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Friday, December 31, 2010

अब दस को बस 11 का स्वागत


ब्लॉग जगत के  सभी पाठको,देशवासियों,  ब्लॉगर मालिको व सभी के परिवार जनों को मेरी तरफ से नव 2011वर्ष की हार्दिक शुभकामनाए  यह वर्ष 2011 आपके जीवन में नई उमंगें, खुशिया लेकर आये तथा देश में अमन व शान्ति बनी रहे, इन्ही शुभकामनाओं के साथ सभी को नव वर्ष मुबारक हो 
2011 is Coming In Advance Wish You The Very  Happy New Year Day,HappyFriendship Day, Republic Day ,Independence Day, Gandhi Jaynti & other Jaynti, Happy Ramzan, Happy Diwali & Holi, Happy Mother,Father ,Dada, Dadi, Nana,Nani Days,Happy Teachers, Students,  Childreens Day Happy Birthday and 365 Good Mornings,Good Afternoon,Good Evenings & Good Nights.
  बाकि कुछ बचा तो आप अपनी तरफ से सोच लेना इन सभी शुभकामनाओं के साथ 2011 का स्वागत करते है। 

आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

शेखावाटी में होने वाली शादीयों के विचित्र रिवाज

 दीपावली की धूम की सजावट का अपना अपना नया अंदाज,बगड़

 घमसो मैया मन्दिर धौलपुर एक शेषनाग फनी पर्वत और प्...

रोडवेज बस चालक की सुजबुझ ने बचाई 30 सवारियों की जान

जितनी लम्बी सौर सुलभ हो उतने ही तो पग फैलाएं ( ज्वलन्त समस्या)

साया : - नव वर्ष की शुभकामनाएं

बहुत उपयोगी है सहजन का पेड़-various use of drumstick tree
साया

लक्ष्य

Monday, December 13, 2010

सरसों की फसल और सर्दी परवान पर,मालीगांव

 गांव में इस समय सरसो, चना,गेहूं जौ आदि की फसल उगाई हुई है।  आज प्रातःशरीर को कंपकंपी देने वाली सर्दी थी, जब मैं उठा कमरे के दरवाजे से बाहर निकला सामने देखा पीले फूलों से लथपथ सरसों की फसल एक नवयोवना दुल्हन की भांति सजी सवरी खेत में खड़ी लहलहा रही थी खेत ऐसे लग रहा था मानो कोई राजा हरी मखमली चारद ओढ़े हुए अपने सर पर स्वर्ण जड़ित हिरों का मुकुट पहने बैठा धुप सेक रहा हो। अर्थात अगेती सरसों की फसल फूल निकालकर अपने पूर्ण योवन परवान पर है।यानी अपने फल देने के लिए तैयार है।  और अब इसे सर्दी पाळा मारने का भय किसानों को बना हुआ है।
 क्योंकि यह माह सर्दी के लिए भी परवान चढ़ने का माह ही माना जाता है। और इस वर्ष गत वर्षो की तुलना में सर्दी कुछ ज्यादा ही पड़ रही है। कही कही तो पाळा"खरखरिया" जमने लगा है।
 वही दूसरी तरफ गेहूँ कि फसल को भी अब पानी "कोरबा" देना शुरू कर दिया गया है।जहां यह सर्दी सरसों के लिए एक अभिशाप बनी हुई हैं वही अब यह सर्दी गेहूँ की फसल के लिए वरदान है। क्योंकि जितनीज्यादा सर्दी बढ़ेगी गेहूं का रंग और बढ़त उतनी ही ज्यादा होगी। इसी विरोधाभास के कारण किसान वर्ग चिन्ता ग्रस्त रहता है। हालाकि आजकल वह चालाक हो गया है। उसने भी रास्ता निकाल लिया है। पछेती (बाद की फसल) को बोकर पहले वह अगेती सरसो बो देता हैं अगर सर्दी न मारी तो वह फसल अच्छी रहेगी और अगर उसे सर्दी मार जाती हैं तो पछेती फसल सरसों बच जायेगी 

 ये पछेती "फसल"आलू की खेती भी जोरों पर है।

 पछेती "फसल"सरसों को किसान यूरिया आदि खाद डालकर जल्दी तैयार करने के फार्मूले लगाता है।वैसे फसल खेती किसान के लिए अपने बच्चो की तरह होती हैं उसे पालने के लिए वह बिना सर्दी गर्मी की परवाह किये दिन रात मेहनत करता रहता है। और अंत में मिलती है उसे या तो प्राकृतिक मार या सरकार की काला बाजारी अर्थात कम भाव
 यहाँ देखिये छोटी सरसों की खेती में खाद डालता किसान और फिर फ्वारें से सिचाई करता सर्दी से फसल को बचाने के लिएअपनी फसल को  रात की बजाय दिन में पानी लगाता हैं क्योकि रात को पानी देने से फसल को सर्दी लगने का भय ज्यादा रहता है। इसलिए फसल के लिए दिन में पानी देना ज्यादा उत्तम रहता है।
 नीचे देखिये फ्वारों द्वारा फसल कि सिचाई के दृश्य जो अति सुन्दर लग रहें है।
मैने सोचा ये सब आपके साथ शेयर कर लूं , आप ही देखिये कि फसल रूपी चादर ओढ़े खेत कैसा  सुन्दर लग रहा है।
आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

भूखे भक्तों को भगवान , भोजन कब पहुचाओगे

 दीपावली की धूम की सजावट का अपना अपना नया अंदाज,बगड़

 घमसो मैया मन्दिर धौलपुर एक शेषनाग फनी पर्वत और प्...

रोडवेज बस चालक की सुजबुझ ने बचाई 30 सवारियों की जान

जितनी लम्बी सौर सुलभ हो उतने ही तो पग फैलाएं ( ज्वलन्त समस्या)

 साया :- जय मां पहाड़ा वाली जय मां शेरा वाली कर दे कोई चमत्कार,सारा जग माने तेरा उपकार

मेरी शेखावाटी - : तिलियार में हुआ सम्मलेन भाग -२ --------- नरेश सिंह...

हाथ का दर्द और कम्प्यूटर पर बैठने की आदत........................नरेश सिंह राठौड़
साया

लक्ष्य

Sunday, December 5, 2010

शेखावाटी में होने वाली शादीयों के विचित्र रिवाज

 सबसे पहले काफी दिनों बाद आप सभी पाठकों ब्लॉग मित्रों गुरूजनों को मेरा सादर प्रणाम
आपको बता दूं कि मैं पिछले काफी दिनों से शादीयों में व्यस्त था इसलिए कुछ नया लिख नहीं पाया और और पढ भी नहीं पाया शादीयों में इसलिए कि अपना धंधा ही ऐसा हैं स्टूडियों का भाई पेट पुजा के लिए बुकिंग लेकर जाना पड़ता है। हम फोटो ग्राफरों या यू कहें कि स्टूडियो वालों का काम ही ऐसा हैं कि हमसे शादी विवाह के किसी भी प्रकार के रश्म रिवाज छिपे नहीं हैं या यू कहे कि पूरी की पूरी शादी हमारी निगाहों के सामने से होकर गुजरती है।  और एक नई बात यह कि अनजान जगह होते हुए भी हमें पहचान बनाने की कोई जरूरत ही नहीं पड्रती सिर्फ हमारा टूल केमरा ही हमारी पहचान बना देता हैं और दोनों पार्टियों के साथ बहुत ही जल्दी हमें इस प्रकार से घुल मिला देता हैं कि यह तक पता नहीं चलता कि हम कोई अंजान है। या अंजान जगह आये है। 

 सबसे खस बात यह कि घर के बड़े बुढ़ो सहित बहु बेटियां सभी बेझिझक हमारे साथ घुलमिल जाते है।  यहा तक कि घुंघट की आड़ में रहने वाली बहुऐ भी हमारे सामने बेपर्दा होने से नहीं सकपकाती  क्योकि भाई फोटो खिचाने का शोख जो रहता है।भले ही शादी के दो दीन बाद हम जाये तो वे घुघट न हटाऐ पर इस समय तो सटाक से कहे अनुसार एक्शन करती है।  ये तो रही हमारे धंधे के खास हुनर की बात
अब आपको कुछ ऐसे रिवाजों के बारे में बताने जा रहा हूं जिसके बारे में खुद बुजुर्ग लोगों को भी कोई खास तथ्य नहीं पता लेकिन वे इनको निभाते जा रहें है। 









सबसे पहले मैं जिक्र करता हूं एक रिवाज चाक पूजन की
महिलाए इक्ट्ठा होकर खाली नये मटके लेकर कुम्हार (एक जाती जो मटके बनाने का कार्य करती है। ) के घर पर जाती हैं और वहा पर रखे चाक (जो मटके बनाने के काम आता है।) उसका पूजन मूंग, तेल,रोली, मोली और चावल, गुड चढ़ाकर उसका पूजन करती है।और फिर वहां एक घेरा बनाकर क्षेत्रिय गीतों पर नृत्य करती हैं हालाकि आजकल आधुनीकरण की होड में नई झलक देखने को मिल जाती है कि डी.जे के गानों पर नृत्य होने लगा है। इस रिवाज के बारे में पुछे जाने पर बुजुर्ग लोग सिर्फ यही बताते हैं कि "ये रिवाज पहले से ही चला आ रहा है। इसलिए हम भी यह निभाते है।" तथ्य क्या कुछ पता नहीं अगर आप विद्वान लोग जानते हैं तो बताने की कृपा करें। 


 वैसे तो शादी में बहुत से रिवाज होते हैं परन्तु मैं यहा उन प्रमुख रिवाजों के बारे में बताना चाहता हूं जो कि बिना किसी तथ्य के घिसते चले आ रहें है।


दूसरा  प्रमुख रिवाज देखने को मिलता है। समधी जच्चा
इसमें  दुल्हे के पिताजी को जच्चा (बच्चे की मा) बनाया जाता हैं उसका पूरा श्रृंगार किया जाता हैं और गोद मेंछोटा बच्चा रखा जाता है। तथा थाली बजाई जाती है। अर्थत वहीं सिस्टम जो बच्चे के जन्म लेने पर घर में किया जाता है। यह सब शादी में करने का क्या तात्पर्य है। और वो भी दुल्हे के पिताजी के साथ मेरे तो समझ से परे की बात हैं मैं इसको आत तक नहीं समझ पाया हूं हालांकि  शादियों में ऐसा देखता जरूर हूं। पता करने पर जबाब वो ही उपर वाला गोल मोल अब ये भी आप ही बतायें?


अगला रिवाज है।  (बर्तन) थाली खिसकाना और इक्ट्ठा करना
अर्थात गृह प्रवेश रश्म इसमें जब दुल्हा दुल्हन को लेकर घर में प्रवेश करता हैं तो लडत्रके की मां द्वारा पर अन्दर की तरफ 7 थालीयां रखती है। और दुल्हा उन थालियों को अपनी कटार से इधर उधर खिसकाता रहता है।  पिछे से दुल्हन उन थालियों को अक्ट्ठा करती रहती है। वो भी बिना टनटनाहट की आवाज के ऐसा माना जाता हैं कि अगर थाली इक्टठा करने में कोई आवाज हुई तो सास बहु की लडाई हो सकती है।  इस रश्म को निभाने से लड़ाई कितनी हद तक रूकती हैं ये तो आप सब भली भांति जानते ही है। ज्यादा बताने से क्या फायदा पुछे जाने पर इसके दो तीन उत्तर आये वो हैं कि  इससे अगर घर का मर्द यानी दुल्हा अगर घर की वस्तुए बिखेरता हैं तो औरत यानि दुल्हन को ऐसा होना चाहिए कि वो उसे समेट ले-
यह कि इससे दुल्हन के आज्ञाकारी होने का पता चलता है।
यह कि इससे सास बहु में हमेशा बनी रहती हैं झगड़ा नहीं होता  अब आप ही बताये कि ये किस हद तक सही है।



अगला रिवाज हैं सोट सोटकी यह रिवाज बहुत ही रोचक और आश्चर्यजनक रिवाज है। कुछ समय पहले यानि गृहप्रवेश में तो झगड़ा न होने की बात की जाती हैं और उसके कुछ समय के बाद ही यह रश्म अदा की जाती है। इसमें सबसे पहले दुल्हा आपसे में नीम या जाल की सोटकी से एक दुसरे को मारते हैं और फिर दुल्हे के सांग दुल्हे की भाभीयां इसी क्रम में खेलती हैं और दुल्हन के साथ उसके देवर खेलते है। और कही कही तो दुल्हन के ननदोई यानी कि दुल्हे के जीजा जी भी दुल्हन के सांग खेलते है। कही कही तो देखा जाता हैं कि यह खेल भंयकर हो ताजा है। और एक गुस्से का रूप लेकर शरीर को चोट पहुचाने लायक बन जाता है। मजाक मजाक में ये लोग एक दुसरे को चोट पहुचा देते है। और आक्रामक रूप से खेलने लगते है।  इसके पिछे क्या तथ्य हैं ये भी लोग नहीं बता पाये




अगला रिवाज हैं जुआ खेलना यह रिवाज भी विचित्र है। इसमें दुल्हा दुल्हन आपस में अपने कांगन डोरे खोलते हैं और दुल्हे की भाभी उसमें दुल्हन की मुंदड़ी (अंगूठी) मिलाकर उन दोनों को एक कोरे नये कुण्ड नुमा मिटटी के पात्र में दुध और पानी डालकर सात बार यह खेल लिखवाती है। इसमें यह देखा जाता है। हैं उस सफेद पानी में सेडाला गया डोरा और वो मुंदड़ी (अंगूठी) पहले कौन निकाल कर लाता हैं दुल्हा या दुल्हन  जो ज्यादा बार लाता हैं वह जितता है। और अंत में दुल्हा दुल्हन की मुटठी को खोलकर उसमें वो अंगूठी पहना देता है। यह भी विवाह का अटपटा लगने वाला रिवाज लगता है। जिसका कोई तथ्य परक उत्तर आज तक सामने नहीं आया और भी कई ऐसे रिवाज है। जिनका कोई तथ्य नहीं निकलता है।
और मैं आपको यह बता देता हूं कि आप सभी शादी शुदा लोग इन सभी रश्मों से होकर गुजर चुके हो परन्तु  शायद ही कोई इन रश्मों का तथ्य जानता हो बस करते आ रहे है। करते आ रहें है ...मुझे 8-10 साल हो गये स्टूडियों का कार्य करते हुए लेकिन इन रिवाजों के बारे में मैं आज तक सही नहीं जान पाया तो फिर ये रिवाज क्यों निभाये जा रहें यह सवाल मन में हर शादी में जरूर उठता है। लोगों से पुछ भी लेता हूं फिर सोचता हूं कि हमें क्या हमें तो मजदूरी करनी है। आज मेंने सोचा क्यों न ये सावाल आपके सामने भी खड़ा कर दूं आब आप ही सका कोई सटीक जबाब ढ़ूढ़ कर पेश करने की कृपा करें।

अब आपके सामने दो ऐसे दृश्य हैं जो जो अपने आप में मायने रखते हैं एक है गाय का दुध दोहती हुई मिहला जो अपने बेटे की शादी के कार्य को  बीच में छोड़कर गाय के प्रेम में एसी रमी की तीन दिन तक स्पेशल रूप से आग्रह करके अपनी फोटो खिचाने के लिए दुबारा दुध निकालने लगी कितना प्रेम करती हैं ये अपने पालतु पशुओं को कितना मातृत्व हैं इस गाय को अपने बछड़े से ये आप फोटो को देखकर अंदाज लगा सकते है।


दुसरा हैं घेड़ी डीजे पर 8 फुट उंची छलांग लगाती हुई
लेकिन यह नाच नहीं रही है। यह डीजे की आवाज और लोगों सें भड़कर बेकाबू हो गई और दूसरी घेड़ी पर उछल कुद करने लगी इससे दो महिलाओं को भी चोट आई शुक्र इतना हैं कि उस समय तक दुल्हा इसके उपर नहीं था नहीं तो और भी दुर्घटना घट सकती थी

ये थे हमारे क्षेत्र में होने वाले शादी विवाह के विचित्र रिवाज और हमारा अंदाज

आपके पढ़ने लायक यहां भी है।

दीपावली की धूम की सजावट का अपना अपना नया अंदाज,बगड़

 घमसो मैया मन्दिर धौलपुर एक शेषनाग फनी पर्वत और प्...

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साया

लक्ष्य

Monday, November 22, 2010

भूखे भक्तों को भगवान , भोजन कब पहुचाओगे


सबसे पहले पंचमुखी हनुमान जी दर्शन
आजकल स्टूडियों बुकिंग के कारण इतना नेट पर नहीं बैठ पा रहें हैं इसलिए कुछ न तो लिख पा रहें हैं और न ही कुछ पढ़ पा रहें है।
आज यूं ही बैठे बैठे एक सड़क पर पड़े किसी मैगजीन के पन्ने में लिखी कविता आगे आ गई कविता में भगवान और इंशान का वर्तमान हालात पर संवाद है। कविता मार्मिक लगी सो आपके साथ शेयर करने का मन बना लिया भावार्थ स्पष्ट हैं आपको समझने में दिक्कत नहीं आयेगी।

कितने महल गिराओगें।
तब जाकर घर पाओगे।।

सूरज को धमकाओंगे।
उजियारा हथियाओंगे।।


ढेरों पाप करोगे फिर।
आधा पुण्य कमाओगे।।

कुल अंधों की नगरी में
किसको आंख दिखाओंगे।।

जब खुद से टकराओंगे।
चूर-चूर हो जाओगे।।

राजा का दरबार हैं तुम
कैसै सच बतलाओगं।।


जग में आग लगा तो दी
अब क्या खाक उडाओगे।।

भूखे भक्तों को भगवान
भोजन कब पहुचाओगे।।


समझेगें नासमझ सभी
किस किस को समझाओंगे।।



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दो दिन से दलदल में फसी गाय को बचाकर हमने पुन्य प्राप्त किया लेकिन नगरपालिका बगड़ लापरवाह

 घमसो मैया मन्दिर धौलपुर एक शेषनाग फनी पर्वत और प्...

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मेरी शेखावाटी - : 


साया
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Friday, November 5, 2010

दीपावली की धूम की सजावट का अपना अपना नया अंदाज,बगड़

सभी ब्लॉगर मित्रों, पाठकों व उनके परिवार जनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं
Happy Deepawali
                आज दीपावली का दिन हैं आज बगड़ नगर का बाजार भी अन्य शहरों की तरह ही अपने ग्राहको को लुभाने के लिए सज धज कर तैयार खड़ा है।

  ये फलों  और वाटिका  से सजी दुकाने बी.एल चोक के पास पास  मघा राम सैनी की दुकान हैं और एक मक्खन लाला कुमावत की फल व सब्जी की दुकान  बड़े ही कलात्मक ढ़ग से सजाई गई थी
जिनकी एक झलक मैं आपको दिखाने जा रहा हूं यहां प्रत्येक दुकानदार अपनी दुकान को अपने नये अंदाज में सजये हुए है। कोई पेड़ पोधें की सजाई वाटिका में फल व सब्जियां बेच रहा हैं तो कोई टेन्ट के नीचे  मिठाईयां बेच रहा हैं  यहां के बाजार का दृश्य बाजार वास्तव में देखने लायक सजाय हुआ है। इसी दौरान मुझे मार्केट में एक अनोखी सजावट देखने को मिली वह थी यह एयरटेल कम्पनी की केन ओपी जिसकी छावं तले मोमबत्ती बेची जा रही थी शायद दुकानदार ने सोचा होगा एयरटेल का माल बिके न बिके मगर  दीपावली हैं जय जरूरत का सामान मोमबत्ती तो जरूर ही बीकेगी तो बेचना शुरू कर दिया मुझे ये कुछ विचित्र लगा सो मैने आपके संग शेयर करने का मन बना लिया इस मोमबत्ती से सजी एयरटेल केन ओपी को आप क्या कहेंग ये तो आप ही अंदाज लगा सकते है।



वहीं बी.एल चोक के नजदीक ही यह कनओपी लगी हुई है।ये दुनिया अजब गजब है। यहां कुछ भी हो सकता है।  
हो सकता है कि  सिम व कार्ड बिके न बिके मोमबत्ती की  बिक्री जरूर होगी 
है ना विचित्र
 वही मिठाइयों की दुकान भी सजावट में पिछे नही रही जोधपुर मिष्ठान भण्डार, ग्राहको के लुभाने का केन्द्र बनी रही

और इस नजारें में बगड़ सब्जी मंडी कहा पीछे रहने वाली थी वहां भी लोगों का ताता लगा हुआ था सब्जी मंडी का दृश्य देखने लायक लग रहा था
और हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पीरामल गेट जहाँ हमारी दुकान हैं का क्षेत्र तो पुरा का पुरा ही सजावट से शुक्त था यहाँ हर दुकानदार सामान दुकान के आगे
टेंट लगाकर बेचा ग्राहक लुभा रहा था यहा मिश्रित दुकाने है। सब्जी ,मिठाईयां लाईट क्रोकरी,जनरल स्टोर  किराणा व अन्य जिनकी सजावट देखने लायक है।
पीरामल गेट इलाके की प्रसिद्ध दुकान श्री अन्नपूर्णा मिष्ठान भण्डार  व उमेश मिष्ठान भण्डार काफी भीड़युक्त देखने को मिली 



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दो दिन से दलदल में फसी गाय को बचाकर हमने पुन्य प्राप्त किया लेकिन नगरपालिका बगड़ लापरवाह

 दिन दिन गिरता जा रहा शिक्षा का स्तर

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जितनी लम्बी सौर सुलभ हो उतने ही तो पग फैलाएं ( ज्वलन्त समस्या)

 साया :- जय मां पहाड़ा वाली जय मां शेरा वाली कर दे कोई चमत्कार,सारा जग माने तेरा उपकार

मेरी शेखावाटी - : शेखावाटी से जुड़े हुए हिन्दी ब्लोगर (परिचय )

साया
लक्ष्य

 

दीपक का प्रकाश हर पल आपके जीवन में एक नई रोशनी दे

दीपक का प्रकाश हर पल आपके जीवन में एक नई रोशनी दे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ आपको आपके परिवार सहित दीपावली की हार्दिक बधाईयां



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दो दिन से दलदल में फसी गाय को बचाकर हमने पुन्य प्राप्त किया लेकिन नगरपालिका बगड़ लापरवाह

घमसो मैया मन्दिर धौलपुर एक शेषनाग फनी पर्वत और प्राकृतिक झरने का अदभुत दृश्य स्थल

रोडवेज बस चालक की सुजबुझ ने बचाई 30 सवारियों की जान

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साया
लक्ष्य

Monday, November 1, 2010

घमसो मैया मन्दिर धौलपुर एक शेषनाग फनी पर्वत और प्राकृतिक झरने का अदभुत दृश्य स्थल

 घमसो मैया जो शेषनाग फनी आकार के पर्वत की कंदराओं के बीच विराजमान है। आज मैं आपको वहां का यात्रावृतांत और यहां की अदभुत विशेषताओं के बारे में बताने जा रहा हूं। दमोह धौलपुरजिले के सरमपूरा क्षेत्र के पास स्थित इस मन्दिर पर घमसो मैया की जात, मेला  आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीय तिथि 2 को लगता है। यहां जात देने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु गण आते है।माता से मन्नत मांगते हैं इस स्थान के बारे में ऐसा कहा जाता हैं कि माता से सच्चे मन सें मांगी गई मुराद माता अवश्य पूरी करती है। लेकिन मन्नत पुरी होने पर उस भक्त को पुनः माता के के इस स्थल पर दर्शनार्थ आना अति आवश्यक है। 

 इस मैया का दरबार घने जंगल के बीचों बीच एक पहाड़  के शेषनागफनी आकार के छत्र के नीचे स्थित है।दमोह स्थान पर्यटन की दृष्टि से भी बहुत ही महत्व पूर्ण है।  इसका कारण यहां का एक बहुत बड़ा प्राकृतिक झरना हैं यह स्थान चारों तरफ से पहाड़ों और हरे भरे जड़ी बूटी युक्त पेड़ पौधों से  घीरा हुआ हैं और देखने में ऐसा लगता है, मानों कि हम पृथ्वी का स्वर्ग कश्मीर देख रहें है।
 इसे अगर राजस्थान का मिनी कश्मीर कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।और इस  स्थान घने जंगल में हर प्रकार के साधारण और खुंखार जंगली जानवर रहते है।
 हाल ही में समाचार पत्रों की सुर्खियों में आया मोहन टाइगर भी इस प्राकृ1तिक स्थान पर 4 माह तक रह कर गया है। जिसके बारे में समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था कि मोहन टाइगर के पद चिन्ह दमोह क्षेत्र में मिले है। यह वही स्थान है।
इस क्षेत्र में ढ़ाक,प्लास्क,देतु,जामून,खेर,गुगल,इमली,आम,ताड़,साळ,सागवान,
ककोरा,मुरेला,सहित अनेक औषधियों की जड़िबुटियों के महत्व वाले पौधे इस स्थान पर मिलते है।अगर कोई मंत्री या अधिकारी इस क्षेत्र को दमोह क्षेत्र को दोरा करता हैं तो उसे यहां का झारना देखने की इच्छा जरूर हो ही आती है।यह स्थान पर्यटन के लिहाज से और भी अच्दा हो सकता हैं अगर  सरकार इस तरफ कुछ ध्यान दे क्योंकि यह स्थान चम्बल के डकेतों की शरण स्थली  बना हुआ है। और बिना सुविधा के जंगली जानवरों का भी भय रहता है।   और सबसे महत्व पूर्ण बात तो यह है कि यहां सुविधाओं जैसे सड़क मार्ग,बिजली ,पानी, साधन, रहन सहन आदि की अभाव है।लौग गांवो से दर्शनार्थ पैदल चलकर आते हैं लोग ही नहीं नेता गण और अधिकरी भी इन्हीं ऊबड़खाबड़ रास्तों से होकर ही आते हैं लेकिन सुविधाओं और विकास की तरफ कोई ध्यान नहीं देता है।  इस स्थल की यात्रा मेरे मित्र रमेश फलवारिया (बगड़ ) निवासी जो वहा झिरी गांव में एक अध्यापक के पद पर कार्यरत है।अपने वहां के 20-30 दोस्तों के समूह के संग की मैया तक जाने का रास्ता बड़े बड़े बहते पानी के15 -20 नालों के अन्दर से होकर गुजरता है। परन्तु ऐसी मान्यता हैं कि माता के दर्शन के लिए जाने वाले भक्तों के साथ किसी भी प्रकार की कोई अनहोनी घटना नहीं होती है। और वे इन नालों को आराम से पार कर लेते है।

 यहां के लोग वर्षा ऋतु प्रारम्भ होते ही इस जंगल में अपने मवेशी/पशुओं को लेकर आ जाते हैं और वही अपनी झोपड़ी बनाकर होली त्यौहार तक रहते हैं पुछने पर बताते हैं कि यहां पशुओं को खाने को चारा भी मिल जाता है। और वे दुध घी भी अच्छी मात्रा में देती है। यह स्थल राजस्थान का वैष्णों देवी धाम कहलाने लायक है।  वही मन मोहक दृश्य कल-कल करती नदियां  अधिक उंचाई से गिरता झरने,प्रकृति की गोद में विराजमान माता रानी का पवीत्र स्थल मन मोहक प्राकृतिक दृश्य, जीव जन्तुजिन्हे देख्कर मन वहां से हटने को ही नहीं करता ऐसा लगता है कि यहीं जीवन बीता दें 
यहां के लोग बताते हैं कि दमोह का यह झरना इतना गहरा हैं इसमें अगर सात खटियां चारपाई की जेवरी रस्सर भी डाली जाये इसे नापने के लिए तो वो भी कम पड़ती हैं कहने का मतलब कि इसका आज तक कोई गहराई नहीं माप सका है। 
और यहा के लोगों का यह भी मानना है कि जब इस मैया का मेला भरता हैं तो रास्ते में आने जाने वाले श्रृधालु भक्तों को किसी भी प्रकार डैकेतो और जंगली जानवरों द्वारा परेशानी नहीं होती और नही किसी प्रकार की कोई अप्रिय घटना घटित नहीं होती हैं यह सब मैया की ही कृपा है।
इसी जंगल में एक सुप्रसिद्ध महात्मा आत्मापुरी बाब की छतरी (समाधी स्थल) भी है।  इसी छतरी के पास से एक नाला (खार) पानी बहता हैं दन्त कथा है कि  आत्मपूरी बाबा के प्रताप यह नाला पहले दुध का बहता था तथा आत्मपुरी बाबा हमेशा शरीर से अपनी आत्मा को निकाल कर उसे दुध में धोते थे यह कितना सच हैं ये तो भगवान ही जाने।और वहा बंकर नुमा एक कमरा भी बना हुआ जिसके पास से नाला गुजरता हैं यह कमरा जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए बनाया गया है। इसके अन्दर जाने का सिर्फ एक छोटा सा ही रास्ता है। और अन्दर निशाने के लिए छेद बने हुए थे।बहुत पहले यहाँ राजा महाराजा आया करते थे और वे इस कमरे को शिकार के काम लेते थें ऐसा माना गया है। कमरा इतना अदभुत हैं कि  उसमें पेट के बल लेट कर ही अन्दर घुसा जा सकता हैं खड़ा नहीं। माता का यह मन्दिर जिस पहाड़ी के नीचे बना हैं वह एक शेषनाग के फन नुमा मन्दिर के उपर झुका हुआ है।यह झुकाव लगभग आधा किलोमीटर तक हैं और इसकी चौड़ाई  100 फूट के लगभग है।ऐसा कहा जाता हैं कि  माता के दरबार में  आने वाले भक्तों को धुप और बारिश से बचाने के लिए काम आता है। कहा जाता हैं कि इसके नीचे लगभग 10 लाख व्यक्ति खड़े रह सकते है।  फिर भी यह कम नहीं पड़ता है। 
यहा आने वाले भक्त अपने घर से ही भोजन बनाकर साथ ले जाते है। और स्नान कर दर्शन करने के बाद ही खानाखाते हैं 





तथा ताज्जुब की बात यह है कि प्रसाद चढ़ाने के लिए भी लोगों को घर से ही प्रसाद लाना पड़ता हैं वहा कोई दुकान वगेरह नहीं है।
अंत में मै  यही कहूंगा धन्य हैं वे लोग जिन्होंने इस स्थल के दर्शन कर माता के दर्शनों के साथ साथ मनमोंहक दृश्य का नजारा देखा और मैं रमेश फुलवारिया  का भी आभार व्यक्त करना चाहूंगा जिन्होने आकर मुझे जानकारी फोटो सहित प्रदान की इन फोटो में मेरे दोस्त रमेश भी है। आपसे भी जरूर चाहूंगा कि अगर धौलपुर की तरफ जाने का मन बने तो जरूर इन दर्शनों  का लाभ प्राप्त करना ना भूलियेगा।


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दिन दिन गिरता जा रहा शिक्षा का स्तर

रोडवेज बस चालक की सुजबुझ ने बचाई 30 सवारियों की जान

जितनी लम्बी सौर सुलभ हो उतने ही तो पग फैलाएं ( ज्वलन्त समस्या)

 साया :- जय मां पहाड़ा वाली जय मां शेरा वाली कर दे कोई चमत्कार,सारा जग माने तेरा उपकार

मेरी शेखावाटी - : शेखावाटी से जुड़े हुए हिन्दी ब्लोगर (परिचय )

साया
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