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Monday, September 24, 2012

अमृतसर, स्वर्ण मंदिर दर्शन

मां वैष्णो देवी यात्रा के दौरान अब हमारा अगला दर्शन स्थल था अमृत सर स्वर्ण मन्दिर, जैसा की मैने अपनी पहली पोस्ट में बताया था, जलिया वाले बाग को देखने के बाद हम स्वर्ण मन्दिर के दर्शन करने के लिऐ पहुचे
स्वर्ण मन्दिर वास्तव में अपने आप में  अद्वितीय मन्दिर है यहां आकर मन को बहुत ही शान्ति मिलती है।
 यहा आकर हमने यहां बने विशाल सरोवरके शीतल जल में स्नान किया और दरबार साहिब के सामने अपना मत्था टेका तथा फिर यहा के वास्तुकला का घुमकर निरीक्षण किया और वहां सिढ़ियों तथा सिलाओ पर लिखे यहां के इतिहास और समय समय पर हुई गतिविधयों की जानकारी ली,  यहाँ रोजाना हजारों श्रृद्धालु दर्शनार्थ आते है।
लगभग 400 साल पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद अर्जुन देव ने तैयार किया था। यह गुरुद्वारा शिल्प सौंदर्य की अनूठी मिसाल है। इस  मन्दिर में गुरु-ग्रंथ-साहिब ग्रंथ रखा हुआ है और हर समय गुरू वाणी की स्वर लहरी गुंजती रहती हैं
जिसे सुनकर दुखी से दुखी मन को शान्ति मिलती है यहाँ आकर और इस सरोवर के बीच बना ये मन्दिर सोने से जड़ा हुआ है इसी करण इसका नाम स्वर्ण मन्दिर पड़ा जिसके चारो तरफ सरोवर के पानी में लाईटे लगाई हुइ है। जिनकी रोशनी इसकी सुन्दरता में चार चांद लगा देती है। सरोवर से मन्दिर तक जाने के लिये एक पुल बना हुआ है जिसे होकर श्रृद्धालु अन्दर जाते है है।
कुल मिलाकर हमने यहां लगभग 1 घंटे तक घुमकर बहुत आनन्द उठाया  यहां पर सिखों की सेवा भावना देखने लायक है यहां हर समय लंगर चलता रहता है। और इस मन्दिर के बारे में आप सब जानते ही होगें फिर भी में अपको इसके सक्षिप्त इतिहास के बारे में थोड़ा सा बता ही देता हूं।
 श्री हरमंदिर साहिब (पंजाबी भाषा: ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ; हरिमंदर साहिब), जिसे दरबार साहिब या स्वर्ण मन्दिर, भी कहा जाता है गोल्डन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है
स्वर्ण मंदिर को हरमंदिर साहिब या दरबार साहिब भी कहा जाता है। इसके आस पास के सुंदर परिवेश और स्वर्ण की पर्त के कारण ही इसे स्वर्ण मंदिर कहते हैं। यह अमृतसर (पंजाब) में स्थित सिक्खों का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता हैसन 1589 ने गुरु अर्जुन देव के एक शिष्य शेखमियां मीर ने सरोवर के बीच में स्थित वर्तमान स्वर्ण-मन्दिर की नींव डाली। मन्दिर के चारों ओर चार दरवाज़ों का प्रबन्ध किया गया था। यह गुरु नानक के उदार धार्मिक विचारों का प्रतीक समझा गया। मन्दिर में गुरु-ग्रंथ-साहिब की, जिसका संग्रह गुरु अर्जुन देव ने किया था, स्थापना की गई थी। सरोवर को गहरा करवाने और परिवर्धित करने का कार्य बाबू बूढ़ा नामक व्यक्ति को सौंपा गया था और इन्हें ही ग्रंथ-साहब का प्रथम ग्रंथी बनाया गया।
गुरु अर्जुन साहिब, पांचवें नानक, ने सिक्खों की पूजा के एक केन्द्रीय स्थल के सृजन की कल्पना की और उन्होंने स्वयं श्री हरमंदिर साहिब की वास्तुकला की संरचना की। पहले इसमें एक पवित्र तालाब (अमृतसर या अमृत सरोवर) बनाने की योजना गुरु अमरदास साहिब द्वारा बनाई गई थी, जो तीसरे नानक कहे जाते हैं किन्तु गुरु रामदास साहिब ने इसे बाबा बुद्ध जी के पर्यवेक्षण में निष्पादित किया। इस स्थल की भूमि मूल गांवों के जमींदारों से मुफ़्त या भुगतान के आधार पर पूर्व गुरु साहिबों द्वारा अर्जित की गई थी। यहाँ एक कस्बा स्थापित करने की योजना भी बनाई गई थी। अत: सरोवर पर निर्माण कार्य के साथ कस्बों का निर्माण भी इसी के साथ 1570 ई. में शुरू हुआ। दोनों परियोजनाओं का कार्य 1577 ई. में पूरा हुआ था।
गुरु अर्जन साहिब ने लाहौर के मुस्लिम संत हजरत मियां मीर जी द्वारा इसकी आधारशिला रखवाई जो दिसम्बर 1588 में रखी गई।
स्वर्ण मंदिर का निर्माण कार्य सितंबर 1604 में पूरा हुआ। गुरु अर्जन साहिब ने नव सृजित गुरु ग्रंथ साहिब (सिक्ख धर्म की पवित्र पुस्तक) की स्थापना श्री हरमंदिर साहिब में की तथा बाबा बुद्ध जी को इसका प्रथम ग्रंथी अर्थात गुरु ग्रंथ साहिब का वाचक नियुक्त किया।यह मंदिर अपने आप में 40.5 वर्ग फीट है।
इसके दरवाज़ों पर कलात्‍मक शैली में सजावट की गई है। यह एक रास्‍ते पर खुलता है जो श्री हरमंदिर साहिब के मुख्‍य भवन तक जाता है। यह 202 फीट लंबा और 21 फीट चौड़ा है। इसका छोटा सा पुल 13 फीट चौड़े प्रदक्षिणा (गोलाकार मार्ग या परिक्रमा) से जोड़ा है। यह मुख्‍य मंदिर के चारों ओर घूमते हुए "हर की पौड़ी" तक जाता है। "हर की पौड़ी" के प्रथम तल पर गुरु ग्रंथ साहिब की सूक्तियां पढ़ी जा सकती हैं। वैस ये जानकारी वहां पर जगह जगह लिखी हुई है मैने पन्ने पर लिखी भी थी,पर मैंने पर लिखने और अशुद्धियों से बचने की दृष्टि से विकीपिडिया से ली है।

  इस सरोवर में तैरती रंग-बिरंगी मछलियां इस मन्दिर में आने वाले दर्शको के आकर्षक का केन्द्र बनती हैं इस शीतल व पवित्र जल में तैरती ये मछलियां बहुत ही सुन्दर लगती है।

यहाँ पर घूमने के बद हम निर्धारित समयानुसार अपनी बस के पास पहुँचें और जब सभी यात्री आ गये तब बस में बैठकर बाघा बार्डर की तरफ चल दिये क्योंकि हमारा अगला दर्शन स्थल था बाघा बार्डर जो पाकिस्तान और भारत की सीमा पर स्थित हैं
बाघा बार्डर पर होने वाली परेड और वहा के सचित्र दृश्यों के साथ अगली पोस्ट के साथ फिर हाजिर होता हू। तब तक के लिये इजाज़त.... क्रमशः


आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

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स्वतंत्रता दिवस और भारत देश ??? स्वतंत्रता ???

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