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Saturday, July 15, 2017

21 वीं सदी में भी क्या संभंव हैं ये घटनाएं,क्यौ और कैसे ???...

एक तरफ जहां हम 21 वीं सदी में जी रहें है और विज्ञान अपनी उच्च प्राकाष्टा पर  है।जहां एक तरफ विज्ञान ने आत्मा का वजन तक माप लिया है,मृत व्यक्ति को विज्ञान कुछ घंटें बाद तक बुलवाने का दावा करती हैं । वहीं इस देश में अंधविश्वास भी साथ साथ अपने उतने ही पैर

फैलाऐ हुए है। भूत प्रेत, प्रेतआत्मा, चाौराहों पर सनख लगाना, टूडर टोटके आदि आदि  और ये सब सब गांवों में ही देखने को नही मिलता बल्की शहरों में इसका  प्रचलन प्रभुत्व ज्यादा देखने को मिलता  है।
जबकि शहरों में तो इसका उठाव प्रभुत्व कम होना चाहिए क्योकिे वहां तो शिक्षा का प्रभुत्व ज्यादा  होता हैं लेकिन इससे उल्टा हो रहा है। शहरोक से ज्यादा अफवाए पैदा होती है इसे क्या माना जाये? क्या आज  भी ये अंधविश्वास भुत प्रेत आम्ता जैसी चिजे हैं या विाान गलत है? सोचने पर मजबूर कर देता है। हम कहा जी रहें है? क्या ये बाते सच है  ? तो कैसे और नहीं है तो ये सब क्यों ? अगर है तो विाान क्यो गलत बता रही है। इन्ही सवालों के मध्य दिमाक चकरा जाता  है।

अब आप ही पढ़कर निर्णय करके बताये की सच क्या हैं विज्ञान या अंधविश्वास
राजस्थान में आजकल रात्री को सोते समय काटे जा रहें है महिलाओं बच्चों के बाल 
इसी विषय को लेकर आजकल एक अफवाह चल रही  है इसे अफवाह   कहूं या सच ये तो आप ही निर्णय करें मैं तो अफवाह ही कहूंगा क्योकि मैं इन सब में विश्वास नहीं करता हूं।
राजस्थान आजकल अखबारों के मुख्य पेज पर छााया हुआ है। और इलेक्टोनिक मिडिया सहित सोशल मिडिया में भी चर्चा का विषय बना हुआ  है।  एक तो विषय तो कुख्यात गैगस्टर आनन्दपाल चुरू का पुलिस द्वारा एनकाउटर जो प्रशासन के गले की हड्डी बना हुआ है। पर ये मेरा विषय नहीं है।
वहीं दुसरी और आजकल राजस्थान के लगभग गावों शहरों से खबरें सोशल मिडिया पर आ रहीं हैं कि  रात्री को सोते समय कुछेक लोग जानवरों का रूप धर कर घसर में प्रवेश करते हैं और रोती हुई महिलाओं के बाल चोटी काट  डालते है। और बच्चों के भी बाल काट लेते है। और अफवाह है कि जिस औरत या बचचे के बाल कटे है वो बेहोस हो जाता है और बाल काटने के तिन दिन बाद उसकी मृत्यु हो ताजी है।  और तो और बाल काटने वाला व्यक्ति दिखाई तक नहीं देता सिफ और सिर्फ बिल्ली या कुत्ता जैसे जानवर दिखाई देते हौ और बाल काटने वाला इंसान तुरंत बाद हवा बनकर गायब हो जाता बताया जाता है।
और बाल काटने के साथ साथ उस महिला या बच्चे के शरीर पर त्रिशुल का निशान छोड जाते है। इस प्रकार का डर  अंधविश्वास आजकल पुरे राजस्थान में हरेक ढ़ाणी हरेंक गांव शहर में व्याप्त है।



पुरा राजस्थान इस खौप में जी रहा  हे। लोग सांम होते ही घरों में कुण्डी लगाकर सो जाते हैं बाहर तक नहीं निकलते अब उन्हे कौन समझाये की आप 21 वीं सदी में जी रहें है। ये कुछ नहीं होता पर बस रोज रोज की घटनाऐ रोज रोज की खबरों ने उनके दिमाक में बस एक ही बात बैठा दी हैं कि ये वास्तम में हों  रहा  है।   इसके चलते पुलिस प्रशासन भी सकते में है।  पर पुलिस के हाथ ऐसा कोई असामाजिक तत्व या सुराग हाथ नहीं लगा है जिससे मामले का खुलासा हो सकें।
हा इतना जरूर है कि बाल कटे जरूर हैं वो खुद ने काटे है या किसी असामाजिक तत्वों ने काटे  है इस बात का अभी तक खुलासा नहीं हुआ है।
हा इतना जरूर है कि बाल कटे जरूर हैं वो खुद ने काटे है या किसी असामाजिक तत्वों ने काटे  है इस बात का अभी तक खुलासा नहीं हुआ है। एक दो जगह से ये बाते सामने आई है कि कुछेक महिलाओं ने इस अफवाह के चलते घर के काम काज से तंग आकर खुद ही अपने बाल काट लिए और अफण्ड घड़ लिया
पर सभी ने तो एसा भी नहीं किया तो फिॅर ये क्या हैं ये अभी तक एक पहेली बनी हुई  है।


कुछेक जगहो से यूपी के कुछके लोगों का मारपीट कर गिरफ्दार भी किया गया है। ऐसी सूचनाएं भी सोशल मिडिया के माध्यम से प्राप्त हुंई है ये सही है या गलत ये भी नहीं पता और वो ऐसा कर रहे है तो क्यो उनको बल काटने से क्या हाशिल होता हैं हैं और कुछ हासिल भी होता है तो भी वे कुत्ता बिल्ली जैसा रूप कैसे  धारण कर लेते है। ये भी एक पहेली है।  क्या इस वैज्ञानिक युग में ऐसा हो पाना संभव है। कोई उन्हे यूपी के बसमाश बता रहा  है कोई बंगाल के काले जादूगर का नाम दे पा रहा है हकीकत क्या है ये कोई भी नहीं जान पा रहा है।
जबकि पुलिस प्रशान और अखबार वाले इसे कोई अफवाह बता रहें हैं कोई सबूत मिलना नहीं बता रहें हैं से घटनाऐ  झुन्झुनूं, जयपहाड़ी, बुडाना ,नरहड़, चिड़ावा,उदयपुर वाटी,पिलानी नोख, नागौर सहित कई गोवों में और शहरों में घटित हो चुकी है।

अब आप ही बताइऐ विज्ञान के इस युग में क्या बाते संभव है। अगर सभंव है तो कैसे
हा इतना जरूर है कि बाल तो कटे हैं वो काटे गये या कटे ये एक पहेली बनी हुई है। और काटे गये तो क्यों  ??
और आज भी ऐसा अंधविश्वास व्यापत है तो क्या हिन्दुस्तान आगें बढ़ पायेगा एक तरफ डिजीटल इंडिया और दुसरी तरफ कटती चोटीयां  कटेते बाल इंसान बिल्ली कत्तो का रूप धरते ये कहां तक सच है??
 क्या ये कोर्इ  नया डिजीटली करण् तो नहीं  ??


 ये एक सावाल  आप विद्यानों आगें है अब आप ही उत्तर दे   अंधविश्वास जिन्दा  है या विज्ञान?







 मुझे इन घटानों का सच मालुम हुआ तो फिर आपको जरूर बताउगां तब तक के लिए  इजाजत ...
आपका  अपना
                                                                       सुरेन्द्र सिंह  भाम्बू

 31 दिसम्बर लाईन का खात्मा सबके जहन में घुमती रही मोदी की आत्मा

लक्ष्य



Monday, May 22, 2017

शेखावाटी का प्रसिद्ध रसदार खाद्य फल,पील

     शेखावाटी का प्रसिद्ध खाद्य फल  पील.....  पर उससे पहले कुछ गिले सिकवे ... नमस्कार दोस्तों काफी समय से ब्लॉग पर कुछ लिख ही नही पाया कारण आप सभी को पता है फैस बुक और व्हाटस् अप की बढ़ती महता ने ब्लाॅगरो की महत्ता कुछ हद कम कर दी हैं या यू कहें न  के बराबर कर दी है। 
आजकल देखा गया है कि ब्लॉग पर लोगों की  आवाजाही बिलकुल कम होती जा रही  है। इसलिए हमारा यानि ब्लाग् लिखने वालों का मन भी ब्लाग लिखने की बजाय इन्ही सोसल साईटस पर लिखने का ज्यादा करता है। या यू कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी ! ब्लॉग पर लोगों की  घटती नफरी और फैसबुक और व्हाटस् अप की तरफ लोगो का बढ़ता खिंचाव आरे हो भी कैसे नही जमाने के साथ जो चलना पड़ता है। 
जाळ का फल पील
 ये तो रही कई दिनों से  न लिख पाने की बात अब आज जो मै आपको बताने जा रहा हूं वो हैं
जाळ का फल पील
शेखावाटी का प्रसिद्ध खाद्य फल  पील, पीलू आदि अपने अपने ऐरिये के हिसाब से इसके नाम हैं पर हम तो इसको पील कहते है। जो सिर्फ गर्मी के मोसम में ही खाने को मिलता है जो लू से बचाने में मददगार है  लू अवरोधक है।
क्या आपने खाया है इसे कभी ? किस किस ने खाया है? मैंने तो बहुत बार खाया है और आज भी सुबह सुबह आनंद ले रहा हु इसका। अब  इसके बारे में बतात हूं जितना मुझे पता  हैं जो जानकारी मकुझे बडै बुढ़ो से मिली है उसी के हिसाब से बता रहा हूं
जाळ का फल पील
जाळ का पेड़
को खाकर आनन्द लेते हुए मैं
पील का पेड़  (जाळ) बहुत घना जटिल तरीके से फैला होता है।  इस कारण स्थानीय बोलचाल में इसे जाळ का नाम दिया गया है।ये पेड़  शेखावाटी क्षेत्र (पश्चिमि राजस्थान) में मुख्यतया पाया जाता है। इस गर्मी भरे मौसम में ये ही एक ऐसा पेड़ है जो कि हरा भरा रहता है। और मिठा फल देता  है। ये उमस भरी गर्मी में   शीतल छाव के साथ साथ खाने के लिए मिठे मिठे फल पील,पीलू भी देता  है। इसके लगने का समय अप्रैल माह से जून तक का है।  तेज गर्मी के शुरू होते ही  जाळ के पेड़ पर हरियाली छा जाती है और फल लगना शुरू हो जाते है।इसके फल चने के आकार के मीठे सरदार  होते है।   जिसको हम पील के नाम से जानते है। इसके कई रंग जैसे  लाल, पीले व बैगनी रंग के इन पीलों (फलों ) से एकदम मीठा रस निकलता है। हमारे  रेगिस्तान में इस फल को मेवे की उपमा दी गई है। है और  यह पौष्टिकता से भरपूर होता है और  बड़े बुजर्ग कहते है कि इसे खाने से लू नहीं लगती। साथ ही इसमें कई प्रकार केआर्युरवेदिक  औषधीय गुण भी बताये जाते है। इससेक कई प्रकार की इवाईयां भी बनाई जाती है।
गांवों के बच्चे और औरते इसको पेड़ पर चढ़कर तोड़ते हैं और इसे इकट्ठा करने के लिए लोटे  व केंतली का इस्तेमाल लिया जाता  है। लोटे के मुह पर रस्सी बंधी जाती हैं और फिर लोटे  व केंतली को गले में डाला कर पील तोड़ी जाती है। 
सबसे अंन्त में इसे खाने का तरीका
  इस  मीठे रस भरे इस फल के खाने की सबसे बड़ी खासियत है
दोस्तो इसे खाने का तरीका भी अलग ही है इसे बहुत ही सावधानी के साथ खाना पड़ता है। अन्यथा आपकी जीभ कट सकती है जीभ पर फाले हो जाते है।  इसे आप एक एक करके नहीं खा सकते  अन्यथा अपकी जीभ छिल जाती है। इसे एक साथ आठ-दस दाने मुंह में डाल कर खाना पड़ता है। यानि एक फांका (कई सारे दाने) एक साथ खाना पड़ता है।
 तो दोस्तो जब कभी आपको ये फल खाने को मिले सावधानी से खाये ,और  आशा है आपको ये जानकारी रोचक लगी होगी ।आज के लिए इतना ही फिर मिलते है ब्रेक के बाद.....

 31 दिसम्बर लाईन का खात्मा सबके जहन में घुमती रही मोदी की आत्मा

लक्ष्य





Thursday, January 5, 2017

गुली डंडा का खेल में ( एक आंचलिक कविता)

ब्लॉग जगत के  सभी पाठको,देशवासियों,  ब्लॉगर मालिको व सभी दोस्तों के परिवार जनों को मेरी तरफ से नव वर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाए
बस बैठे यू ही बचपन की पुरानी बात यात आ जाती है कुछ बाते ऐसी होती है जो कभी भुलाई नही जाती स्वत: ही याद आ जाती है। वो बचपन का खेल.. कूद.... वो पुरे दिन की मोज- मस्ती...  जब यादआते है तो ऐसा लगता है मानों अब हम कहा फंस गये वो दिन बहुत ही अच्छे थे। 
मोबाईल उमें गेम के अलावा कुछ जानती ही नहीं और वो जानना भी नहीं चाहती कारण क्या है ??  ये तो मुझे मालूम नहीं पर ऐसा देखा गया है। हा हमारे समय के बचपन के खेल  और मस्ती के तरीको को किसी ने एक कविता में पिरोया जो मुझे तो बहुत अच्छी लगी सोचा आपके साथ शेयर करू
गुली डंडा का खेल में
लाला और कड़ा मांगता
चौमासा की बरसात म
खावण खातर गड़ा मांगता
डबक बिलाय म
आगला की कमर तोड़ देता
कुवा पर पानी की लड़ाई म
आगला को घड़ो फोड़ देता
और लड़ता भी तो क्यां खातर
मोरया की पांख खातर
बोरया की ढांक खातर
नीम्बू रास की फांक खातर
काकडी और मतीरा खातर
धोलो रंग क घुचर्या खातर
होल्या को धमाल
आथुणा बास म

  चंग कोस र ल्याबा
की चर्चा अगुणा बास म
छाती चौड़ी हु ज्याति
फागण आत्त्त जात्त्त सियाला म
जद कोई धोती आलो
उतरतो कबड्डी पाला म
समझ कम अकड़ घणी
हर एक यार म
सर झुकतो तो खाली
दूल्हा बाबा की सुंवार म
कुड़तो कोनी दाबता पेंट म
कठै लागेड़ी कारी दिख ज्याति
म चुप जद थारी दिख ज्याति
तू चुप जद म्हारी दिख ज्याति
छींक साट्ट पुग ज्याव
उडीकनाला कण उडीकदार
बे डाकिया न रहया अब
बे कागद हुया बेकार
दो ही आदमी होता काम आला
क फौजी क आसाम आला
न ल्याव आगरा क पेठा
न ल्याव कश्मीरी अंखरुट
न जांण कद आव आसामी
हर कद जाव रंगरूट
मिनख बदलग्या

मिनख चारो बदल गयो
मॉडर्न बनबा क चक्कर म
गाँव सारो बदल गयो
बेशक बदलनो वक़्त क सागे
के पासी जो भाग गया वक़्त क आगे
सीख दयूं सब न
इतरी समझ कोनी बीरा
हाँ अलख जगातो जे होतो
कोई साधु संत या फकीरा
  बहुत ही सुन्दर आंचलिक कविता है दोस्तों आपको कैसी लगी?

 31 दिसम्बर लाईन का खात्मा सबके जहन में घुमती रही मोदी की आत्मा

लक्ष्य

Wednesday, November 9, 2016

एक आदेश और आम जन परेशान देव उठने से पहले बाज़ार से उठ गई लक्ष्मी

 एक आदेश और दो दिन व पूरी आम जन जिन्दगी अस्त व्यस्त ।आज जिसके मुह से सुनो ये ही चर्चा और हाथ में ये ही 2 नोट  500 or 1000  देव उठने से पहले ही बाज़ार से उठ गई  लक्ष्मी

 आज से 500 और 1000 का नोट बंद ,घोषणा करना आम जन को पड़ रहा है भारी देव उठनी ग्यारस के अबूझ सावे पर अचानक की गई ये घोषणा अब शादी वाले घरो का जी का जंजाल बन गई है। बेचारो के घर में ये ही नोट अब शादी के लिए काम में लिए जाने थे और अब वो है मात्र कागज के टुकड़े। अब बतावो कैसे होगी उनकी व्यवस्था? उन्हें काटने पड़ रहे है चक्कर कैसे जरूरत का सामान लाया जाये और कैसे बाकि के काम निपटाए जाये


 साथ ही इस समय किसानो द्वारा इस समय फसल बुवाई का कार्य चल रहा है वो भी बिज़ खाद खरीदने के लिए परेशान हो रहे है अब कहा से लाये 100-100 के नोट तब जा कर मिले उन्हें खाद बिज़???
इसके साथ साथ और भी आम जन परेशान है आज सभी की पॉकेट में 500-1000 से कम का नोट नही मिलता तो कैसे उनकी जरूरत पूरी हो। दुकान वाले सामान नही ले पा रहे है बेचारे उद्दोगपति मजदूरो को मजदूरी नही दे प् रहे है। ध्याड़ी मजदुर जिनका चूल्हा भी डैली मजदूरी से जलता है आज दो दिन तक तो उनको भूखों मरने की नोबत आ गई
 मेरे हिसाब से ये एक जल्दबाजी में लिया गया गलत फैसला है एकाएक बंद नही करने चाहए थे और वो भी सवो की सीज़न और किसानो की बुवाई जुताई की सीज़न में
सब को कर दिया परेशान वाह जी  वाह!!

नया 500 का नोट
 नई चलित करेंसी (नया 2000 का नोट )






आपका क्या मानना  कहना है इस विषय पर ???











आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

देवा ओ देवा गणपति देवा

 कुछ दोस्त बहुत याद आते है..

  मेह होग्यों भाया अब खेत बास्या (इस मानसून की सबसे तेज बारीश)

70 वें स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

 

लक्ष्य


Tuesday, February 16, 2016

छोटी काशी बगड़ की विडंबना

📚छोटे कांशी के रूप मे विख्यात बगङ की बेदह कड़वी हकीकत

बगङ।
यहां हर साल देशभर के सैकड़ों के युवाओं के ख्वाब हकीकत में बदलते हैं। कोई अध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर, फार्मीस्ट आदि बनता हैं। बगङ शहर मे पढ कर गये लोग आज उच्च पदों पर विराजमान है।  वहीं दूसरी ओर बगङ  का एक स्याह पहलू भी है। वो यह है कि यहां ऐसे बच्चों की भी कमी नहीं, जिनके 'ख्वाबों का फूल खिलने से पहले ही मुरझा रहा है।

इसकी वजह यहां पर सरकारी खर्चे पर पढऩे की सुविधा नहीं है। एक तरफ तो सरकार प्रत्येक ग्राम पंचायत मे आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय खोल रही है  तथा दूसरी ओर देश की आजादी के इतने सालों बाद भी बगङ  नगर पालिका क्षेत्र होते हुए भी यहां सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय का अभाव हैं।
इस कड़वी हकीकत का अंदाजा इससे सहज लगाया जा सकता है कि नगर पालिका क्षेत्र होते हुए भी विधार्थीयो के लिए दसवीं के बाद का सरकारी स्कूल नहीं है।

शहर छोड़ कर गांवों में जाते हैं पढऩे

दसवीं के बाद निजी स्कूल की फीस की व्यवस्था नहीं होने पर,पढ़ाई छोडऩे की नौबत आती है। 
या फिर कक्षा 11-12 वीं  मे सरकारी स्कूलों मे अध्ययन करने के लिए 7-8 किमी शहर से गांवो की ओर कासीमपुरा, लाम्बा जाना पडता हैं।

आजादी के इतने साल बाद भी नगरपालिका क्षेत्र होते हुए भी दसवीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूल कस्बे में नहीं होना विडम्बना है। जनप्रतिनिधियों को इस दिशा में प्रयास करने चाहिए। साथ ही आमजन को सरकारी स्कूल के लिए आवाज उठानी चाहिए।

Sunday, August 2, 2015

राजस्थानी (मारवाड़ी) लोक (गीत) गायन तेजा

सावन माह की हार्दिक शुभकामनाएं
सभी देश वासियों, दोस्तों,ब्लॉग जगत के सभी पाठकों , ब्लॉग मालिको को मित्रता दिवस की हार्दिक बधाईयां


‘‘ ऐ प्रभु आप मुझको इतना तो दो ।,
मेरे हर दोस्त का घर खुशियों से भर दो।।’’
 
इन्ही शब्दो के साथ पढिये ये सावन का  लेाक गीत  तेजा
तेजा लोक गीत
गाज्यौ-गाज्यौ जेठ'र आषाढ़ कँवर तेजा रॅ
लगत ही गाज्यौ है सावण-भादवो
सूतो-सूतो सुख भर नींद कँवर तेजा रॅ
थारोड़ा साहिना बीजॅं बाजरो। उठ्यो-उठ्यो पौर के तड़कॅ कुँवर तेजा रॅ
माथॅ तो बांध्यो हो धौळो पोतियो
हाथ लियो हळियो पिराणी कँवर तेजा रॅ
बॅल्यां तो समदायर घर सूं नीसर्यो
काँकड़ धरती जाय निवारी कुँवर तेजा रॅ
स्यावड़ नॅ मनावॅ बेटो जाटको।
भरी-भरी बीस हळायां कुँवर तेजा रॅ
धोळी रॅ दुपहरी हळियो ढाबियो
धोरां-धोरां जाय निवार्यो कुँवर तेजा रॅ
बारह रॅ कोसां री बा'ई आवड़ी।।
बैल्या भूखा रात का बिना कलेवे तेज।
भावज थासूं विनती कठै लगाई जेज।।
मण को रान्दियो खाटो खीचड़ो।
लीलण खातर दल्यो दाणों कँवर तेजा रॅ
साथै तो ल्याई भातो निरणी।
दौड़ी लारॅ की लारॅ आई कँवर तेजा रॅ
म्हारा गीगा न छोड़ आई झूलै रोवतो।
ऐहड़ा कांई भूख भूखा कँवर तेजा रॅ
थारी तो परण्योड़ी बैठी बाप कॅ
ऐ सम्हाळो थारी रास पुराणी भाभी म्हारा ओ
अब म्हे तो प्रभात जास्यां सासरॅ
हरिया-हरिया थे घास चरल्यो बैलां म्हारा ओ
पाणिड़ो पीवो नॅ थे गण तळाव रो।
थारो मामोसा परणाया पीळा-पोतड़ा।
गड पनेर पड़ॅ ससुराल कँवर तेजा रॅ
रायमल जी री पेमल थारी गौरजां
पहली थारी बैनड़ नॅ ल्यावो थे कंवर तेजा रॅ।
पाछै तो सिधारो थारॅ सासरॅ।।
डांई-डांई आँख फरुखे नणदल बाई ये
डांवों तो बोल्यो है कंवलो कागलो
कॅ तो जामण जायो बीरो आसी बाई वो
कॅ तो बाबो सा आणॅ आवसी
बाईसा नॅ पिहरिये भेजो नी सास बाईरा
मायड़ तो म्हानॅ लेबानॅ भेज्यो
चार दिना की मिजमानी घणा दिनासूं आया
राखी री पूनम नॅ पाछा भेजस्यां
सीख जल्दी घणी देवो सगी म्हारा वो
म्हानॅ तो तीज्यां पर जाणों सासरॅ
तेजल आयो गांव में ले बैनड नॅ साथ
हरक बधायं बँट रही बड़े प्रेम के साथ
मूहूर्त पतड़ां मैं कोनी कुंवर तेजा रॅ
धोळी तो दिखॅ तेजा देवली
सावण भादवा थारॅ भार कंवर तेजा रॅ
पाछॅ तो जाज्यो सासरॅ
गाड़ा भरद्यूं धान सूं रोकड़ रूपया भेंट
तीजां पहल्यां पूगणों नगर पनेरा ठेठ
सिंह नहीं मोहरत समझॅ जब चाहे जठै जाय
तेजल नॅ बठै रुकणुं जद शहर पनेर आय
माता बोली हिवड़ॅ पर हाथ रख
आशीष देवूं कुलदीपक म्हारारै
बेगा तो ल्याज्यो पेमल गोरड़ी
खिड़की बागां री बेगी खोलो बनमाली रे
बारै भीगे बेटो जाट को
कोनी कुंची खिड़का री म्हारा कंवरांओ
कुंची तो लेगी पेमल गोरजां
बाग में बेगी जावो भोजाई म्हारी ओ
साथै तो ले जावो झूलो झूलरो
हाथां मेहंदी लगी है सायब म्हारा वो
दागां तो लागेला धोळी धोतियाँ
छत्रिय धर्म की लाज राखो कँवर तेजा रै,
म्हारी गायां तो लेगा रै मीणा चोरडा.
म्हारी गायां जल्दी ल्यावो थे तो जीजा वो,
भूखा तो अरड़ावे छोटा कैरड़ा .
क्षत्रिय थारो धर्म कँवर तेजा रै,
गौरां मैं अरड़ावे बाळक बाछड़ा.
दोय घड़ी ढब ज्यावो परन्या सायबा,
झगडा री बैल्या मैं घोड़ी थामस्युं.
डूंगर पर डांडी नहीं, मेहां अँधेरी रात
पग-पग कालो नाग, मति सिधारो नाथ
शूरा मत कर माथा फोड़ी, पाछी फेरल्यो थारी घोड़ी
घर मैं बाट देख रही गौरी, आ जिंदगानी है थोड़ी
ओ थारो केरड़ो संभालो लाछा गूजरी
तेजल ने जाणों है आगे आसरै
आई ज्योंही पाछी मुड़ज्या लीलण म्हारी ए
बचना रो बांध्योड़ो बदलो चुकस्याँ
सासु सुसरा न दीजै राम जुवारी
पेमल न दीजै मेमद मोलियो
अठै देखी ज्यों कह दीजै पेमल न
घडी रै पलक रो तेजो पावनों
लीलन घोडी की आँखों से आंसू टपकते देख तेजाजी ने कहा -
"लीलन तू धन्य है. आज तक तूने सुख-दुःख में मेरा साथ निभाया. मैं आज हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारा साथ छोड़ रहा हूँ. तू खरनाल जाकर मेरे परिवार जनों को आँखों से समझा देना."
माँ न प्रणाम कर सांचोडा समाचार बतला दीजै
काका, बाबा न प्रणाम कीजै हाथ जोड़
भाई न भौजायाँ कीजै निमणूं
बाई राजल न धीरज दे हाथ फेरणां
नागराज ने कहा - तेजा नागराज कुंवारी जगह बिना नहीं डसे. तुम्हारे रोम-रोम से खून टपक रहा है. मैं कहाँ डसूं?
तेजाजी ने कहा नागराज मुझे वचन चूक मत करो. अपने वचन को पूरा करो. मेरे हाथ की हथेली व जीभ कुंवारी हैं, मुझे डसलो.
बालू नाग नतमस्तक हो गया और बोला -
'धन्य है तेजा तुम्हारे माता-पिता, धन्य है तुम्हारी शूरवीरता और प्राण. आज कालिया हार गया और धौलिया जीत गया.
बालू नाग ने कहा की तेजा देवता के रूप में पूजे जावेंगे तथा पीडितों के दुखों का संहार करेंगे. किसान खेत में हल जोतने से पहले तेजाजी की पूजा करेंगे.
पेमल सुरसुरा में सती हो जाती है
तेजाजी के बलिदान का समाचार सुनकर पेमल के आँखों के आगे अँधेरा छा गया. उसने मां से सत का नारियल माँगा, सौलह श्रृंगार किये, परिवार जनों से विदाई ली और सुरसुरा जाकर तेजाजी के साथ सती हो गई. पेमल जब चिता पर बैठी है तो लीलण घोडी को सन्देश देती है कि सत्य समाचार खरनाल जाकर सबको बतला देना.
सुसराजी न पावां धोक कह दीजै
सासुजी न कीजै पगां लागणा
बाई राजल न दीजै रिमझिम बोलणी
मन मैं रहगी सासुजी की पोल देखती
परण्यो जातो निजरां देखती
कहते हैं कि अग्नि स्वतः ही प्रज्वलित हो गई और पेमल सती हो गई. लोगों ने पूछा कि सती माता तुम्हारी पूजा कब करें तो पेमल ने बताया कि - "भादवा सुदी नवमी की रात्रि को तेजाजी धाम पर जागरण करना और दसमी को तेजाजी के धाम पर उनकी देवली को धौक लगाना, कच्चे दूध का भोग लगाना. इससे मनपसंद कार्य पूर्ण होंगे. यही मेरा अमर आशीष है "
भाया रै उतरता भादुडा री नवमी की रात जगायज्यो
दसम न धोकज्यो धौल्या री देवली
काच्चा दूध को भोग लगाज्यो
थारा मन पसंद कारज सिद्ध होसी
आ ही म्हारी अमर आशीष है
लीलन घोड़ी सतीमाता के हवाले अपने मालिक को छोड़ अंतिम दर्शन पाकर सीधी खरनाल की तरफ रवाना हुई परबतसर के खारिया तालाब पर कुछ देर रुकी और वहां से खरनाल पहुंची. खरनाल गाँव में खाली पीठ पहुंची तो तेजाजी की भाभी को अनहोनी की शंका हुई. लीलन की शक्ल देख पता लग गया की तेजाजी संसार छोड़ चुके हैं.
कैयां आई बिरंगो लीलण म्हारी ए
कठोड़ै छोड्यो है देवर लाडलो
कहते हैं कि लीलण घोडी खरनाल आकर तेजा की भाभी को बोली कि तुम्हारा देवर शहीद हो गया है और पेमल उनके साथ सती हो गई है.
देवर थारो वीर गति पाई है
सती तो होगी है पेमल जाटणी कलयुग के इतिहास में घोड़ी का मुंह बोलना पहला उदाहरन है जय वीर तेजा जी

Saturday, July 18, 2015

जमाना ले बैठ्या....

जमाना ले बैठ्या....
ढोलां रा मकाना न,आरसीसी ले बैठी;
रोहिड़ा र किवाड़ा न,शिशम ले बैठी;
धोती हारा मोट्यारां न,जिन्स पेंट ले बैठी;
चरभर हारा खेलां न,तीन-पत्ती ले बैठी;
आटा हारा गुलगुलां न,बैसन हारी कचोरी ले बैठी;
पढन हारा छोरां न,वाट्सएप हारी चैटिंग ले बैठी;
ईस हारा मांचा न,डबल बेड ले बैठी;
ऊँट गाडा री सवारी न,हीरो होंडा ले बैठी;
काचरां र साग न,मिरच्यां ले बैठी;
टाबरां री सेहत न,होर्लेक्स री बोतल ले बैठी;
पटा हारा जांघियां न,रूपा बोक्सर ले बैठी;
मुर्गा छाप पटाखां न,एक सौ बीस साउन्ड री डब्बी
ले बैठी;
प्याजिया हारी बुज्जी न,नेस्ले मैगी ले बैठी;
गांव हारा घिन्दड़ न,बिकाऊ क्रिकेट ले बैठी;
गांव हारा छोरां न,बाणीयां री छोरीयां ले बैठी;
चुरू हारी मारवाड़ी न,वाट्सएप हारी अंग्रेजी ले बैठी,
ज्यान हुं प्यारा भाया ने , लुगयां ले बैठी

Thursday, July 16, 2015

फौज में मौज है;

फौज में मौज है;
हजार रूपये रोज है;
थोड़ा सा गम है;
इसके लिए भी रम है;
ज़िंदगी थोड़ी रिस्की है;
इसके लिए तो व्हिस्की है;
खानें के बाद फ्रुट है;
मरनें के बाद सैलूट है;
पहनने के लिए ड्रैस है;
ड्रैस में जरूरी प्रेस है;
सुवह-सुबह पी.टी है;
वॉर्निग के लिए सीटी है;
चलने के लिए रूट है;
पहनने के लिए D.M.S बूट है;
खाने के लिए रिफ्रैशमेंन्ट है;
गलती करो तो पनिशमेंट है;
जीते-जी टेंशन है;
मरने के बाद पेंशन है

मरवण रा बोल..........


म्हरा नाँजोगा भरतार
मदछकिया मरवण रा ढोला आ कांई कुबद कमाई
थारै लारै आय र रोटी कदै ही न ताती खाई

म्हारा मूंछ्यांला मोट्यार
ईयूं किकर पङैली पार
दिन भर फिरै भटकतौ छैलो
थौथी करै छैलांया जी
करेंई जावे बीकानेर करेंई जावे जयपुर
10-10 दिन ताणी घरें कोनी आवे
जद भी पूछूं आ ही केवे
अबके ओ लास्ट धरणू है
म्हारा नाजोगा भरतार
म्हारी कियां पङैली पार
मीठा बोल कदै ई ना सुणिया
बटका भरता बौलै
आई वसुंधरा सरकार
कूदण लाग्यो नौ नौ ताळ
भरस ऐक बीत गियौ, अब उपजी है आस
करम कमाई भूल गा साल दियो गुजार
म्हारी ऐक अरज सुणज्यौ वसुंधरा सरकार
म्हारा पिया जी ने दैवो नौकरी जणां पङैली पार
नीतर आँ छोटा - छोटा टाबरां की लागेली हाय

अच्छे दिन कब आयेँगे...?

दीवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?
यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
*कामचोर सरकारी कर्मचारी पूछता है,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
*देश से गद्दारी करता व्यक्ति पूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
नौकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्तिपूछता है,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
राष्ट्रगान के समय बातें करते
स्कूलों के कुछलोग पूछते हैं,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं ***
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
घरों में हर सम़य सिरियल देखती महिलायें पूछती हैं,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
सड़क पर रेड सिग्नल तोड़ते लोग पूछते हैं,
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?
कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछतेहैं,"
अच्छे दिन कब आयेँगे...?

ये विचार के  GR Dhaka Fatehpuraहै  
जिनको मैने आज सुबह फेसबुक पर विचरण करते पढ़ा मुझे तो अच्छे लगे और आपको कैसे लगे?
मैने सोचा इनके विचारों को आगे तक बढ़ाया जाया से मै आपके सामने इन्हे शेयर कर रहा हूं आपको अच्छा लगे तो बताना 

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राजस्थानी होळी धमाल सुनिये एम पी थ्री में HOLI DHAMAL IN MP3

  फागण धमाल

तेज हवा ने ललचाया मन पर सर्दी ने किया निराश मकर संक्रांति


ले ल्यो पट्टी बरतो पढ़णों जरूर है,लक्ष्य का स्कूल

 

लक्ष्य

Sunday, February 3, 2013

राजस्थान में बढ़ाई बगड़ नगर की शान,पहचान,मुकेश दाधीच

आज बगड़ के लिए बहुत ही खुशी का दिन हैं  बगड़ नगर की एक शख़्सियत ने आज झुन्झुनू जिले के साथ  बगड़ नगर की पहचान राजस्थान में बनाई हैं जिस पर पुरे  ब्राह्मण समाज को ही नहीं सम्पूर्ण समाज को गर्व हैं  वो  विभूति हैं बगड़ नगर में जन्में श्रीमान मुकेश दाधीच जनिको (ब्राह्मण समाज संग) सम्पूर्ण विप्र समाज संग का  राजस्थान का अध्यक्ष बनाया गया है। यह बगड़ नगर के लिए बडै ही गर्व की बात है।

 अध्यक्ष चुने जाने के बाद मुकेश दाधीच ने अपनी शेखावाटी यात्रा के  दौरान सीकर नवलगढ झुन्झुनूं होते हुए आज अपनी जन्म स्थली बगड़ में प्रवेश किया जहा उनका बहुत चाव से हर्ष व उल्लास से स्वागत किया गया  वर्तमान  तथा पूर्व नगर पालिका चैयरमैं  के साथ सभी बगड़ नागरिको गणमान्य व्यक्तियों ने उनका माला अर्पण  कर स्वागत किया तथा बाजे गाजे के साथ उनके साथ नाचते गाते हुए स्वागत किया गया
 उन्होने ने लोगों से मिलते हुए पुरे बगड़ का चक्कर लगाया सबसे पहले उनका स्वागत बगड़ के तिराहे स्टेण्ड पर हुआ जहां मैने भी उनका माला पहनाकर स्वागत किया

 पुरे बगड़ का चक्कर लगाकर वे धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए माहेश्वरी काम्पलेक्स में रूके तथा वहां लोगों से मिलकर  तथा अपने अध्यक्ष चुने जाने के घटना क्रम में जानकारी दी तथा बगड़ नगरपालिका चैयरमैन ने उन्हे बगड़ नगर की जनता की तरफ से बधाईया दी । उन्होने बगड़ नगर की पहचान सम्पूर्ण राजस्थान के साथ भारत तक करवाने की बात कही
 और बगड़ नगर व आस पास की हर समाज की जनता के साथ जुड़े रहने की बात भी कही,

अब में आपका श्री मुकेश दीधीच के बारे में अल्प जानकारी दे देता हूं 
इनका जन्म एक साधारण ब्राह्मण परिवार में   4 जनवरी 1972 को बगड़ नगर में हुआ इन्होने पीरामल सी.सै स्कूल से माध्यमिक व उच्च माध्यमिक परीक्षा पास करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. एल.एल. बी पास की है। इन्होने भारतीय जनता पार्टी में  जुडकर अपना राजनैतिक जीवन शुरू किया
ये  National Executive Member (BJYM) BJP youth wing  हैं तथा   Incharge Youth BJP Rajasthan रह चुके हैं और पूर्व नगरपालिका उपाध्यक्ष बगड़ भी रह चुके हैं और ये वर्तमान में जयपुर में रह रहे है।



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लक्ष्य

Friday, July 27, 2012

मायड़ भाषा राजस्थानी री शान बढ़ावण हाळा ब्लॉग

जिसूं पहचाने सब म्हाने आपांरी खास निशानी है
वा 10 करोड़ कण्ठां रमती मां भाषा राजस्थानी है।’’
‘‘भारत में 10 करोड़ लोग राजस्थानी भाषा बोलै है।  अर हमारी विडम्बना देखो आज भी  वो भाषा संवेधानिक मान्यता पाणे के खातर तरसै है।" 
आज नेट पर विचारण करता करतां राजस्थानी भाषा रा बे ब्लॉग मिला जो ठेठ राजस्थानी भाषा माय है और राजस्थानी भाषा का नाम मान सम्मान बढ़ावण लाग रया है। मैं उण सब ब्लॉग लिखण हाळा नै  घणो घणो धन्य वाद देऊं हूं कि  बे राजस्थानी भाषा न बढ़ावा दे रया है और नेट दुनिया मायं भी इह भाषा नें बढ़ावण लाग रया है। अर मैं थारे सामने पेश करणो चाउं हूं उण ब्लागा रा लिंक अर उण नैं लिखण हाळा मालिका का नाम
राजस्थानी रा रचनाकारां रा मं ब्लॉग म ओम पुरोहित 'कागद' रा 'कागद हो तो हर कोई बांचै' रामस्वरूप किसान,रामस्वरूप किसान री राजस्थानी कहानियों रो ब्लॉग
संदीप मील रो 'राजस्थानी हाईकू' अर 'बहती धारा'
 राव गुमानसिंह राठौड़ रा 'राजिया रा दूहा' अर, 'सुणतर संदेश' शिवराज भारतीय रो 'ओळूं' संग्राम सिंह राठौड़ रो 'स्व. चंद्रसिंह बिरकाळी री रचनावां' डॉ. मदनगोपाल लढ़ा रो 'मनवार' पूर्ण शर्मा 'पूरण' रो 'मायड़ भाषा'
 जितेन्द्र कुमार सोनी रो 'मुळकती माटी' ,कवि अमृतवाणी रो 'राजस्थानी कविता कोश',डॉ. नीरज दईया रा 'सांवर दईया', 'राजस्थानी कवितावां', 'नेगचार', 'राजस्थानी ब्लॉगर'अर 'अनुसिरजण', डॉ. दुष्यंत रो 'रेतराग', रवि पुरोहित रो 'राजस्थली, दीनदयाल शर्मा रो 'टाबर टोळी', राजेन्द्र स्वर्णकार रो 'शस्वरं, अंकिता पुरोहित रो 'कागदांश', किरण राजपुरोहित 'नितिला' रो ''सिणगार', 'भोर की पहली किरण', संतोष पारीक रो 'सांडवा', अजय परलीका रो 'भटनेर'अर राजस्थानी गीतों रो संग्रह 'बुगचो', दुलाराम सहारण रा 'हरावळ', 'साहित्यकार दर्शन', 'आगीवांण', 'हेलो' अर 'पोथीखानो', नंद भारद्वाज रो 'हथाई', पुखराज जांगिड़ रो 'जय रामधनी', मोनिका शर्मा रो 'तीज तैंवार' अर 'मेरी परवाज', शिवराज गूजर रो 'सिनेमा फेस्टिवल' अर'मेरी डायरी', हरीश बी. शर्मा रो 'मरूगंधा', अलबेला खत्री रो 'म्हारो प्यारो राजस्थान' , उम्मेद गोठवाळ रो 'अभिव्यक्ति' , कुमार गणेश रो 'रेजगार', चैनसिंह शेखावत रो 'मायड़ रो गोथळियो', जोगेश्वर गर्ग रो 'गूंगै रा गीत'  , सोहनलाल रांका रो 'कवि सहज' , डॉ. मदन सैनी रो, डॉ. मंगत बादल, राजूराम बिजारणियां, कविता किरण, राजेश चड्ढ़ा, अर कई लोगां नैं अपने अपणे नामां सूं भी ब्लॉग बणा राख्या है।, हरीश भादाणी, किशोर पारीक, कृष्णा कुमारी, चंद्र प्रकाश देवल, निशांत, पुरूषोत्तम यकीन , बिहारी शरण पारीक , मणि मधुकर, मनोज कुमार स्वामी , मालचंद तिवाड़ी , रामेश्वर गोदारा 'ग्रामीण' , लीटू कल्पनाकांत और भी कई इसां ब्लॉग होगा जिके बारे में मने जाणकारी कूनी है। 
इंटरनेट पर राजस्थानी भाषा री मूल रचनाएं
री  पत्रिकाओं में रोजाणा छपती रहवै है।  जिणमें है। - 'हिन्दी कविता कोश' , नरेश व्यास रा 'आखर कलश', प्रेमचंद गांधी रा 'प्रेम का दरिया', रविशंकर श्रीवास्तव रा 'रचनाकार' राजस्थानी भाषा री  मान्यता सूं  जुड़्योड़ा मुद्दा पर चर्चा रा ब्लॉग भी हैं। जिणमें- कुंवर हनवंतसिंह राजपुरोहित रा 'मरुवाणी' अर 'म्हारो मरुधर देश', विनोद सारस्वत रा 'मायड़ रो हेलो', सागरचंद नाहर रा 'राजस्थली', अजय कुमार सोनी रा 'मायड़ रा लाल',अर 'राजस्थानी रांधण', राजस्थानी गीत गायक प्रकाश गांधी अर जितेन्द्र कुमार सोनी रा भी राजस्थानी भाषा मांय ब्लॉग हैं।
राजस्थान र बारै में पुरी जानकारियों नं राजस्थानी भाषा मांय प्रस्तुत करने वाली प्रमुख वेब साईट- 'आपांणो राजस्थान' है, जिणने इसरो रो पूर्व वैज्ञानिक डॉ. सुरेन्द्र सिंह पोकरणा चलावै है। इंटरनेट पर कई गांवों का भी ब्लॉग हैं जो राजस्थानी में हैं- सत्य दीप
रो 'मेरो गाँव', रतन सिंह शेखावत रो 'मेरा गांव भगतपुरा' इंह ब्लाग क मायं राजस्थानी भाषा रा गीत अर विडियो गाणा है। अंकित बूबना जी रो फतेहपुर शेखावाटी रो ब्लॉग,इंह ब्लॉग मं फतेहपुर शहर री सगळी ताजा जानकारीया हिन्दी अर राजस्थानी में समय समय पर पुगती रहवै है।, जितेन्द्र कुमार सोनी "प्रयास" रो मुळकती मांटी, अजय कुमार सोनी रो बुगचो विनोद सारस्वत रो मायड़ रो हैलो रो अयाळका और भी भौत ब्लॉग लिख्या जा रया है। इण सारा ब्लागा रा लिंक मैने अजयकुमार सौनी र ब्लॉग  रांधण सं मिल्या है।
मेरी तरफ सूं इंण राजस्थानी भाषा की शांन बढ़ावण हाळा लेखका नै घणो घणे धन्यवाद


आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

रोज सुबह की मस्ती खरगोश के बच्चों के साथ, लक्ष्य

 

चलायें अपनी मर्जी से अपने कम्प्यूटर की विन्डोज

 बालाजी के आशीर्वाद के साथ लक्ष्य का दुसरा जन्म दिन

बेचारा जमींदार झेल रहा सर्दी और सरकार की मार

  सोनू की जिद और नाहरगढ़ दर्शन,जयपुर

मेरे बाप पहले आप( लक्ष्य का बाल हट )


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