देवी के दरबार तक

 बाघा बॉडर अमृतसर से चलने के बाद हम अपने  अगले व मुख्य दर्शन स्थल जम्मु, कटरा मां वैष्णो देवी के दरबार के दर्शन के लिये  चल पड़े पुरी रात का सफर तय करना था सो  रात के खाने के बाद बस चलती रही और 27 अगस्त को प्रातः 4 बजे के लगभग बस कटरा की पावन स्थली कटरा पहुची, हमने वहां पर होटल सिटी सेंटर को अपना रेन बसैरा बनाया  वहा अपनी सुविधानुसार कमरे किराये पर लिये बस से अपना अपना सामान उतारा और अपने कमरों में रखा और फिर नित्य क्रियाओं से निवृत होने में लग गये, तथा कुछ आराम करने के बाद प्रातः 6 बजे स्नान करने के बाद माता रानी के दर्शनों पर चलने के लिये इक्ट्ठा हो गये। अब हमें कटरा से 15 कि.मी. दूर  त्रिकुट पर्वत पर बने माता के दरबार तक माता के दर्शनों के लिये पहाड़ी चढ़ाई करनी थी सबको अपनी अपनी सुविधानुसार चढ़ाई चढ़ने के निर्देश दिये गये तथा लौटकर वापस इसी होटल पर मिलने के निर्देश भी दिये गये।
कटरा से माता वैष्णों देवी का दरबार (भवन) लगभग 15 किलोमीटर दूर त्रिकुट पहाड़ पर स्थित है। पुरी की पुरी चढ़ाई पहाड़ी है। चढ़ने के लिये वहां पहाड़ पर गोलाई नुमा रास्ते बनाये गये हैं तथा उपर तक जाने के लिये खच्चर (टट्टू), पालकी, बग्घी, पैदल आदि की सुविधा ही है। अगर किसी से चला नहीं जाता है तो वो खच्चर(टट्टू) व पालकी  आदि किराये पर ले सकता हैं उनकी अपनी रेट हैं वो उसे वहां के दर्शन करवाकर निचे तक वापस छोड़ देते हैं 

 हालांकि आजकल एक रास्ता और बनाया जा रहा हैं वहा आटो रिक्सा भी चलने लगें हैं लेकिन वो अभी तक सामान वगैर आदि ढ़ोने के काम ही आ रहे हैं लगता हैं एक दो साल में वो भी सवारी यात्रा के लिये सुविधार्थ काम आने लगेगें हमारे सामने 16 कि.मी. की वो दुर्गम चढ़ाई थी पर मन में माता के दर्शनों की इच्छा और श्रृद्धा थी।

  और फिर उस 16 कि.मी. के रास्ते में एक मीटर की जगह ऐसी नहीं मिलती है जहा पर यात्रियों का झुण्ड न मिले अर्थात पुरा रास्ता माता के जयकारों करते दर्शनार्थियों से भरा रहता हैं सो चलने में एंकान्त और थकान महसूस ही नहीं होती है।  हममें से सभी पैदल ही चढ़ाई करने वाले थे ,सो हमारी यात्रा या चढ़ाई शुरू हुई
 सबसे पहले हमने कटरा में माता वैष्णों देवी स्थापना बोर्ड के कार्यालय से यात्रा पर्ची कटवाकर यात्रा शुरू की, क्योकि उस पर्ची को दिखाकर ही उपर माता के मन्दिर में दर्शन के लिये प्रवेश दिया जाता है। बीना उस पर्चि के मन्दिर में नहीं जाने दिया जाता हैं इसलिये हमने पर्ची कटवाई  और अपनी यात्रा शुरू की चढ़ाई के पहले स्टेप में हमें यात्रा की पहली सुरक्षा चोकी के अन्दर से अपनी तलासी देते हुये प्रवेश करना पड़ा वहां पर कोई भी धूम्र-पान से सबंधी वस्तु ज्वलन शील वस्तु  वीडियो केमरा ,हथियार आदि की तलाशी होती है और ऐसे वर्जित संसाधन उपर नहीं ले जाने दिया जाता है।  हमारे पास वीडियो और फोटो केमरा दोनों थे तो उन्होने हमें अपना वीडियों केमरा वहीं जमा कराने के निर्देश दिये और हमने वहीं पर बने काउटर पर वीडियों केमरा जमा करवा दिया और अपना फोटो केमरा साथ लेकर आगे की चढ़ाई शुरू कर दी  वहां से पर्वत के उपर चारों तरफ छाई हरियाली और उससे होकर गुजरता रास्ता बहुत ही सुन्दर लग रहा था पुरा रास्ता माता के जयकारे करते श्रृद्धालुओं से भरा हुआ था  लोग नाचते गाते जयकारा लगाते अपना सफर तय कर रहें थे  पहली सुरक्षा चौकी से चलने के बाद पहला दर्शन स्थल आता हैं बाण गंगा नदी ऐसा कहा जाता हैं यहां पर माता ने वीर हनुमान जी महाराज की प्यास बुझने के लिये  पहाड़ में बाण मारकर ये नदी निकाली थी और अपने बाल उस पानी से धोये थे और हनुमान जी महाराज ने इस पानी से अपनी प्यास बुझाई थी  इसलिये इन नदी का नाम बांण गंगा या बाल गंगा पड़ा यहां इस नदी में बहुत से यात्री स्नान करके अपने पाप धोते हैं इसका पानी बहुत ही सफेद, पवित्र तथा शीतल हैं और यहां का दृश्य तो बहुत ही मन भावन हैं  हमने भी यहां अपने हाथ मुह धोये और यहां दर्शन किये और फिर अपनी आगें की चढ़ाई शुरू कर दी।

 पुरे रास्ते में यात्री सुविधार्थ रास्ते के दोनों तरफ दुकाने बनी हुई हैं जहां जरूरत और खाने पीने का सामान मिलता है तथा चाय नास्ते की व्यवस्था भी बहुत अच्छी हैं हर 500 मीटर की दूरी पर शीतल पानी की प्याऊ बनी हुई हैं उपर से निचे देखने पर कटरा शहर बहुत ही सुंदर लगता हैं पहाड़ी की तलहटी में बसा कटरा शहर एक अलग ही पहचान लिये हुये हैं  उपर पहाडी के मनोरम दृश्य मन भावन और मन को शान्ति प्रदान करने वाले है। ऐसा माना जात हैं यहा आकर अशान्त से अशान्त मन को शान्ति मिलती है।

 जयकारे लगाते लगाते हम चलते जा रहे थे कटरा से लगभग 5 कि.मी दूरी पर  आता है दुसरा दर्शन स्थल चरण पादुका मन्दिर ऐसा कहा जाता है कि भैरूनाथ से अपना हाथ छुड़वाकर जब माता यहां आई तो यहां माता ने रूककर पिछे मुडकर भैरूनाथ को देखा था कि कही  भैरूनाथ पिछे तो नहीं आ रहा हैं इसलिये यहां इस स्थल  पर माता के चरण टिके वहां आज भी माता के चरणों के निशान हैं इस लिये इस जगह को चरण पादुका कहा जाता हैं यहां बहुत भीड़ लगी रहती हैं और यह मन्दिर बहुत ही भव्य मन्दिर है। हमने भी यहां माथा टेका  । यहां पर रास्ते के दोनों तरफ काफी सारी दुकाने हैं
 यहा हमने भी जलपान गृहण किया और आगे की तरफ बढ़ लिये  इसके बाद लगला स्थल हाथी मत्था सांझी छत जहा हेलीपेड भी बना हुआ हैं वहा से होकर हम अपने दर्शन स्थल माता के दरबार की तरफ बढ़ रहे थे  फिर कटरा से 7  की.मी. दुर  आता है अर्द्ध कुमारी धाम यहाँ पर माता ने नो माह तक इस गुफा में रहकर तप किया किया था इसको गर्भ जुन के नाम से भी जाना जाता हैं यहां पर भी पर्ची नम्बर लेकर इस गुफा के दर्शन किये जाते हैं  यहा पर इस  पतली गुफा के अन्दर से गुरना होता है। अर्द्ध कुमारी से 1 कि.मी पहले माता के भवन के लिये दो रास्ते फट जाते हैं एक वाया अर्द्ध कुमारी और एक वाया हीमकोटी हमने हिमकोटी वाला रास्ता चुना क्योंकि वो 2 कि.मी सोर्ट कट था और अर्द्ध कुमारी पर काफी भीड़ भी लगी रहती हैं इसलिये हमने सोचा यहां तो शाम तक दर्शन नहीं हो पायेगें तो पहले माता रानी के दरबार के दर्शन ही कर लिये जाये तो हमने हिमकोटी का रास्ता चुना 
वहां से हम सांझी छत पहुचे जहा पर हेली पेड बना हुआ हैं कटरा से यात्री हेलीकोपटर द्वारा भी यहां तक आते है। पर वो पैसे वालों की बात हैं सो उसे छोड दिया जाये 


 श्रृदालु ढ़ोल पर नाचते गाते माता के जयकारे लगाते आगे बढ़ रहे थे  हम भी उनमें शामील हो लिये और सफर का आनन्द लेते हुये भवन की तरफ जा रहे थें अन्तहः हम माता के भवन के सामने पहुच गये वहां हमने अपनी कटरा से लाई गई पर्ची दिखाकर अपना ग्रुप नम्बर लिया जो 159 था गुप नम्बर से ही अन्दर प्रवेश दिया जाता हैं यहां से आगे  प्रसाद के सिवाय कुछ भी साथ नहीं ले जाने दिया जाता हैं वैसे तो सुरक्षा की दृष्टि से रास्ते में भी तीन चार चोकियां बनी हुई हैं पर यहां तो प्रधान चोकी हैं वहां पर फ्री लोकर की सुविधा उपलब्ध है लोकर की चाबी लेकर अपना सामान लोकर में रखकर  ही आगे के लिये प्रवेश दिया जाता हैं हमने भी अपना सामान लोकर में रखा और माता को भेंट चढ़ाने के लिये वहां पर बनी असंख्य दुकानों में से एक दुकान से माता का प्रसाद जो सिर्फ नारियल मखाना, खिल्ली वगैरह होता हैं लिया और दर्शन के लिये चल पड़े दरबार की तरफ  वहां पर रेलिंग लगी हुई हैं उनमें से घुमकर जाना पड़ता है पर उस दिन हमारे सौभाग्य से भीड़ बहुत कम थी इसलिये हमने जल्दी से ही उस रेलिंग को पार कर लिया तथा मन्दिर मुख्य द्वारा पर पहुच गये वहां हमें फिर से तलाशी देनी पड़ी और आगें बने एक काउटर पर हमारे द्वारा साथ लाया गया प्रसाद नारियल चढ़ाया गया मैन पिण्डी स्थल तक कोई प्रसाद चढ़ने के लिये नहीं ले जाने दिया जाता है। और पहुच गये माता वैष्णो देवी की उस पवित्र गुफा के सामने हमने उस पवित्र गुफा को देखकर अपने आप को बहुत ही भाग्यशाली समझा और मन ही अम कहा अहो! भाग हमारे जो हमें यहा के दर्शन हुये। 

 हमने दर्शन के लिये उस गुफा में प्रवेश किया यह गुफा आजकल संगमरमर पत्थर से तैयार कर दी गई पहले ये बिलकुल प्राकृतिक हुअ करती थी ये गुफा लगभग 15 मीटर लम्बी हैं जहां एक द्वारा प्रवेश के लिये तथा एक द्वारा निकासी के लिये बना हुआ है।  गुफा में चलते चलते हम पहुच गये मां वैष्णो देवी के उस पवित्र स्थल पिण्डी स्थल के पास वहां हमने अपना माथा टेका माता से अपनी मन्नत मांगी और माता की पिण्डियों के दर्शन कर  अपने जीवन को धन्य बनाया यहां के बारे में ऐसा कहा जाता हैं यहा पर ही आकर माता ने अपना भैरव नाथ को मारा था और यहां ही अपना स्थान बनाया था  यहां से माता ने भैरव नाथ का सर काट कर सामने उपर बनी पहाड़ी पर जाकर गिराया था माता से भैरव नाथ द्वारा क्षमा मांगने पर माता ने उसे वचन दिया था कि जब तक मेरे दर्शनों के बाद अगर दर्शनार्थि भैरू जी के दर्शन नहीं करेगा तब तक उसकी मनोकामना पूर्ण नहीं होगी।  इसलिये यहां आने वाले यात्री माता के दर्शनों बाद वहां से दो की. मी. दूर भैरव नाथ के मन्दिर में उसके दर्शन करने जरूर जातें हैं हमने माता की पिण्डियों के दर्शन किये वहां पर तीन पिण्डी बनी हुई एक पिण्डी मां लक्ष्मी की दुसरी माता सरस्वती की और तीसरी माता दुर्गा या माता महाकाली की मानी जाती हैं अतार्थ यहां माता महाशक्ति का सम्पूर्ण शक्ति रूप विद्यमान है। इसी जगह के दर्शन माता ने पहली बार पंडित श्रीधर को माता ने स्वपन में दिये थे।


 माता के चरणें में वहीं बांण गंगा नदी बहती हैं उसका कलरव मन को लुभाने वाला हैं और उसकी एक नाली चरण अमृत के लिये बारह निकाली गई जहां से लोग पात्रों में भरकर उस पवित्र जल को अपने घर ले जाते हैं माता की गुफा के बाहर ही निचे एक प्राचीन शिवजी की गुफा भी  बनी हुई हैं जो बहुत ही आकर्षक और मन भावन हैं हमने उसके भी दर्शन किये और फिर बाहर आ गये जहां हमें माता वैष्णों देवी स्थापना बोर्ड की तरफ से प्रसाद दिया गया उसे हमने सम्पूर्ण श्रद्धा पूर्वक गृहण किया और बाहर आकर थोड़ा जलपान गृहण कि किया तथा फिर भैरव नाथ जी के मन्दिर की चढ़ाई के लिये रवाना हो गयें और आनन्द लेते हुये कब 2 किलोमीटर निकल गये पता ही नहीं चला


भैरव जी का मन्दिर पहाड़ की एक उची चोटी पर बना हुआ है। वहां पर हमने प्रसाद चढ़ाया और रक्षा सूत्र बांधा तथा वहां की प्राकृतिक छटाओं का आनन्द लिया वहां का मौसम बहुत ही सुहाना रहता हैं 10-15 मिनट में धूप निकल आती हैं और कुछ ही समय में बारिश होने लगती हैं और वहां से बादल ऐसे लगते है कि हमसे नीचे हो  अर्थात वहां कह उचाई बहुत ही ज्यादा हैं कुल मीलाकर माता के दरबार की चढ़ई के दौरान रोजाना रास्ते में कम से कम दो तीन बार तो वर्षा हो ही जाती हैं और उस बारिश में भीगते हुये चलने का मजा ही कुछ दुसरा रहता हैं


वैसे तो हमने पुरे रास्ते में ही प्राकृतिक छटों के साथ हरियाली और सुनदर दृश्यों पर आपनी फोटो खिचवाये और खिचे लेकिन यहां आकर भी हमने बहुत सारे फोटो खिचे यहां पर खड़े होकर हमें ऐसा लग रहा था कि हम बादलों के बीच में खड़े हैं और बादल हमारे चारों तरफ हैं




यहा की जगह एक छज्जे नुमा हैं यहां बैठने के लिये भी जगह बनी हुई हैं यहा आकर मन को बहुत ही शान्ति मिलती हैं







 यहां से प्राकृतिक दृश्य मनभावन होने के साथ बहुत ही सुन्दर व मनोरम भी हैं यहां आकर मन करता है कि बस इस माता के दरबार में ही यहीं बैठे रहें यहां से वापस आने का मन ही नहीं करता  पर क्या करें दुनिया दारी है .... हम भी यहां से कुछ समय आराम करने के बाद कटरा की तरफ रवाना हो गयें 
यहां पर बन्दरों का खेलना शरारत  पक्षियों की चहचहाहट मन को लुभाने वाली लगती है। 
उतरते समय भी हमने बहुत ही आनन्द महसुश किया और सांय 6 बजे तक हम सब अपने होटल तक पहुंच चुके थे  वहां पर खना खाया और नहा धोकर थकावट होने के कारण सभी सो गयें और दुसरे दिन सुबह उठकर अपने गांव यानि झुन्झुनूं की तरफ रवाना हो गयें और आते समय एक दो दर्शन स्थलों, घाटियों को देखते हुये दुसरे दिन सुबह अपने शहर बगड़ पहुचे गये और वहां से अपने अपने साधनों द्वारा अपने घर पहुचे ये ये था हमार माता वैष्णों देवी तक का सफरनामाइस सफर में हमने बहुत ही आनन्द उठाये और माता के दर्शनों का लाभ उठाकर अपने जीवन को धन्य बनाया और अगली बार अगर माता ने चाहा तो दुबारा यात्रा की तैयारी की इच्छा के साथ इस वृतांत को यही विराम,  इजाज़त...
प्रेम से बोलो जय माता वैष्णो देवी की जय

आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

अमृतसर, स्वर्ण मंदिर दर्शन

घुमंत् फिरत चलो मां वैष्णो देवी के दरबार

अन्दाज अपना-अपना (मानव जाति के शौकीन आधुनिक पूर्वज)

स्वतंत्रता दिवस और भारत देश ??? स्वतंत्रता ???

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लक्ष्य

Monday, October 1, 2012

वाघा (बाघा) बार्डर परेड,अमृतसर

 मां वैष्णो देवी यात्रा के दौरान अब हमारा अगला दर्शन स्थल था,वाघा (बाघा) बार्डर परेड,अमृतसर
हम स्वर्ण मन्दिर के दर्शन करने बाद अपनी बस में बैठकर अपने अगले दर्शन स्थल बाघा बोर्डर की तरफ बढ़ लिये  ये अमृतसर से 30 किमी दूर  भारत पाकिस्तान सीमा पर है। वहां पर हम तकरीबन 2.30 बजे पहुच गये वहा पुछने पर पता चला कि परेड  देखने के लिऐ इंन्ट्री 5 बजे से शुरू होगी हमारे पास काफी समय था
 इधर उधर घुमने के लिये पर वहा घुमते भी तो कहा ? एक तो दोपहर का समय दुसरा बॉडर का इलाका और सारा इलाका आर्मी इलाका था और चारो तरफ सीमा रेखा के चारो तरफ कंटीले तार ही तार दिखाई दे रहे थे  इसलिये इस इलाके में घुम तो सकते ही नहीं थे फिर भी मुख्य गेट से 500 मीटर पहले  दुकाने लगी हुई थी हम भी वहां पर अपना टाईम पास करने चले गये  आर्मी इलाका था
 इसलिये सड़क के दोनों तरफ काफी छायादार वृक्ष लगे हुये थे सो छाया की कोई दिक्कत नहीं आई, इधर उधर दुकानो पर घुमकर छोटी मोटी जानकारिया इक्ट्ठी की और यह भी पता चला सांय 6 बजे से 7 बजे तक परेड चलती हैं हमारी बस के यात्रियो ने यहा एक ढ़ाबा देखकर वहां जलपान गृहण किया और हमने भी थोड़ा बहुत नास्ता गृहण किया यहां सड़क के दोनो किनारो पर ठण्डे पेय पदार्थ और चाट फल वगैरह की स्टाले और रेहडिया लगी हुई थी हमने खिल्ली, अमरूद सलाद, भुट्टे वगैरह खाये और वहा थोड़ा बहुत घुमकर आनन्द लेते हुऐ अपना समय व्यतीत किया इस प्रकार समय बीतता गया और 4.30 बजे लोग लाइन में लगना शुरू हुये और देखते ही देखते वहाँ खासी भीड़ इकट्ठा होने लगी हमने भी अपने साथ आई महिला यात्रियों को लाइन मे लगाया और हमने बाद में पीछे से चलने का मानष बनाया क्योंकि सड़क पर धूप बहुत तेज थी इसलिए हमने सोचा जब भीड़ कम हो जायेगी तब चले चलेगें
 वहां प्रवेश द्वारा पर काफी धक्का मुक्की हुई आर्मी जवानों ने सबको लाईन से आने के निर्देश दिये और व्यवस्था को बनाये रखने के लिये डराया धमकाया भी अन्तः भीड़ कुछ कम हुई सो अब हम भी चल दिये स्वर्ण जयन्ती द्वार (बाघा बोर्डर) द्वार की तरफ परेड का अन्नद लेने के लिये।
 इस द्वारा के अन्दर की तरफ दोनों और सिढ़ीनुमा स्डेडियम बना हुआ है। जहां कई हजारो की सख्या में लोग बैठ सकते है। और वैसा ही स्टेडियम पाकिस्तान द्वारा की समने भी बना हुआ है।  देखते ही देखते पुरा स्टेडियम खचाखच भर गया।  हम बाद में पहुचे थे इसलिये हमें उपर वाली सिढ़ियो पर जगह मिली काफी तेज धुप थी  सामने पाकिस्तान की तरफ से भी पाकिस्तानी लोग (दर्शक) पधारने लगे और अपने देश के स्टेडियम में बैठ कर कुछ ही देर में होने वाली परेड का आनन्द लेने के लिये आतुर होने लगे।
 भारत की तरफ का पुरा स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था, तभी वहां के परेड आर्मी कमाण्डर ने तेज साउड के साथ देश भक्ति गीत बजाने शुरू किये तो स्टेडियम में भारत जिन्दाबाद, भारत माता की जय हो के जयकारे लगने लगे और सिटिया बजने लगी उस मसय का माहौल ऐसा था की कि शरीर का  रोम रोम खड़ा हो रहा था,  जयकारे पर जयकारे लग रहे थे, पुरे इलाके में जयकारे ही जयकारे गुंजने लगे सामने पाकिस्तान के स्टेडियम से भी जय-जयकार की आवाज गुंजने लगी पर उनकी तादाद कम थी इसलिए उनका  स्वर दब रहा था
 फिर माहैल को और सोमाचित बनाने कि लिये  परेड आफिसर (जो वहां परेड करवा रहा था) उसने हमारे देश का झण्डा तिरंगा हमारी तरफ से वहां देखने पधारी कुछेक लड़कियों जो आगे कि पक्ति में बैठी थी उनको हाथों में देकर मुख्य द्वारा की तरफ दोड़ाया गया तो जयकारों और सिटियों की आवाज और भी तेज गुंजने लगी फिर देश भक्ति धुन और गानों पर शुरू हुआ नाचने झुमने का दौर वैसे ये परेड का हिस्सा नहीं हैं लेकिन वहां के माहौल को रंगीन और और भी मनमोहक बनाने के लिये वे लोग ऐसा करते हैं आगे की लाइनों में बैठी लडिकियों  औरतों जो भी देश भक्ति गीतो पर नृतय कर सके उनको आगे बुलाते है और नृतय करवाते हैं ऐसा पहले नहीं होता था लेकिन आजकल होने लगा हैं शायद ये सब परेड़ देखने आये लोगों के मनोरंजन के लिये होने लगा है। देखते ही देखते सभी लोग देश भक्ति गानो पर रोमाचिंत होकर थिरकने लगे और यहां तक की अंग्रेज दर्शक भी इन गानो पर नाचने के लिये मजबुर हो गयें वहां का पुरा वातावरण देशभक्ति मय हो गया और ऐसा लग रहा था जैसे वहां बैठे लोगों में वीर रस उत्तपन हो गया हो चारो तरफ जयकारे ही जयकारे गुंजते रहे  ये सिलसिला काफी देर तक चलता रहा फिर शुरू हुई परेड जिसको वास्तव में पुरे देश से लोग देखने के लिये इतनी दुर आते हैं  यहां के आर्मी जवानों की परेड वास्तव में देखने लायक है। वो भारतीय आर्मी परेड गणवेश धारण किये हुये 6 फुटे जवान जयकारे और परेड मार्च की आवाज के साथ परेड शुरू करते हैं और मुख्य सीमा द्वारा की तरफ चलकर परेड का पदर्शन करते हैं उनके चलने का एक पंक्ति-बद्ध ढ़ग बहुत ही सुन्दर लगता हैं अबौर सबसे अच्छा उनका परेड के दौरान अपने सर के उपर तक जाता पैर बहुत ही अच्छा और तालिया बजाने पर मजबुर करने वाला करतब है।
 और सामने से पाकिस्तानी जवान भी परेड के लिये सीमा द्वारा तक आते हैं और दोनो तरु के जावान एक साथ परेड करते हैं और फिर कुछ समय के लिये सीमा द्वारा को खाला जाता हैं। और दोनो देशों के जवान हाथ मिलाते हैं और फिर गेट बंद कर दिया जाता हैं और सुबह और सांय की परेड के दौरान ही इस गेट को कुछ समय के लिये खोला जाता हैं बाकी समय ये गेट बंद ही रहता हैं और अंत में परेड कमाण्डर उदघोषणा करता हैं कि अब देश का राष्ट्रीय ध्वज उतारा जायेगा सो सभी लोग उसके सम्मान में अपनी अपनी जगह खड़े हो जाये  वहां उपस्थित सभी लोग खड़े हो जाते हैं और धीरे धीरे देस का झण्डा उतार लिया जाता हैं और जयकारे के साथ परेड़  खत्म की घोषणा कर दी जाती हैं और चारो तरफ जयकारे की आवजे गुंजने लगती है। और सभी लोग वापस अपने अपने गन्तव्य स्थान की तरफ चले जाते हैं कुल मिलाकर हमें यहाँ का कार्यक्रम विशेषकर परेड का कार्यक्रम बहुत ही अच्छा और मन मोहक लगा । वहां के दुकानदारो से पुछने पर ये जानकारी मिली कि -
 बाघा बोर्डर पर हर शाम भारत की सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान रेंजर्स की सैनिक टुकडियां इकट्ठी होती है। विशेष मौकों पर मुख्य रूप से 14 अगस्त के दिन जब पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस समाप्त होता है और भारत के स्वतंत्रता दिवस की सुबह होती है उस शाम वहां पर शांति के लिए रात्रि जागरण किया जाता है। उस रात वहां लोगों को एक-दुसरे से मिलने की अनुमति भी दी जाती है। इसके अलावा वहां पर पूरे साल कंटिली तारें, सुरक्षाकर्मी और मुख्य द्वार के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता।
 अब हमें भी अपने गन्तव्य स्थान की तरफ जाना था साम हो चुकी थी सो हम भी अपनी बस की तरफ बढ़ लिये सभी यात्री जब बस के पास पहुच गये तब बस वहां से मां वैष्णो देवी के दरबार कटरा के लिये रवाना हुई  अब आपको अपनी अगली पोस्ट में माता के दरबार के दर्शन करवाएंगे, "प्रेम से बोलो जय माता दी" तब तक के लिए इजाज़त

क्रमशः



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लक्ष्य

Monday, September 24, 2012

अमृतसर, स्वर्ण मंदिर दर्शन

मां वैष्णो देवी यात्रा के दौरान अब हमारा अगला दर्शन स्थल था अमृत सर स्वर्ण मन्दिर, जैसा की मैने अपनी पहली पोस्ट में बताया था, जलिया वाले बाग को देखने के बाद हम स्वर्ण मन्दिर के दर्शन करने के लिऐ पहुचे
स्वर्ण मन्दिर वास्तव में अपने आप में  अद्वितीय मन्दिर है यहां आकर मन को बहुत ही शान्ति मिलती है।
 यहा आकर हमने यहां बने विशाल सरोवरके शीतल जल में स्नान किया और दरबार साहिब के सामने अपना मत्था टेका तथा फिर यहा के वास्तुकला का घुमकर निरीक्षण किया और वहां सिढ़ियों तथा सिलाओ पर लिखे यहां के इतिहास और समय समय पर हुई गतिविधयों की जानकारी ली,  यहाँ रोजाना हजारों श्रृद्धालु दर्शनार्थ आते है।
लगभग 400 साल पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद अर्जुन देव ने तैयार किया था। यह गुरुद्वारा शिल्प सौंदर्य की अनूठी मिसाल है। इस  मन्दिर में गुरु-ग्रंथ-साहिब ग्रंथ रखा हुआ है और हर समय गुरू वाणी की स्वर लहरी गुंजती रहती हैं
जिसे सुनकर दुखी से दुखी मन को शान्ति मिलती है यहाँ आकर और इस सरोवर के बीच बना ये मन्दिर सोने से जड़ा हुआ है इसी करण इसका नाम स्वर्ण मन्दिर पड़ा जिसके चारो तरफ सरोवर के पानी में लाईटे लगाई हुइ है। जिनकी रोशनी इसकी सुन्दरता में चार चांद लगा देती है। सरोवर से मन्दिर तक जाने के लिये एक पुल बना हुआ है जिसे होकर श्रृद्धालु अन्दर जाते है है।
कुल मिलाकर हमने यहां लगभग 1 घंटे तक घुमकर बहुत आनन्द उठाया  यहां पर सिखों की सेवा भावना देखने लायक है यहां हर समय लंगर चलता रहता है। और इस मन्दिर के बारे में आप सब जानते ही होगें फिर भी में अपको इसके सक्षिप्त इतिहास के बारे में थोड़ा सा बता ही देता हूं।
 श्री हरमंदिर साहिब (पंजाबी भाषा: ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ; हरिमंदर साहिब), जिसे दरबार साहिब या स्वर्ण मन्दिर, भी कहा जाता है गोल्डन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है
स्वर्ण मंदिर को हरमंदिर साहिब या दरबार साहिब भी कहा जाता है। इसके आस पास के सुंदर परिवेश और स्वर्ण की पर्त के कारण ही इसे स्वर्ण मंदिर कहते हैं। यह अमृतसर (पंजाब) में स्थित सिक्खों का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता हैसन 1589 ने गुरु अर्जुन देव के एक शिष्य शेखमियां मीर ने सरोवर के बीच में स्थित वर्तमान स्वर्ण-मन्दिर की नींव डाली। मन्दिर के चारों ओर चार दरवाज़ों का प्रबन्ध किया गया था। यह गुरु नानक के उदार धार्मिक विचारों का प्रतीक समझा गया। मन्दिर में गुरु-ग्रंथ-साहिब की, जिसका संग्रह गुरु अर्जुन देव ने किया था, स्थापना की गई थी। सरोवर को गहरा करवाने और परिवर्धित करने का कार्य बाबू बूढ़ा नामक व्यक्ति को सौंपा गया था और इन्हें ही ग्रंथ-साहब का प्रथम ग्रंथी बनाया गया।
गुरु अर्जुन साहिब, पांचवें नानक, ने सिक्खों की पूजा के एक केन्द्रीय स्थल के सृजन की कल्पना की और उन्होंने स्वयं श्री हरमंदिर साहिब की वास्तुकला की संरचना की। पहले इसमें एक पवित्र तालाब (अमृतसर या अमृत सरोवर) बनाने की योजना गुरु अमरदास साहिब द्वारा बनाई गई थी, जो तीसरे नानक कहे जाते हैं किन्तु गुरु रामदास साहिब ने इसे बाबा बुद्ध जी के पर्यवेक्षण में निष्पादित किया। इस स्थल की भूमि मूल गांवों के जमींदारों से मुफ़्त या भुगतान के आधार पर पूर्व गुरु साहिबों द्वारा अर्जित की गई थी। यहाँ एक कस्बा स्थापित करने की योजना भी बनाई गई थी। अत: सरोवर पर निर्माण कार्य के साथ कस्बों का निर्माण भी इसी के साथ 1570 ई. में शुरू हुआ। दोनों परियोजनाओं का कार्य 1577 ई. में पूरा हुआ था।
गुरु अर्जन साहिब ने लाहौर के मुस्लिम संत हजरत मियां मीर जी द्वारा इसकी आधारशिला रखवाई जो दिसम्बर 1588 में रखी गई।
स्वर्ण मंदिर का निर्माण कार्य सितंबर 1604 में पूरा हुआ। गुरु अर्जन साहिब ने नव सृजित गुरु ग्रंथ साहिब (सिक्ख धर्म की पवित्र पुस्तक) की स्थापना श्री हरमंदिर साहिब में की तथा बाबा बुद्ध जी को इसका प्रथम ग्रंथी अर्थात गुरु ग्रंथ साहिब का वाचक नियुक्त किया।यह मंदिर अपने आप में 40.5 वर्ग फीट है।
इसके दरवाज़ों पर कलात्‍मक शैली में सजावट की गई है। यह एक रास्‍ते पर खुलता है जो श्री हरमंदिर साहिब के मुख्‍य भवन तक जाता है। यह 202 फीट लंबा और 21 फीट चौड़ा है। इसका छोटा सा पुल 13 फीट चौड़े प्रदक्षिणा (गोलाकार मार्ग या परिक्रमा) से जोड़ा है। यह मुख्‍य मंदिर के चारों ओर घूमते हुए "हर की पौड़ी" तक जाता है। "हर की पौड़ी" के प्रथम तल पर गुरु ग्रंथ साहिब की सूक्तियां पढ़ी जा सकती हैं। वैस ये जानकारी वहां पर जगह जगह लिखी हुई है मैने पन्ने पर लिखी भी थी,पर मैंने पर लिखने और अशुद्धियों से बचने की दृष्टि से विकीपिडिया से ली है।

  इस सरोवर में तैरती रंग-बिरंगी मछलियां इस मन्दिर में आने वाले दर्शको के आकर्षक का केन्द्र बनती हैं इस शीतल व पवित्र जल में तैरती ये मछलियां बहुत ही सुन्दर लगती है।

यहाँ पर घूमने के बद हम निर्धारित समयानुसार अपनी बस के पास पहुँचें और जब सभी यात्री आ गये तब बस में बैठकर बाघा बार्डर की तरफ चल दिये क्योंकि हमारा अगला दर्शन स्थल था बाघा बार्डर जो पाकिस्तान और भारत की सीमा पर स्थित हैं
बाघा बार्डर पर होने वाली परेड और वहा के सचित्र दृश्यों के साथ अगली पोस्ट के साथ फिर हाजिर होता हू। तब तक के लिये इजाज़त.... क्रमशः


आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

अन्दाज अपना-अपना (मानव जाति के शौकीन आधुनिक पूर्वज)

स्वतंत्रता दिवस और भारत देश ??? स्वतंत्रता ???

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