


जन्म सवंत 1638 वि. कार्तिक शुक्ला नवमीं दिन मंगलवार रात 12 बजे के पश्चात महम नगर के डोकवा गाँव में हुआ था जो हरियाणा में पड़ता था| इनका नाम नारायणी बाई रखा गया ।इनके पिता का नाम सेठ श्री गुरसामल जी था | नारायणी बाई बच्चपन से ही होशियार ओर बहादुर थी इन्हें युद्ध कला ओर घुड़सवारी का भी ज्ञान था बचपन से ही इनमे बचपन से चमत्कारी शक्तियाँ नज़र आती थी, जो देख कर गांव के लोग अचंभा करते थे।
इनका का विवाह हिसार राज्य के सेठ श्री ज़ालीमराम जी के पुत्रा तनधन राम जी के साथ मंगसिर शुक्ला नवमीं सन 1352 मंगलवार को हुआ था | इनके विवाह में ख़ूब धन दौलत और घोड़े ऊंट वस्तुएं दी गई और कहा जाता है कि एक घोड़ी जो बहुत ही समझदार ओर सुंदर थी जिसका नाम श्यामकर्ण घोड़ी था जो इनके विवाह में तनधन राम जी को दी गई थी
इनके ससुर जलिमराम जी हिसार के नबाब के दीवान थे वहाँ के नवाब के बेटे और तनधन दास जी में मित्रता थी दास जी की घोड़ी शहज़ादे को भा गयी | घोड़ी पाने की ज़िद से दोनो में दुश्मनी ठन गयी | घोड़ी छीनने के प्रयत्न में शहज़ादा मारा गया | जिससे घबरा कर दीवान जी रातो रात परिवार सहित हिसार से झुन्झुनू की ओर चल दिए उन्हें पता था कि हिसार ओर झुन्झुनू के नबाबो में शत्रुता है अतः यह उसे हिसार नबाब से कोई खतरा नही है ये सोच कर वो सपरिवार झुन्झुनू में बस गये | कुछ दिन बीते नारायणी बाई के पिता ने मुकलावे (गोना) का निमंत्रण तनधन राम जी के घर झुन्झुनू दिवान जी पास भेजा ।निमंत्रण स्वीकार होने पर तनधन दास जी राणा के साथ कुछ सैनिको सहित मुकलावे के लिए महम नगर डोकवा गाँव पहुँचे | माघ शीर्ष कृष्णा नवमीं सन्न 1352 मंगलवार प्रातः शुभ बेला में नारायणी बाई विदा हुई |
परंतु होनी को कुछ और ही मंजूर था | इधर हिसार नवाब घात लगाकर बैठा था | मुकलावे की बात सुनकर सारी पहाड़ी को घेर लिया | “देवसर” की पहाड़ी के पास पहुँचते ही सैनिको ने हमला कर दिया | तनधन दास जी ने वीरता से डटकर नबाब की फ़ौज का सामना किया | अंत मे पीछे से एक सैनिक ने धोके से वार कर दिया, तनधन जी वीरगति को प्राप्त हुए |
नई नवेली दुल्हन ने डोली से जब यह सब देखा तो वह वीरांगना नारायाणी चंडी का रूप धारण कर सारे दुश्मनो पर टूट पड़ी और उन्हें काटने लगी । कहा जाता ह कुछ ही समय मे सारी भूमि खून से लाल हो गयी | बची हुई फौज भाग खड़ी हुई | इसे देख राणा जी ने अर्ध बेहोसी हालत में, आकर माँ नाराराणी से प्रार्थना की, तब माता ने शांत होकर शस्त्रों छोड़े।
तथा राणा जी से कहा कि मैं यही पर सती होउंगी तुम जल्दी से चीता तैयार करो,चीता तैयार की गई और दादी अपने पति का शव लेकर चीता पर बैठ गई | चुड़े से अग्नि प्रकट हुई और सती पति लोक चली गयी |

एक पौराणिक इतिहास दन्त कथा ये भी है की महाभारत के युद्ध में चक्रव्यूह में वीर अभीमन्यु वीर गति को प्राप्त हुए थे | उस समय उत्तरा जी को भगवान श्री कृष्णा जी ने वरदान दिया था की कलयुग में तू “नारायाणी” के नाम से श्री सती दादी के रूप में विख्यात होगी और जन जन का कल्याण करेगी, सारे दुनिया में तू पूजीत होगी | उसी वरदान के स्वरूवप श्री सती दादी जी आज से लगभग 715 वर्ष पूर्व मंगलवार माघ शीर्ष वदि नवमीं सन् 1352 ईस्वीं 06.12.1295 को सती हुई थी
नोट :- जितनी मुझे दादी के बारे में जानकारी मिली थी जितना मैने पढ़ा, सुना व देखा सो लिख दिया, अगर इसमें कोई गल्ती हो तो माफ करना और सुधार हेतु बताना ताकि सुधार किया जा सकें सुधार हेतु इस नम्बर 9829277798 पर जरूर बजाये या काॅमेंट में लिखें
“जगदंबा जग तारिणी, रानी सती मेरी मात!
भूल चूक सब माफ़ कर, रखियो सिर पर हाथ !!”
भूल चूक सब माफ़ कर, रखियो सिर पर हाथ !!”
जय दादी राणी सती की
आपके पढ़ने लायक यहां भी है।
बहुत ही सुन्दर जानकारी साझा की आपने | मुझे बहुत आनंद आया आपकी पोस्ट पढ़ कर | शुभकामनायें आपको
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteमाँ राणी सती मंदिर और उनकी कथा का मनोहारी वर्णन ।
ReplyDeleteVery good write-up. I certainly love this website. Thanks!
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