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Friday, December 31, 2010

अब दस को बस 11 का स्वागत


ब्लॉग जगत के  सभी पाठको,देशवासियों,  ब्लॉगर मालिको व सभी के परिवार जनों को मेरी तरफ से नव 2011वर्ष की हार्दिक शुभकामनाए  यह वर्ष 2011 आपके जीवन में नई उमंगें, खुशिया लेकर आये तथा देश में अमन व शान्ति बनी रहे, इन्ही शुभकामनाओं के साथ सभी को नव वर्ष मुबारक हो 
2011 is Coming In Advance Wish You The Very  Happy New Year Day,HappyFriendship Day, Republic Day ,Independence Day, Gandhi Jaynti & other Jaynti, Happy Ramzan, Happy Diwali & Holi, Happy Mother,Father ,Dada, Dadi, Nana,Nani Days,Happy Teachers, Students,  Childreens Day Happy Birthday and 365 Good Mornings,Good Afternoon,Good Evenings & Good Nights.
  बाकि कुछ बचा तो आप अपनी तरफ से सोच लेना इन सभी शुभकामनाओं के साथ 2011 का स्वागत करते है। 

आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

शेखावाटी में होने वाली शादीयों के विचित्र रिवाज

 दीपावली की धूम की सजावट का अपना अपना नया अंदाज,बगड़

 घमसो मैया मन्दिर धौलपुर एक शेषनाग फनी पर्वत और प्...

रोडवेज बस चालक की सुजबुझ ने बचाई 30 सवारियों की जान

जितनी लम्बी सौर सुलभ हो उतने ही तो पग फैलाएं ( ज्वलन्त समस्या)

साया : - नव वर्ष की शुभकामनाएं

बहुत उपयोगी है सहजन का पेड़-various use of drumstick tree
साया

लक्ष्य

Monday, December 13, 2010

सरसों की फसल और सर्दी परवान पर,मालीगांव

 गांव में इस समय सरसो, चना,गेहूं जौ आदि की फसल उगाई हुई है।  आज प्रातःशरीर को कंपकंपी देने वाली सर्दी थी, जब मैं उठा कमरे के दरवाजे से बाहर निकला सामने देखा पीले फूलों से लथपथ सरसों की फसल एक नवयोवना दुल्हन की भांति सजी सवरी खेत में खड़ी लहलहा रही थी खेत ऐसे लग रहा था मानो कोई राजा हरी मखमली चारद ओढ़े हुए अपने सर पर स्वर्ण जड़ित हिरों का मुकुट पहने बैठा धुप सेक रहा हो। अर्थात अगेती सरसों की फसल फूल निकालकर अपने पूर्ण योवन परवान पर है।यानी अपने फल देने के लिए तैयार है।  और अब इसे सर्दी पाळा मारने का भय किसानों को बना हुआ है।
 क्योंकि यह माह सर्दी के लिए भी परवान चढ़ने का माह ही माना जाता है। और इस वर्ष गत वर्षो की तुलना में सर्दी कुछ ज्यादा ही पड़ रही है। कही कही तो पाळा"खरखरिया" जमने लगा है।
 वही दूसरी तरफ गेहूँ कि फसल को भी अब पानी "कोरबा" देना शुरू कर दिया गया है।जहां यह सर्दी सरसों के लिए एक अभिशाप बनी हुई हैं वही अब यह सर्दी गेहूँ की फसल के लिए वरदान है। क्योंकि जितनीज्यादा सर्दी बढ़ेगी गेहूं का रंग और बढ़त उतनी ही ज्यादा होगी। इसी विरोधाभास के कारण किसान वर्ग चिन्ता ग्रस्त रहता है। हालाकि आजकल वह चालाक हो गया है। उसने भी रास्ता निकाल लिया है। पछेती (बाद की फसल) को बोकर पहले वह अगेती सरसो बो देता हैं अगर सर्दी न मारी तो वह फसल अच्छी रहेगी और अगर उसे सर्दी मार जाती हैं तो पछेती फसल सरसों बच जायेगी 

 ये पछेती "फसल"आलू की खेती भी जोरों पर है।

 पछेती "फसल"सरसों को किसान यूरिया आदि खाद डालकर जल्दी तैयार करने के फार्मूले लगाता है।वैसे फसल खेती किसान के लिए अपने बच्चो की तरह होती हैं उसे पालने के लिए वह बिना सर्दी गर्मी की परवाह किये दिन रात मेहनत करता रहता है। और अंत में मिलती है उसे या तो प्राकृतिक मार या सरकार की काला बाजारी अर्थात कम भाव
 यहाँ देखिये छोटी सरसों की खेती में खाद डालता किसान और फिर फ्वारें से सिचाई करता सर्दी से फसल को बचाने के लिएअपनी फसल को  रात की बजाय दिन में पानी लगाता हैं क्योकि रात को पानी देने से फसल को सर्दी लगने का भय ज्यादा रहता है। इसलिए फसल के लिए दिन में पानी देना ज्यादा उत्तम रहता है।
 नीचे देखिये फ्वारों द्वारा फसल कि सिचाई के दृश्य जो अति सुन्दर लग रहें है।
मैने सोचा ये सब आपके साथ शेयर कर लूं , आप ही देखिये कि फसल रूपी चादर ओढ़े खेत कैसा  सुन्दर लग रहा है।
आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

भूखे भक्तों को भगवान , भोजन कब पहुचाओगे

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 साया :- जय मां पहाड़ा वाली जय मां शेरा वाली कर दे कोई चमत्कार,सारा जग माने तेरा उपकार

मेरी शेखावाटी - : तिलियार में हुआ सम्मलेन भाग -२ --------- नरेश सिंह...

हाथ का दर्द और कम्प्यूटर पर बैठने की आदत........................नरेश सिंह राठौड़
साया

लक्ष्य

Sunday, December 5, 2010

शेखावाटी में होने वाली शादीयों के विचित्र रिवाज

 सबसे पहले काफी दिनों बाद आप सभी पाठकों ब्लॉग मित्रों गुरूजनों को मेरा सादर प्रणाम
आपको बता दूं कि मैं पिछले काफी दिनों से शादीयों में व्यस्त था इसलिए कुछ नया लिख नहीं पाया और और पढ भी नहीं पाया शादीयों में इसलिए कि अपना धंधा ही ऐसा हैं स्टूडियों का भाई पेट पुजा के लिए बुकिंग लेकर जाना पड़ता है। हम फोटो ग्राफरों या यू कहें कि स्टूडियो वालों का काम ही ऐसा हैं कि हमसे शादी विवाह के किसी भी प्रकार के रश्म रिवाज छिपे नहीं हैं या यू कहे कि पूरी की पूरी शादी हमारी निगाहों के सामने से होकर गुजरती है।  और एक नई बात यह कि अनजान जगह होते हुए भी हमें पहचान बनाने की कोई जरूरत ही नहीं पड्रती सिर्फ हमारा टूल केमरा ही हमारी पहचान बना देता हैं और दोनों पार्टियों के साथ बहुत ही जल्दी हमें इस प्रकार से घुल मिला देता हैं कि यह तक पता नहीं चलता कि हम कोई अंजान है। या अंजान जगह आये है। 

 सबसे खस बात यह कि घर के बड़े बुढ़ो सहित बहु बेटियां सभी बेझिझक हमारे साथ घुलमिल जाते है।  यहा तक कि घुंघट की आड़ में रहने वाली बहुऐ भी हमारे सामने बेपर्दा होने से नहीं सकपकाती  क्योकि भाई फोटो खिचाने का शोख जो रहता है।भले ही शादी के दो दीन बाद हम जाये तो वे घुघट न हटाऐ पर इस समय तो सटाक से कहे अनुसार एक्शन करती है।  ये तो रही हमारे धंधे के खास हुनर की बात
अब आपको कुछ ऐसे रिवाजों के बारे में बताने जा रहा हूं जिसके बारे में खुद बुजुर्ग लोगों को भी कोई खास तथ्य नहीं पता लेकिन वे इनको निभाते जा रहें है। 









सबसे पहले मैं जिक्र करता हूं एक रिवाज चाक पूजन की
महिलाए इक्ट्ठा होकर खाली नये मटके लेकर कुम्हार (एक जाती जो मटके बनाने का कार्य करती है। ) के घर पर जाती हैं और वहा पर रखे चाक (जो मटके बनाने के काम आता है।) उसका पूजन मूंग, तेल,रोली, मोली और चावल, गुड चढ़ाकर उसका पूजन करती है।और फिर वहां एक घेरा बनाकर क्षेत्रिय गीतों पर नृत्य करती हैं हालाकि आजकल आधुनीकरण की होड में नई झलक देखने को मिल जाती है कि डी.जे के गानों पर नृत्य होने लगा है। इस रिवाज के बारे में पुछे जाने पर बुजुर्ग लोग सिर्फ यही बताते हैं कि "ये रिवाज पहले से ही चला आ रहा है। इसलिए हम भी यह निभाते है।" तथ्य क्या कुछ पता नहीं अगर आप विद्वान लोग जानते हैं तो बताने की कृपा करें। 


 वैसे तो शादी में बहुत से रिवाज होते हैं परन्तु मैं यहा उन प्रमुख रिवाजों के बारे में बताना चाहता हूं जो कि बिना किसी तथ्य के घिसते चले आ रहें है।


दूसरा  प्रमुख रिवाज देखने को मिलता है। समधी जच्चा
इसमें  दुल्हे के पिताजी को जच्चा (बच्चे की मा) बनाया जाता हैं उसका पूरा श्रृंगार किया जाता हैं और गोद मेंछोटा बच्चा रखा जाता है। तथा थाली बजाई जाती है। अर्थत वहीं सिस्टम जो बच्चे के जन्म लेने पर घर में किया जाता है। यह सब शादी में करने का क्या तात्पर्य है। और वो भी दुल्हे के पिताजी के साथ मेरे तो समझ से परे की बात हैं मैं इसको आत तक नहीं समझ पाया हूं हालांकि  शादियों में ऐसा देखता जरूर हूं। पता करने पर जबाब वो ही उपर वाला गोल मोल अब ये भी आप ही बतायें?


अगला रिवाज है।  (बर्तन) थाली खिसकाना और इक्ट्ठा करना
अर्थात गृह प्रवेश रश्म इसमें जब दुल्हा दुल्हन को लेकर घर में प्रवेश करता हैं तो लडत्रके की मां द्वारा पर अन्दर की तरफ 7 थालीयां रखती है। और दुल्हा उन थालियों को अपनी कटार से इधर उधर खिसकाता रहता है।  पिछे से दुल्हन उन थालियों को अक्ट्ठा करती रहती है। वो भी बिना टनटनाहट की आवाज के ऐसा माना जाता हैं कि अगर थाली इक्टठा करने में कोई आवाज हुई तो सास बहु की लडाई हो सकती है।  इस रश्म को निभाने से लड़ाई कितनी हद तक रूकती हैं ये तो आप सब भली भांति जानते ही है। ज्यादा बताने से क्या फायदा पुछे जाने पर इसके दो तीन उत्तर आये वो हैं कि  इससे अगर घर का मर्द यानी दुल्हा अगर घर की वस्तुए बिखेरता हैं तो औरत यानि दुल्हन को ऐसा होना चाहिए कि वो उसे समेट ले-
यह कि इससे दुल्हन के आज्ञाकारी होने का पता चलता है।
यह कि इससे सास बहु में हमेशा बनी रहती हैं झगड़ा नहीं होता  अब आप ही बताये कि ये किस हद तक सही है।



अगला रिवाज हैं सोट सोटकी यह रिवाज बहुत ही रोचक और आश्चर्यजनक रिवाज है। कुछ समय पहले यानि गृहप्रवेश में तो झगड़ा न होने की बात की जाती हैं और उसके कुछ समय के बाद ही यह रश्म अदा की जाती है। इसमें सबसे पहले दुल्हा आपसे में नीम या जाल की सोटकी से एक दुसरे को मारते हैं और फिर दुल्हे के सांग दुल्हे की भाभीयां इसी क्रम में खेलती हैं और दुल्हन के साथ उसके देवर खेलते है। और कही कही तो दुल्हन के ननदोई यानी कि दुल्हे के जीजा जी भी दुल्हन के सांग खेलते है। कही कही तो देखा जाता हैं कि यह खेल भंयकर हो ताजा है। और एक गुस्से का रूप लेकर शरीर को चोट पहुचाने लायक बन जाता है। मजाक मजाक में ये लोग एक दुसरे को चोट पहुचा देते है। और आक्रामक रूप से खेलने लगते है।  इसके पिछे क्या तथ्य हैं ये भी लोग नहीं बता पाये




अगला रिवाज हैं जुआ खेलना यह रिवाज भी विचित्र है। इसमें दुल्हा दुल्हन आपस में अपने कांगन डोरे खोलते हैं और दुल्हे की भाभी उसमें दुल्हन की मुंदड़ी (अंगूठी) मिलाकर उन दोनों को एक कोरे नये कुण्ड नुमा मिटटी के पात्र में दुध और पानी डालकर सात बार यह खेल लिखवाती है। इसमें यह देखा जाता है। हैं उस सफेद पानी में सेडाला गया डोरा और वो मुंदड़ी (अंगूठी) पहले कौन निकाल कर लाता हैं दुल्हा या दुल्हन  जो ज्यादा बार लाता हैं वह जितता है। और अंत में दुल्हा दुल्हन की मुटठी को खोलकर उसमें वो अंगूठी पहना देता है। यह भी विवाह का अटपटा लगने वाला रिवाज लगता है। जिसका कोई तथ्य परक उत्तर आज तक सामने नहीं आया और भी कई ऐसे रिवाज है। जिनका कोई तथ्य नहीं निकलता है।
और मैं आपको यह बता देता हूं कि आप सभी शादी शुदा लोग इन सभी रश्मों से होकर गुजर चुके हो परन्तु  शायद ही कोई इन रश्मों का तथ्य जानता हो बस करते आ रहे है। करते आ रहें है ...मुझे 8-10 साल हो गये स्टूडियों का कार्य करते हुए लेकिन इन रिवाजों के बारे में मैं आज तक सही नहीं जान पाया तो फिर ये रिवाज क्यों निभाये जा रहें यह सवाल मन में हर शादी में जरूर उठता है। लोगों से पुछ भी लेता हूं फिर सोचता हूं कि हमें क्या हमें तो मजदूरी करनी है। आज मेंने सोचा क्यों न ये सावाल आपके सामने भी खड़ा कर दूं आब आप ही सका कोई सटीक जबाब ढ़ूढ़ कर पेश करने की कृपा करें।

अब आपके सामने दो ऐसे दृश्य हैं जो जो अपने आप में मायने रखते हैं एक है गाय का दुध दोहती हुई मिहला जो अपने बेटे की शादी के कार्य को  बीच में छोड़कर गाय के प्रेम में एसी रमी की तीन दिन तक स्पेशल रूप से आग्रह करके अपनी फोटो खिचाने के लिए दुबारा दुध निकालने लगी कितना प्रेम करती हैं ये अपने पालतु पशुओं को कितना मातृत्व हैं इस गाय को अपने बछड़े से ये आप फोटो को देखकर अंदाज लगा सकते है।


दुसरा हैं घेड़ी डीजे पर 8 फुट उंची छलांग लगाती हुई
लेकिन यह नाच नहीं रही है। यह डीजे की आवाज और लोगों सें भड़कर बेकाबू हो गई और दूसरी घेड़ी पर उछल कुद करने लगी इससे दो महिलाओं को भी चोट आई शुक्र इतना हैं कि उस समय तक दुल्हा इसके उपर नहीं था नहीं तो और भी दुर्घटना घट सकती थी

ये थे हमारे क्षेत्र में होने वाले शादी विवाह के विचित्र रिवाज और हमारा अंदाज

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