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Tuesday, July 20, 2010

चित्रकारी और शिल्प कला,का बेजोड़ नमूना बगड़ का मोती महल

बगड़ कस्बा जिसका जिक्र मैं अपनी एक पोस्ट में पहले भी कर चुका हूं  यह कस्बा हमारे जिला मुख्यालय झुन्झुनूं से 15 कि.मी दूर स्थित है।इसके बारे में विस्तृत पढ़ने के लिए मेरी पोस्ट बगड़ एक नजर में  पढ़े। अब तो मैं आपको बगड़ की एक विशाल धरोहर जो (इतिहासकारों के अनुसार) वि.स. 1840 में  शार्दूल सिंह  के पड़पोते मालिक सिंह (महा सिंह) बगड़ आये और उन्होंने गढ़ का निर्माण करवाया था।  अब यह महल नबाब अलि खां के महल (मोती महल) नाम से जाना जाता है।
नरेश सिंह राठौड़ जो महल के नजदीक ही रहते है इनके द्वारा मिली टिप्पणी जानकारी के अनुसार यह महल 
‘‘ नरहड के नवाब मोहन खां ने बनवाया था| यह १९४७ तक उनके कब्जे में रहा बाद में यह लावारिस होने की वजह से कस्टोडियन ने नीलाम किया जिसे सेठ मोती 
लाल जी ने खरीद लिया और इसे एक चैरीटेबल ट्रस्ट
के अधीन धर्मशाला के तौर पर रखा है लेकिन अब इसकी देख रेख करने वाला कोइ नहीं है | आज केवल पोलियो बूथ या चुनाव मतदान केन्द्र बनाने के अलावा इसका कोइ उपयोग नहीं है |’’
इसमें उस समय के चित्रकारी के बेजोड़ नमूने है। जो अभी तक स्पष्ट देखने को मिलते है। जो आपको फोटो में दिखाये गये है। यह महल दो मंजिला भवन है। इसमें घोड़ों की घुड़साल,रसोई खाना,महिला विश्राम गृह (जनाना महल), सभा गृह आदि बने हुए है और उनकी दीवारों पर बहुत ही सुन्दर व कलात्मक चित्रकारी की गई है जो अपने आप में एक अनूठी
मिसाल कायम करती है। और उस समय के चित्रकारों, शिल्पकारों,कारीगरों की याद दिलाती है। आज के कारीगर के लिए यह सब कुछ कर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है और करता भी है तो बिना
मशिनरी  की सहायता से नहीं कर पाता और इतनी सुन्दरता नहीं दिखा सकता है।     इस कलाकारी को देखकर मेरा मन उस समय के कारीगरों को सलाम करने को करता है। 
यही विशाल धरोहर लगभग 2 बीघा जमीन पर फैली हुई है। और इसका निर्माण (चिनाई ) पत्थर और चुने से की गई है इसकी दीवारे लगभग 2-2.5 फिट तक चोड़ी हैं इसमें उपर तक पत्थरो तक चिनाई की गई

है।इतनी मजबूत दीवारे और इतनी सुन्दर कलात्मक चित्रकारी जो आज भी इनकी दीवारों पर स्पष्ट देखने को मिलती है
इस महल का सभा गृह जो दूसरी मंजिल पर बना हुआ है। जहां बैठ कर सभा की जाती थी उस कमरे में  उपर एक बड़ा  गाटर काठ की लकड़ी का (शहतीर) साल की लकड़ी का बना हुआ लगा है जिस पर इतनी बारिक व सुन्दर खुदाई करके कलाकारी की गई है

जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति अचंभित रह सकता है। इतने वषों के बाद भी यह ज्यों का ज्यों  पड़ा कोई टूट -फूट नहीं है। इसको आज तक कोई दीमक किड़े 
वगैरह भी नहीं लगे है। इतने वर्षो और बिना सार सम्हाल के बाद भी यह शहतीर ज्यों का त्यों पड़ा है कमाल की बात हैं उस समय की लकड़ी की और उस समय के कारीगरों की । 
 दीवारों पर की गई उस समय की चित्रकारी आज भी मन को लुभाना नहीं भूलती है।
 ( चित्रों को बड़ा देखने के लिए उन पर डबल क्लिक करें।)
 इस लकड़ी पर इतनी बारीक कढ़ाई खोदकर निकाली गई जिसको देखकर अचंभित होना पड़ता है। और आज तक यह लकड़ी बिना टूटे बिना दीमक आदि लगे ज्यों की त्यों है।
 परन्तु अब इस महल की दिवारें गिरने लगी है वो बिना किसी की देखभाल के कारण अगर इसकी देखभाल नहीं की गई तो कुछ समय में यह सिर्फ एक कचरे या मलबे का ढेर बनकर रह जायेगा।  अगर आज भी इसको कोई हेरिटेज होटल या हॉस्पीटल के काम में लिये जाये तो यह इस महल के लिए बड़ा सौभग्य और बगड़ की जनता तथा सैलानियों को लुभा ने के लिए एक अनूठी चिज होगी।
   

यह जिम्मा नगरपालिका को लेना चाहिए ताकि इस भवन की देखभाल हो सके और लोगों के लिए यह प्राचीन धरोहर एक ऐतिहासिक धरोहर बन कर रह सके।
   
                  
  इस महल में नीचे एक कमरे में एक गुफा का भी जिक्र सुना जाता है जो कोई तो बताता है कि यह गुफा नरहड़ पीर साहब तक जाती है कोई बगड़ के बाहर तक जाती बताते है परन्तु इसके बारे में कोई पुष्टि नहीं हो पाई है हालांकि मैने इस गुफा के मुख्य द्वार से फोटो जरूर लिये है लेकिन अब बहुत ज्यादा पुरानी होने के कारण इसमें जाने का साहस नहीं कर पाया। 

आज यह महल अपनी बेबसी और जीर्ण - शीर्ण हालात पर खड़ा रो रहा है। इनकी देखभाल न तो नगर
पालिका कर पा रही  और नही कोई और...
    मेरा तो यही कहना है क हमें हमारी प्राचीन धरोहरों को रख रखाव करके रखना चाहिए  और इसके ज्यादा मैं आपको इसके बारे में न लिखकर इसकी फोटो ही दिखाना ज्यादा पंसद करूंगा उन्हें देखकर आप ही बतायें कि ...

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