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Sunday, July 25, 2010

पळका

एक शिष्ट  राजस्थानी गीत पळका

              मैने पहले भी राजस्थानी  कवि कैलाश जी मण्ड्रेला की  कविता तैने कुण  कहवै री काळी, आपके समक्ष पैश कर चूका हूं ,और आज उनकी ही एक कविता जो अबौध प्यार पर निर्भर है ‘‘पळको’’
एक 12 -13 साल का लड़का  और एक 12-13 साल की लड़की दोनों के आमने सामने घर लड़का अपने घर की छत पर चढ़कर लड़की के घर  काच के चलके पटकता  चलके के पड़ने  से जो पळका पड़ता उस पर कवि ने यह गीत लिखा है कांच के चलके से जो रीफ्लैक्शन पड़ता है उसे पळका कहते है।
          लड़की समझती कि चलके का मतलब क्या और न लड़का समझता कि चलके का सही मतलब क्या? पर मजा दोनों को ही आ रहा । लड़की परेशान होकर कहती है उस क्षण को कवि मण्ड्रेला जी  ने अपनी लेखनी में बांधा है।
       यह एक अबोध प्यार (इनोसेंट लव) कैसे होता है वही बताने का पूर्ण प्रयास किया है कवि ने।
और जब अंत में लड़की अपनी सहेलियों को चलके का सही मतलब पुछती है तो कवि ने अंतिम 5 नम्बर के मुखड़े में लिखा कि लड़की क्या कहती है? और इसको कवि ने अनुप्रसा अलंकार के साथ पैश किया है। जो बहुत ही अच्छा लगा। जिसके लिए मैं राजस्थानी कवि डॉ. कैलाश जी मण्ड्रेला को बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहुगा। अगर आपको भी कविता अच्छी लगे तो मण्ड्रेला जी को धन्यवाद देना।
इस कविता में कवि ने लय स्वर के साथ अनुप्रास अलंकार का सटीक प्रयोग किया जिसे आप देख सकते है।
जैसे (चाचा ने चाची को चांदनी चोक में चांदी की चम्मच से चाट चटाई की तरह ही अनुप्रास अंलकार का बहुत सुन्दर प्रयोग )


1 डागळा री डोळी पाछे छाने छाने छुप छुप,
मत पटके रै चलका काच का
आख्या में म्हारे पळका पड़े रै म्हारे पळका पड़े।

2 खोड्या र् करतो मचक मचक कर
नीत बिगाड़ों नचक नचक कर
डोळया र् चढ़तो उचक उचक कर,
अर माजणा सूं मानजा जै खैवूं हूं
नितर थारी गत बिगड़े छोरा कळी बिगड़ैं
मत पटके रै चलका काच का
आख्या में म्हारे पळका पड़े रै म्हारे पळका पड़े।
3 दांतला रै दूर सूं तूं मत कर हांसी,
नितर म्होरो भाई थ्हारा रूग्च्यां उडा सी
थ्हारा काच में ही थ्हारो थौबड़ो दिखा सी,
और कुतरे रो जो पड़ग्यो उबा मौरा में गडे
तो थ्होरो चामड़ों सडे, छौरा चामड़ों सडे,
हे मत पटके रै चलका काच का
आख्या में म्हारे पळका पड़े, रै म्हारे पळका पड़े।

4 मान अणूता मत सळगावे लखणा बिगाड़ो लखण बतावै
तिजोरी का उंदरा ज्यूं ताक लगावै
तो काच री आंच सै वा औट कर चानणी पै भागी आऊ
जिसूं म्हारी जीजी लड़े लड़े रे म्हारी जीजी लड़े,
मत पटके रै चलका काच का
आख्या में म्हारे पळका पड़े रै म्हारे पळका पड़े।
5 चलका री चक मक सूं चकराई
साथणा नै गौरी जद बात बताई
आखीर में बात समझ में आई
तो
चोरडा़ जी चलका सूं  चोरी चोरी चोर लियो
चांद चुप-चाप म्हारी चूनड़ी उडै रे, छोरा चूनड़ी उडै
देखता ही देखता यो तेरो फिको तीर म्हारे सळया गडै रै म्हारे सळया गडै
मत पटके रै चलका काच का
आख्या में म्हारे पळका पड़े रै म्हारे पळका पड़े।




कठिन शब्दों के अर्थ

डागळा री डोळी   - छत की (मडीरी) दीवार
छाने -छाने         - छुप छुप कर
पटके                - गिराना
चलका            - कांच का धुप में डाला गया प्रतिबिंम्ब
पळका            - चलके के डाले जाने पर जो रिफ्लेक्सन होता है वही पळका
खोड्या            - शैतानी
मचक मचक   - कंधे उचकाते हुए मन खुश करते हुए।
नीत बिगाड़ो    - आदत बिगाड़ना
माजणा           - इज्जत से
खैवूं                 - कहती हूं।
नीतर               - नहीं तो
थारी                - तुम्हारी
गल\कळी        - हालत
आख्यां            - आंख में
दांतला             - बडै दांतों वाला
रूग्च्यां             - रूंग उडाना \बाल उडाना, पिटाई करना
थ्हारो               - तुम्हारो
थौबड़ो              - मुंह
उबा                  -  सिधा खड़ा
चामड़ो              - चमड़ी
उंदरा                 - चूहा
गडै़                    - चुभना
सळया               - सुली की तरह
अगर और कोई ‘शब्द समझ में नहीं आये तो ट्टिपणी द्वारा पुछ सकते है।

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